Sunday, October 17, 2021

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उत्तराखंड डायरी-1: दो शताब्दियों की यादें, गिर्दा की कोठरी और पहाड़ के नये-पुराने दोस्त

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फरवरी, 2020 के बाद यह पहला मौका था, जब मेरे जैसा घुमक्कड़ अपने घर-शहर से बाहर निकला। कोविड-19 के प्रकोप और आतंक ने मनुष्यता को जितना सताया और डराया है, वह अभूतपूर्व है। साढ़े छह दशक के अब तक के अपने जीवन में मैंने न ऐसा कभी देखा और न सुना। अपने बुजुर्गों से हमने 1918 के स्पेनिश फ्लू की डरानवी कहानियां जरूर सुनी थीं। पर हमारे इलाके में वह शायद आज के कोरोना जैसी डरावनी नहीं थीं। कोरोना ने अपने देश में लाखों की जान ली और जो बच गये, उनसे उऩकी जिंदगी की लय ही छीन ली। फरवरी, 2020 और अगस्त, 2021 के बीच रिश्तेदारों-मित्रों के परिवारों में शादी या ऐसे ही पारिवारिक आयोजनों के कुछ मौके आये, जब हमें बाहर निकलना जरूरी था पर डाक्टर-मित्रों और परिजनों की सलाह मानकर हमने सफर पर निकलना उचित नहीं समझा। लेकिन एक दिन वो मौका आ ही गया, जब हम सफर पर निकल पड़े। 12 सितम्बर, 2021 की अलसुबह हमने उत्तराखंड के सफर से शुरुआत की। बिल्कुल अकेले।

कोविड-प्रोटोकोल का अक्षरशः पालन करते हुए हमने अपने सारे कागजात-(कोविड-जांच की अद्यतन रिपोर्ट और कोवि-शिल्ड के दोनों टीकों की वह रिपोर्ट, जिस पर अपने देश के प्रधानमंत्री जी की तस्वीर टंकी हुई है) ले लिये। टैक्सी-सर्विस मुहैय्या कराने वाली कंपनी से बात भी हो गई। ड्राइवर साहब भी टीके लगवा चुके थे। गाड़ी सुबह साढ़े चार बजे घर पहुंच गयी। चलने से पहले मैंने ड्राइवर साहब को संक्षिप्त हिदायत दी-‘मस्ती से चलिये पर स्पीड नियंत्रित रहे।’ वह समझदार और सज्जन थे। राजस्थान के किसी सुदूर जिले के रहने वाले थे। दिल्ली-एनसीआर से तकरीबन सौ-सवा सौ किमी दूर हाई-वे के किसी बड़े ढाबे पर उन्होंने गाड़ी रोकी और वहां नाश्ता किया। मैंने पानी की सिर्फ दो बोतलें लीं, सोचा सीधे काठगोदाम पहुंचकर हाथ-मुंह ठीक से धोकर नाश्ता करेंगे। शायद मेरे अंदर बीते पौने दो सालों से जमा कोरोना का डर बीच के लाइनहोटल में नाश्ता करने से मुझे रोक रहा था।

छह-सात घंटे के इस रास्ते में पता नहीं कैसे उत्तराखंड के अपने पहले सफर की याद आ गई। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में बीसवीं सदी के अस्सी दशक की याद! आदमी जब सफर में अकेला होता है तो वह स्मृतियों और कल्पनाओं  में जीने लगता है। उत्तराखंड का पहला सफर कब किया, तारीख याद नहीं, शायद वर्ष भी ठीक से याद नहीं। तब मैं डायरी नहीं लिखता था। उस दौरान किसी नोटबुक पर कुछ भी लिखा भी हो तो वह आज मेरे पास नहीं है। हां, इतना याद है कि वह अस्सी का दशक था-सन् 81, 82 या 83 रहा होगा क्योंकि तब तक मुझे राहुल सांकृत्यायन पर शोधपरक लेखन के लिए एम.फिल्. की डिग्री अवार्ड हो चुकी थी। उत्तराखंड की मेरी वह पहली यात्रा घुमक्कड़ी के लिए नहीं, नौकरी के लिए थी। लोग नौकरी-रोजगार के लिए उत्तराखंड से दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरू की तरफ भागते हैं और मैं दिल्ली से नैनीताल जा रहा था। तब टैक्सी से जाने की कैसे सोचता! दिल्ली के मशहूर आईएसबीटी से साधारण बस सेवा का टिकट लिया और निर्धारित बस में बैठ गया।

साथ में हरे रंग का एक साझारण सा झोला था, जिसे मैंने गांव जाने के लिए चांदनी चौक की किसी दुकान से सस्ते में खरीदा था। उसमें चेन लगी थी। इसके अलावा उसके धातु-टंकित छेदों को झोले में लगी मोटी रस्सी से बांधा भी जा सकता था। गर्मिंयों के दिन थे। इसलिए ज्यादा सामान ले जाने की जरूरत नहीं समझी। उन दिनों मेरे पास गांव से लाई चरखाने की एक पतली-सी चादर थी। उसे भी झोले में डाल लिया। संभवतः वह बस डीटीसी या यूपी रोडवेज की थी। लंबी और थकाऊ यात्रा थी पर अपने ऊपर उसका खास असर नहीं पड़ा। हमारे साथ तब उम्र थी। जोश था। एक आस थी कि इस बार अपनी नौकरी लग जायेगी! अब तक कई इंटरव्यू दे चुका था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. प्रथम श्रेणी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(जेएनयू) से एम.फिल्. की डिग्री के बावजूद दिल्ली के तीनों विश्वविद्यालयों-डीयू, जेएनयू और जामिया से पानीपत तक, कहीं भी मुझे नौकरी नहीं मिल रही थी। कभी इंटरव्यू के बाद निराशा मिलती तो कभी इंटरव्यू के लिए बुलाया तक नहीं जाता। दिल्ली विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों या आसपास के कुछ विश्वविद्यालयों में हमारे कुछ सहपाठियों की नियुक्तियां धड़ल्ले से हो रही थीं पर अच्छे नंबरों और अच्छी पोजीशन के बावजूद अपन को कहीं ठौर-ठिकाना नहीं मिलता। मेरे शोध-निर्देशक डॉ. मैनेजर पांडेय को भरोसा था कि इस बार कुमायूं विश्वविद्यालय में मेरी नियुक्ति जरूर हो जायेगी। उन्होंने जाने के लिए मेरा उत्साह-वर्द्धन किया। इसलिए मैं वाकई उत्साह में था। हिंदी के बड़े विद्वान और हमारे भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष ही वहां इंटरव्यू लेने जा रहे थे। उन दिनों घर के हालात भी अच्छे नहीं थे। नौकरी की बहुत जरूरत थी।

उत्तराखंड में अपने ढेर सारे दोस्त और शुभचिंतक थे। इनमें कइयों से दिल्ली में मुलाकात हो चुकी थी। कुछ जेएनयू के ब्रह्मपुत्र हॉस्टल के मेरे कमरे में भी आ चुके थे। ये सभी लोग वाम-लोकतांत्रिक रुझान के लेखक, कवि, बुद्धिजीवी या सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे। इनमें एक थे-गिर्दा यानी गिरीश तिवाड़ी!  शमशेर सिंह बिष्ट, पीसी तिवारी, प्रदीप टाम्टा आदि के साथ मेरी गिर्दा से भी दिल्ली में कहीं न कहीं मुलाकात हो चुकी थी। वह हमसे सीनियर थे पर बेहद दोस्ताना। उम्र का फासला हमारे रिश्तों के बीच नहीं आता था। मैं नैनीताल पहुंचने से काफी पहले ही उन्हें पोस्टकार्ड डाल चुका था कि अमुक तारीख से अमुक तारीख तक मुझे नैनीताल में रहने के लिए कहीं सस्ता कमरा दिलायें। कुछ दिनों बाद उधर से जवाबी पोस्टकार्ड भी आ गया-‘यूथ हास्टल में कमरे का प्रबंध हो गया है।

नैनीताल झील।

मस्ती से आइये और रहने की अवधि एक-दो दिन और बढ़ा लीजिये।’ पहाड़ों में दाखिल होने के बाद नैनीताल का रास्ता जितना रोमांच भर रहा था, मेरी कल्पनाशीलता उससे भी ज्यादा उड़ाने भर रही थी। बस की खिड़की से बाहर झांकते हुए ऊंचाई का एहसास होता। कभी-कभी डर भी लगता। पर बस-चालक मस्ती में बस चला रहा था। मैं आगे की ही दूसरी या तीसरी कतार की खिड़की वाली सीट पर बैठा था। हमारे पीछे की सीट पर खिड़की के पास बैठी एक अधेड़ उम्र की महिला दो-तीन बार उल्टी कर चुकी थी। पर कुमाऊं की ऊंची पहाड़ियों के रोमांच और बस में बैठे लोगों की गतिविधियों से ज्यादा मेरा दिमाग कल होने वाले इंटरव्यू में उलझा हुआ था-कैसा रहेगा इंटरव्यू? क्या जेएनयू के ‘हमारे वामाचार्य’ वाकई इस बार मेरे प्रति कुछ उदार रहेंगे? अगर वह मेरा साथ देंगे तो क्या विश्वविद्यालय वाले उनकी बात मान लेंगे? इंटरव्यू में क्या-क्या पूछा जा सकता है? पता नहीं क्यों, शुरू से ही हर इंटरव्यू को लेकर मैं आत्मविश्वास से भरा रहता रहा हूं। कभी ऐसा नहीं लगा कि यहां या वहां मेरा इंटरव्यू अच्छा नहीं होगा।   

लंबे सफर के बाद हम नैनीताल पहुंच गये। सबसे पहले, मॉल रोड स्थित गिर्दा के कमरे में गये, जहां दोस्ताना-भव्यता के साथ मेरा स्वागत हुआ। कड़क चाय के साथ फैन जैसी कोई चीज खाने को मिली। कमरा छोटा ही था और सीलन से कुछ भरा लग रहा था। लेकिन सीलन की गंध से ज्यादा उसमें बीड़ी के धुंए की गंध थी। गिर्दा को आने का कारण बताया। वह बहुत खुश हुए-‘आपके आने से हमारे साथियों का दायरा बढ़ेगा। कुनबे को ताकत मिलेगी।’ उन्होंने साथ में बैठे अपेक्षाकृत कम उम्र के एक युवा कार्यकर्ता को मेरे साथ लगा दिया। इस वक्त उनका नाम नहीं याद आ रहा। उन्होंने मुझे यूथ हॉस्टल छोड़ा और सब कुछ समझा दिया कि यहां से कल सुबह कुमाऊं विश्वविद्यालय कैसे पहुंचना है! अगली सुबह मेरा इंटरव्यू हुआ। शानदार रहा। मेरी कल्पनाओं से भी अच्छा। हमारे विभागाध्यक्ष महोदय ने स्वयं कम सवाल किये, शायद एक ही सवाल।

उन्होंने इंटरव्यू-बोर्ड में बैठे अन्य लोगों से कहा कि आप लोग पूछें। मैंने हर सवाल का बेहतर जवाब दिया क्योंकि वे सारे सवाल हमारी जानकारी और विवेक के दायरे के ही थे। ऐसा कोई सवाल नहीं पूछा गया, जिसके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता था। इंटरव्यू के बाद अपने कमरे पर गया। सर्टिफिकेट-वगैरह की फाइल झोले में डाली और फिर कमरा बंद करके गिर्दा के कमरे की तरफ निकल गया। पहली बार आया था, इसलिए मुझे नैनीताल के मौसम का अंदाज नहीं था। दिल्ली से चलते समय मुझे लगा था कि गर्मी में वहां इतनी ठंड नहीं होगी कि स्वेटर की जरूरत पड़े! पर यहां सुबह-शाम अच्छे-खासे स्वेटर की जरूरत थी। मैंने गिर्दा से कहा कि मुझे तत्काल स्वेटर की जरूरत है। अभी लौटने का बस किराया और होस्टल के कमरे का खर्च भी देना है। ये नैनीताल है, अपना चांदनी चौक नहीं, पता नहीं, यहां कितने रूपये का स्वेटर मिलेगा? गिर्दा मेरे साथ स्वयं ही बाहर निकले, उनके साथ कुछ और लोग भी थे। हम लोगों ने मॉल रोड से हटकर एक साधारण बाजार की दुकान से एक स्वेटर खरीदा। सफेद बैकग्राउंड पर नीले रंग का डिजायन बना हुआ था। पूरी तरह ऊनी नहीं था। संभवतः ऊनी-सूती आधा-आधा था। जाड़े से कुछ बचाव के लिए मैंने शर्ट के अंदर भी एक शर्ट पहन रखी थी।

इसलिए उसके ऊपर स्वेटर डालने के बाद काफी राहत मिली। उस शाम हम कई लोग गिर्दा के कमरे में जमे और कविता-पाठ शुरू हुआ। गिर्दा ने कई कविताएं सुनाईं। कुछ हिंदी में और कुछ कुमाऊंनी में। मेरा नंबर आया तो मैंने गोरख पांडेय की कुछ कविताएं सुनाईं जो मुझे कंठस्थ थीं। इनमें एक तो भोजपुरी का वह मशहूर गीत भी था-‘समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई।’ काव्य-पाठ का सत्र जैसे-जैसे बढ़ता रहा, कमरे में बीड़ी के धुएं की गंध भी बढ़ती रही। आज तक मैंने सिगरेट-बीड़ी कभी छुआ नहीं। अपन सिर्फ जर्देदार पान और चाय के शौकीन थे। ‘रस-रंजन’ के भी खास शौकीन नहीं रहे और अब तो यदा-कदा वाला सिलसिला भी खत्म हो गया है। उस दिन गिर्दा के कमरे में दाखिल होने से पहले ही मैंने पास की दुकान से दो बीड़ा पान बंधवा लिया था। कमरे के सीलन की गंध जल्दी ही रस-रंजन के साथ बीड़ी के धुंए की गंध में दब सी गई। काफी देर बाद हम लोगों ने उसी कमरे में रात्रि-भोज किया। बगल के किसी रेस्तरां से खाना मंगाया गया था। मैने बड़ी मुश्किल से एक या डेढ़ पेग लगाया था। उससे पहले जेएनयू में तीन-चार बार ही रसरंजन किया था। मैं अभ्यस्त नहीं था। इसलिए थोड़ा डर-डर कर ले रहा था। नयी जगह है और सुबह दिल्ली-वापसी का लंबा बस-सफर है। एक साथी आधी-रात को मुझे यूथ हॉस्टल तक छोड़ने आये। जल्दी ही नींद आ गई। सुबह जल्दी-जल्दी तैयार होना था। खिड़की से बाहर देखा, सूरज निकल आया था। कमरे से बाहर निकला और धूप वाले इलाके में खड़ा हो गया।

नैनीताल की वह सुबह बहुत सुंदर थी। इस सुंदर शहर के विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनकर आने का सपना सुबह की सुनहरी धूप की तरह मेरे अंदर उग आया था। नाश्ते के बाद मुझे दिल्ली के लिए बस भी पकड़नी थी। उस दिन देर शाम मैं दिल्ली लौटा। बस, कुमाऊं विश्वविद्यालय के नतीजे का इंतजार था। कुछ ही दिनों बाद पता चला-कुमाऊं विश्वविद्यालय में भी मेरी नियुक्ति नहीं हुई। एक और नाकामी मेरे खाते में दर्ज हो चुकी थी। सिर्फ मैं और मेरा परिवार ही नहीं निराश हुआ, दिल्ली स्थित हमारे कई साथी भी निराश हुए। बाद में पहाड़ से आये किसी दोस्त से मुलाकात हुई तो पता चला, गिर्दा सहित नैनीताल के हमारे कई साथी भी इस खबर से मायूस हुए थे। कुमाऊं का वह इंटरव्यू शिक्षक बनने के मेरे सपने के अंत का ऐलान साबित हुआ। उसके बाद मैंने किसी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में शिक्षक बनने के लिए आवेदन नहीं भेजा। पर उत्तराखंड से मेरा रिश्ता और मजबूत होता रहा। कुछ वर्ष बाद उत्तराखंड के कुछ और युवा हमारे दोस्त बने। वे भी हमारी ही तरह बदलाववादी सोच के थे। इनमें कपिलेश भोज, पलाश विश्वास और अनवर जमाल आदि शामिल थे। पलाश और अनवर जमाल अलग-अलग समय मेरे हॉस्टल के कमरे में भी कुछ दिनों तक रहे। अनवर आज एक जाने-माने फिल्ममेकर हैं और पलाश कोलकाता-धनबाद में सक्रिय पत्रकारिता की लंबी पारी पूरी करने के बाद फिर उत्तराखंड लौट आय़े हैं। दिनेशपुर के अपने इलाके में प्रेरणा-अंशु नामक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। दिल्ली में मोहन थपलियाल, त्रिनेत्र जोशी, प्रभाती नौटियाल, इलाहाबाद से दिल्ली आ चुके मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल, ऐसे कई अन्य वरिष्ठ साथियों से हमारा पहले से ही परिचय था।

नैनीताल के पहले दौरे में शेखर पाठक से मुलाकात नहीं हुई थी। बहुत साल बाद शायद उनसे एक मुलाकात हुई, जब मैं पत्रकारिता में आ चुका था। लेकिन सन् 2021 के 13 सितम्बर को उनसे बहुत अच्छी मुलाकात हुई-अशोक होटल में। ‘नैनीताल समाचार’ का दफ्तर भी यहीं बगल में है। वर्षों बाद मुझे इस बिल्डिंग और इलाके में कुछ बेहतर बदलाव दिखा। शेखर भाई के साथ जस्सीराम आर्य भी मिलने आये थे। नैनीताल की कड़क चाय पर हम लोग देर तक गपियाते रहे। जस्सीराम आर्य ने अपनी एक कुमाऊंनी कविता भी सुनाई। कविता का धारा-प्रवाह हिंदी अनुवाद शेखर पाठक करते रहे ताकि मैं कवि के कथ्य और काव्य-सौंदर्य को समझ और महसूस कर सकूं। अच्छी कविता लगी। जस्सीराम आर्य से बहुत ज्यादा बात तो नहीं हो सकी। पर मुझे वह एक संतुलित और समझदार व्यक्ति लगे। मॉल रोड के मोड़ पर हमने कुछ खरीददारी की और फिर शुरू हुआ शेखर पाठक के घर का सफर। हमारी योजना थी, ऊपर तक पैदल चलने की। लेकिन बीच में बारिश आ गई।

हमारे पास छाता भी एक ही था। हमे अपनी गाड़ी मंगवानी पड़ी। फिर शेखर भाई के घर के पास वाले मशहूर अस्पताल तक गाड़ी से गये और उसके बाद बंदरों से बचते हुए घर पहुंचे। उस अस्पताल का नाम रैम्जे गवर्नमेंट हास्पिटल था। उसके बगल से गुजरते हुए शेखर पाठक ने मुझे सर हेनरी रैम्जे के व्यक्तित्व और प्रशासनिक कामकाज की भी संक्षिप्त जानकारी दे डाली, जिन्होंने ब्रिटिश राज में इस अस्पताल की स्थापना कराई थी। उत्तराखंड के बौद्धिक जगत में शेखर कई कारणों से अप्रतिम हैं। उन्होंने सिर्फ स्थानीय इतिहास पर अच्छा काम ही नहीं किया है, उऩके पास सुसंगत इतिहास-दृष्टि भी है। शेखर ने मेरे मन में रैम्जे की जो तस्वीर बनाई, वह अब भी बनी हुई। घर आकर मैने इंटरनेट के जरिये रैम्जे पर पठनीय सामग्री खोजनी शुरू की तब समझ में आया कि कैसा विलक्षण व्यक्तित्व था-रैम्जे! रामनगर, कनकपुर और कोटद्वार जैसे कस्बों को उसी ने बसाया था। तब वह कुमाऊं के कमिश्नर थे। अपेक्षाकृत उदारमना अफसर थे। रामनगर कस्बे का नामकरण अयोध्या वाले भगवान राम के नाम पर नहीं, रैम्जे के नाम पर हुआ है। उस कस्बे को रैम्जे ने ही सन् 1850 में बसाया था। शेखर जी का घर रैम्जे अस्पताल से आगे और कुछ ऊपर है। उसकी लोकेशन बेहतरीन है।

शेखर पाठक औऱ उमा भट्ट के साथ।

वहां से नैनीताल का बड़ा हिस्सा साफ-साफ नजर आता है। घर में भाभी जी डॉ. उमा भट्ट सुस्वादु भोजन के लिए हम दोनों का इंतजार कर रही थीं। वह विदुषी हैं और जन-आंदोलनों की हिस्सेदार भी। उत्तरा नामक एक पत्रिका का अपनी अन्य साथियों के साथ संपादन करती हैं। हाल ही में उन्होंने तीन अन्य लेखिकाओं के साथ उत्तराखंड की महिलाएं: स्थिति एवं संघर्ष (नवारूण प्रकाशन) शीर्षक एक पुस्तक का संपादन भी किया है। हम तीनों देर तक बतियाते रहे। घर के छज्जे से नैनीताल शहर के अलग-अलग कोनों का सौंदर्य भी निहारते रहे। कुछ अच्छी तस्वीरें निकालीं। भोजन की टेबुल पर एक से एक स्वादिष्ट खाद्य। अलसी की चटनी तो शायद ही कभी भूलेगी। यह कुमाऊंनी स्पेशल थी। ऐसी चटनी पहले कभी नहीं खाई। शेखर जितने परिश्रमी और प्रतिभाशाली इतिहासकार हैं, उतने ही अच्छे संवादक या संप्रेषक हैं। उनके व्यक्तित्व में समझ, संवेदना और सहजता का मेल है। नैनीताल समाचार के संपादक-प्रकाशक भाई राजीव लोचन साह से इस बार मुलाकात नहीं हो सकी। वह दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में एक सर्जरी के लिए भर्ती थे। उनसे फोन पर अच्छी बात हुई। सर्जरी संपन्न हो चुकी थी। सर्जरी के बाद भी कुछ दिन वह दिल्ली में ही रहेंगे।

जस्सीराम आर्य के साथ।

नैनीताल से भीमताल स्थित अपने गेस्ट हाउस लौटने के रास्ते में भवाली में संजीव भगत से मुलाकात हुई, जो फेसबुक पर मुझसे जुड़े हुए हैं। संभवतः वह पूर्व पत्रकार हैं और आज बहुत कामयाब व्यवसायी। वह फलों और हिमालयीय वनस्पतियों से बनी स्वास्थ्यवर्द्धक सामग्री का उत्पादन, विक्रय और वितरण करते हैं। भगत ने ही पहली बार मुझे भवाली में बसे यूपी के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और लेखक शैलेंद्र प्रताप सिंह के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शैलेंद्र जी इन दिनों बुद्ध और बौद्ध दर्शन पर लिख-पढ़ रहे हैं। इस विषय पर उनकी कुछ किताबें भी आ चुकी हैं। भीमताल लौटने पर अपने अनुज-मित्र अनवर जमाल का फोन आया। वह भी पिछले कुछ सालों से भीमताल के पास ही नौकुचिया ताल इलाके में अपना बसेरा बनाये हुए हैं। बाहर कम लोगों को मालूम है कि अनवर मूलरूप से उत्तराखंड के ही हैं। वैसे दिल्ली के द्वारका में ही वह अब स्थायी तौर पर रहते हैं।

अनवर को जब मैंने बताया कि आज नैनीताल से लौटते हुए भवाली गया हुआ था तो उन्होंने भी वहां के दो लोगों का खास तौर पर जिक्र किया-शैलेंद्र प्रताप सिंह और संजीव भगत। एक से तो मिल चुका था, अब बारी दूसरे से मिलने की थी। वैसे भी मैं जहां कहीं जाता हूं, वहां के सिर्फ भूगोल से नहीं, समाज से भी मिलता हूं। अलग-अलग ढंग के ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलने की खूब कोशिश करता हूं। अगले दिन शैलेंद्र जी को फोन किया तो उन्होंने तपाक् से कहाः ‘उर्मिलेश जी, आपका बहुत-बहुत स्वागत है। अगर संभव हो तो आप हमारे कुटीर में आज जरूर आइये। आपका गेस्ट हाउस ज्यादा दूर नहीं है। कहिये तो मैं गाड़ी भेज दूं। आज का लंच आप हमारे साथ करें।’ मैंने उनका आमंत्रण फौरन स्वीकार किया। मुझे उस दिन रामगढ़-मुक्तेश्वर की तरफ निकलना था इसलिए सुबह ही हमने टैक्सी बुला ली थी। नाश्ते के बाद हम गेस्ट हाउस से निकल पड़े। नौकुचिया इलाके में अनवर और वीरेन सेंगर के बंद पड़े घरों की परिक्रमा कर फिर ताल की तरफ लौटे। दोनों दोस्त अपने-अपने घरों को केयर-टेकर के हवाले करके दिल्ली-नोएडा गये हुए थे। ताल के किनारे हमने नौका और शिकारों वालों से बातचीत की। पर्यटकों के बगैर नौकुचिया के दो किनारों पर भारी संख्या में नावें उदास पड़ी थीं। पता नहीं, नौका-विहार करने वाले कब आयेंगे! कोरोना ने पर्यटन क्षेत्र को तहस-नहस कर डाला है।

शैलेंद्र सिंह के साथ।

नौकुचिया से हम सीधे भवाली स्थित शैलेंद्र जी के घर पहुंचे। उनकी बहू ने दरवाजा खोला और ऊपर ले गयीं। शैलेंद्र जी बहुत उत्साह से मिले। हमने खूब बातें की। भोजन से पहले और भोजन के बाद भी। संयोगवश, वह भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। उनका हॉस्टल हालैंड हाल हमारे ड़ायमंड जुबिली हस्टल के ठीक बगल में था। बीच में एक सड़क थी, जो कर्नलगंज की तरफ जाती थी। इससे हमारे रिश्तों में और निकटता आई। यूपी पुलिस में आईजी के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद अब वह अपना ज्यादा समय भवाली में ही बिताते हैं। बहुत सुंदर घर बनवाया है। उसमें भव्यता से ज्यादा सहजता है। उऩकी छत से 12 किमी दूर बसे भीमताल की सुंदर झील तिकाने आकार में दिखती है। पूरा कस्बा, उसके चारों तरफ की हरियाली और बीच में फैली झील का दृश्य मनोरम है। शैलेंद्र जी ने लौटते समय बुद्ध और बौद्ध दर्शन पर दो पुस्तकें-बौद्ध साधना(2014) और बुद्ध के बढ़ते कदम(2011) मुझे भेंट कीं। बौद्ध साधना को पढ़ना शुरू किया है।

इससे पहले हमने काठगोदाम-हलद्वानी में भी बहुत सारे लोगों से मुलाकात की। इसमें दलित-आदिवासी-ओबीसी समुदायों के बहुतेरे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे। कुछ दिनों पहले ही पिथौरागढ़ के डॉ मोहन आर्य से फोन पर बातचीत हुई थी। इस सफर में उनसे हमारी मुलाकात नहीं हुई। सिर्फ फोन पर ही मिले। वह बहुत दूर पिथौरागढ़ के अपने गांव में थे। पुराने साथी कपिलेश भोज और पलाश विश्वास से भी फोन पर अच्छी और लंबी बात हुई। मुलाकात नहीं हो सकी। मुलाकातों, फोन पर हुई बातों और सफर के अपने निजी अनुभवों के बीच मेरे सामने उत्तराखंड की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों की नयी तस्वीरें भी उभरती रहीं। उत्तराखंड के समाज और राजनीति का सच हू-ब-हू वैसा नहीं है, जैसा वह अनेक उच्चवर्णीय मध्यमार्गियों, ‘लिबरल्स’ या यहां तक कि कई वामपंथियों के लेखन में दिखता है।

जारी….

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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