इतिहास से सबक सीखें या अतीत की घटनाओं का हिसाब-किताब करें?

Estimated read time 1 min read

संघ परिवार द्वारा 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद से जो सैकड़ों साल पहले हुआ था वह अचानक समाज में चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। इतिहास को देखने का एक विशिष्ट नजरिया, जिसमें इतिहास को राजाओं और उनके धर्म के चश्मे से देखा जाता है, को समाज पर थोप दिया गया है। वह भी एक सुनियोजित तरीके से।

अब एक कदम आगे बढ़कर साम्प्रदायिक शक्तियां इसको राष्ट्रवाद से जोड़ रहीं हैं। दिलचस्प बात यह है कि साम्राज्यों के काल के इतिहास को राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है, इस तथ्य को पूरी तरह भुलाकर कि राष्ट्र-राज्य एक आधुनिक परिकल्पना है और भारत की संकल्पना उपनिवेशवादी शक्तियों के विरूद्ध हुए संघर्ष के समानांतर उदित हुई।

साम्प्रदायिक शक्तियां मुस्लिम शासकों से लड़ने वाले हिंदू राजाओं को देशभक्त और महान राष्ट्रवादी और राष्ट्र के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। इससे पहले महात्मा गांधी के सीने में तीन गोलियां मारने वाले नाथूराम गोडसे ने अपने अदालती बयानों पर आधारित पुस्तक ‘‘मे इट प्लीज युअर ऑनर‘‘ में गांधीजी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि छत्रपति शिवाजी महाराज या महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रवादियों की तुलना में वे अत्यंत तुच्छ थे।

अब उसकी विचारधारा को मानने वाले यही बात और जोर से दुहरा रहे हैं। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में ‘‘अतीत के आक्रमणकारियों का महिमामंडन करने वालों‘‘ पर तीखा हमला करते हुए कहा था कि यह देशद्रोह है जिसे ‘नया भारत‘ बर्दाश्त नहीं करेगा। भाजपा के तेजतर्रार नेता की यह टिप्पणी महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले में स्थित मुगल शासक औरंगजेब की कब्र हटाए जाने की मांगों के बीच आई है।

इसी तरह आरएसएस के सरकार्यवाह (महासचिव) ने सवाल उठाया कि क्या किसी ऐसे व्यक्ति को नायक बताना ठीक है जिसका आचरण भारत के लोकाचार के विपरीत रहा हो। उन्होंने पूछा कि गंगा-जमुनी तहजीब (हिंदू और मुस्लिम सांस्कृतिक तत्वों के मिलन) की वकालत करने वालों ने कभी औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह को नायक क्यों नहीं बताया जो सांप्रदायिक सौहार्द का प्रवर्तक बताया जाता है।

ये सारी बातें उस माहौल में कही जा रही हैं जब जोर-शोर से औरंगजेब को एक आक्रामक और क्रूर खलनायक बताया जा रहा है। आक्रमणकारी कौन थे? क्या औरंगजेब एक आक्रमणकारी था? सीधी सी बात यह है कि औरंगजेब को अपने पिता शाहजहां के वारिस के रूप में साम्राज्य मिला। मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर था, जो काबुल पर राज कर रहा था। राणा सांगा ने उसे पत्र लिखकर कहा कि वह आकर दिल्ली के सम्राट इब्राहिम लोधी को पराजित करे। अंततः हुआ यह कि बाबर ने राणा सांगा और इब्राहिम लोधी दोनों से युद्ध किया और दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुआ।

बाबर के पहले यूनानी, कुषाण, हूण और शकों ने उत्तर-पश्चिम से आक्रमण किया और वे यहां के जनसमुद्र का हिस्सा बन गए। केवल मुगल ही यहां नहीं आए, खिलजी, गुलाम और गजनी भी स्थानीय राजाओं के पराजित कर यहां की सत्ता पर काबिज हुए। उस समय भारत, दिल्ली से शासित होने वाले राष्ट्र के मौजूदा स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था। राजाओं के बीच सत्ता और संपदा के लिए संघर्ष चलते रहते हैं और शक, हूण, कुषाण व पूर्व में अहोम जैसे विभिन्न समुदायों के मिलन से एक मिश्रित और बहुवादी सभ्यता यहाँ अस्तित्व में आई।

भारत देश के प्रतीक कौन हैं? योगी और गोडसे शिवाजी और राणा प्रताप को राष्ट्र नायकों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। शिवाजी के प्रशासन में मुसलमान बहुत से उच्च सैन्य एवं असैन्य पदों पर थे। उन्होंने औरंगजेब के खिलाफ युद्ध लड़ा जिसकी सेना का नेतृत्व मिर्जा राजा जयसिंह के हाथ में था। राणा प्रताप द्वारा हल्दीघाटी में दिखाई गई वीरता स्तुत्य है पर क्या यह भारतीय राष्ट्रवाद के लिए किया गया संघर्ष था? उनकी सेना में 3000 सिपाही थे जिनमें से एक हजार पठान थे जिनका नेतृत्व हाकिम खान सूर करते थे। दूसरी ओर अकबर की सेना के प्रमुख मानसिंह थे।

युद्ध राष्ट्रवाद के मुद्दे पर नहीं, बल्कि मनसब के मुद्दे पर लड़ा गया था। हिंदू राष्ट्रवादी भले ही मुसलमानों के खिलाफ युद्ध लड़ने वालों को राष्ट्र नायकों की तरह प्रस्तुत करना चाहते हों, लेकिन पूरी कहानी इससे ज्यादा जटिल है। यह राजाओं की राजाओं से लड़ाई थी न कि हिंदुओं की मुसलमानों से।

ऐसा भी नहीं है कि सारे मुस्लिम राजा जालिम थे और हिंदू राजा शांति के पुजारी थे। कलिंग युद्ध के संबंध में अशोक की कितनी बदनामी है। चोल राजाओं का चालुक्य राजाओं के खिलाफ युद्ध भी अनेक क्रूर घटनाओं के लिए जाना जाता है जिनमें राजेन्द्र चोल की विजयी सेना ने पराजित चालुक्य राजा के सेनापति समुद्रराज का सिर काट दिया जाना और उसकी पुत्री की नाक काट देना शामिल है।

औरंगजेब का दानवीकरण राजनैतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है और हिंसा और गौमांस, लव जिहाद जैसे मुद्दों के जरिए मुसलमानों के एक वर्ग को आतंकित और एक दायरे में सिमटने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। औरंगजेब को आज के असहाय मुस्लिम समुदाय से जोड़ना कैसे न्यायोचित है।

जहां तक इतिहास का सवाल है, उसे कई तरीकों से प्रस्तुत किया जा सकता है। हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व राजाओं को इसलिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं क्योंकि वे अतीत में हुई जाति-वर्ण की ऊंच-नीच से जुड़ी क्रूरताओं और महिलाओं के दमन को छिपाना चाहते हैं। अम्बेडकर भारत के इतिहास को बौद्धवाद और ब्राम्हणवाद के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार बौद्व धर्म का उदय ब्राम्हणवादी जातिवादी-वर्णवादी मूल्यों के खिलाफ एक क्रांति के रूप में हुआ। और इसी वजह से बौद्ध धर्म भारत का एक प्रमुख धर्म बन गया।

अशोक ने इसे दक्षिण पूर्व एशिया में फैलाया और एक विश्वव्यापी धर्म बन गया। अंबेडकर के अनुसार इस क्रांति के बाद पुष्यमित्र शुंग के नेतृत्व में एक प्रतिक्रांति हुई जिसने हिंसा के जरिए बुद्ध धर्म और बौद्धों का सफाया कर दिया और उसका भारत से लोप हो गया। भारत में उसे दुबारा अंबेडकर लाए।

भारत में दलितों और महिलाओं पर अत्याचार आम बात थी। औपनिवेशिक काल में हुए समाज सुधारों से इनमें कमी आई लेकिन ये किसी न किसी रूप में आज भी अस्तित्व में हैं। क्या राजा राममोहनराय भारत के एक महान व्यक्तित्व नहीं हैं? जोति राव फुले और बाबासाहेब अम्बेडकर, जिन्होंने जाति-वर्ण व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया, के बारे में क्या कहा जा सकता है? क्या वे भारत के प्रतीक नहीं थे, और आप भगत सिंह और अशफाकउल्लाह को किस श्रेणी में रखेंगे? गांधी, मौलाना आजाद, सरदार पटेल, नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस का नाम भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

मुस्लिम राजाओं के जुल्मों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से हिन्दू राष्ट्र के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में दो तरह से मदद मिलती है। एक ओर इसके जरिए धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निशाना साधा जाता है और दूसरी ओर, अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे हिन्दू राष्ट्रवाद के आधार, ब्राम्हणवादी व्यवस्था, द्वारा समाज के कमजोर तबकों पर ढहाये गए अत्याचारों पर पर्दा पड़ता है। प्रधानमंत्री से लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तक, सभी ने फिल्म छावा की तारीफों के पुल बांधे। अब मुख्यमंत्री इसे ही नागपुर में हुए साम्प्रदायिक तनाव के लिए दोषी ठहरा रहे हैं।

क्या इन महानुभावों ने कभी ऐसी फिल्मों की प्रशंसा की जिनमें अतीत में दलितों और महिलाओं पर किए गए जुल्मों को दिखाया गया हो? यह एक तथ्य है कि भाजपा की तब की प्रमुख नेत्री, विजयाराजे सिंधिया ने सती प्रथा (पति की चिता पर पत्नि को जिंदा जला दिया जाना) का समर्थन किया था और आज योगी-फणनवीस-होसबोले साम्प्रदायिक मुद्दों जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं।

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

+ There are no comments

Add yours

You May Also Like

More From Author