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मनोज सिन्हा की ताजपोशी: कश्मीर पर निगाहें, बिहार पर निशाना

जिस राजनेता का नाम कभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए चला हो और अंतिम समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हस्तक्षेप पर कट गया हो, उसे यानि मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उप राज्यपाल बनाकर फ़िलहाल सक्रिय राजनीति से बाहर कर दिया गया है।

यह उसका प्रमोशन माना जाएगा या डिमोशन यह आप पाठक तय करें। धारा 370 हटने के बाद केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में उप राज्यपाल का पद शोभा की वस्तु है, क्योंकि सारे महत्वपूर्ण निर्णय सेना, एनएसए और केंद्र सरकार द्वारा लिए जा रहे हैं।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि बिहार चुनाव में भूमिहार वोट बैंक को साधने के लिए मनोज सिन्हा को जम्मू कश्मीर का उप राज्यपाल बनाया गया है, क्योंकि भूमिहार मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए कांग्रेस और राजद ने अपने दरवाजे खोल रखे हैं और कन्हैया कुमार फैक्टर से भाजपा का भूमिहार जनाधार तेजी से खिसक रहा है।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह मनोज सिन्हा पर काफ़ी भरोसा करते हैं। इसी कारण उनका नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी आया, हालांकि संघ के हस्तक्षेप से बाज़ी योगी आदित्यनाथ ने मार ली। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा को  हार का सामना करना पड़ा।

इसके बाद लगातार चर्चा रही कि मनोज सिन्हा को या तो संगठन में महामंत्री, उपाध्यक्ष या राज्य सभा में भेजा जाएगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब मनोज सिन्हा अचानक जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल बना दिए गए।

इसके बाद मोदी सरकार के इस निर्णय के समर्थन और मनोज सिन्हा की काबलियत को लेकर कलमतोड़ आर्टिकल देखने को मिल रहे हैं। जानकारों की राय है कि रेल राज्य मंत्री या दूरसंचार राज्य मंत्री के रूप में मनोज सिन्हा कोई विशिष्ट छाप नहीं छोड़ सके थे। रेलवे की बदहाली तो पूरा देश देख रहा है।

दूरसंचार राज्य मंत्री के रूप में मनोज सिन्हा ने पदभार संभालते ही दावा किया था कि मोबाइल पर कालड्राप की समस्या दो महीने में दूर हो जाएगी और बीएसएनएल में जल्दी ही 4जी सेवा शुरू होगी। पर न तो मनोज सिन्हा के कार्यकाल में यह पूरा हो सका न ही आज तक कालड्राप की समस्या दूर हो सकी। जब 5जी तकनीक की ओर दुनिया जा रही है बीएसएनएल 3जी के दौर में ही पड़ा हुआ है।

पांच अगस्त को ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का ठीक एक साल पूरा हुआ है। उनको जीसी मुर्मू की जगह जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल का दायित्व सौंपा गया है। मनोज सिन्हा 1996, 1999 और 2014 में तीन बार सांसद रह चुके हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के बड़े चेहरे हैं।

दावा किया जा रहा है कि इस वक़्त मोदी सरकार को जम्मू कश्मीर में एक राजनेता की ज़रूरत है, जिसके पास प्रशासनिक अनुभव भी हो। उस खांचें में मनोज सिन्हा बिल्कुल फ़िट बैठते हैं, क्योंकि जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल का पद केवल प्रशासनिक पद नहीं है, नई परिस्थिति में वो एक राजनीतिक पद भी हो गया है, जब तक वहां चुनाव नहीं हो जाते।

केंद्र की इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए मनोज सिन्हा उपयुक्त हैं, जबकि हकीकत बिलकुल इसके विपरीत है, क्योंकि जम्मू कश्मीर में उनके लिए कुछ करने को है ही नहीं।

जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल रहे गोवा के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जम्मू-कश्मीर और वहां के राज्यपालों को लेकर बड़ा बयान दिया है। समाचार एजेंसी एएनआई ने एक वीडियो जारी किया है, जिसमें राज्यपाल सत्यपाल मलिक कहते हैं, ‘गवर्नर का कोई काम नहीं होता। कश्मीर में जो गवर्नर होता है वो अक्सर दारू पीता है और गोल्फ खेलता है। बाकी जगह तो गवर्नर होते हैं वो आराम से रहते हैं, किसी झगड़े में पड़ते नहीं हैं।

भूमिहारों का एक वर्ग मनोज सिन्हा की ताजपोशी से खुश है पर दूसरा एक बड़ा वर्ग सवाल उठा रहा है कि यह मनोज सिन्हा को उपराज्यपाल बनाकर सक्रिय राजनीति से दूर करना है। मनोज सिन्हा के उपराज्यपाल बनने पर जहां समर्थकों में उत्साह है, विरोधी भी प्रसन्न हैं।

मनोज सिन्हा भले ही पिछला चुनाव हार गए हों, लेकिन गाजीपुर की जनता के बीच आज भी मनोज सिन्हा की छवि बेहद साफ-सुथरी है। अगले लोकसभा चुनाव में मनोज सिन्हा फिर से सक्रिय राजनीति में वापसी करते हैं या संवैधानिक पद पर बैठ कर सक्रिय राजनीति से दूर रहते हैं यह लाख टके का सवाल है, जिसका जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है ।

उपराज्यपाल की रेस में जिन लोगों का नाम चल रहा था, उसमें मनोज सिन्हा शामिल नहीं थे, इसके बावजूद मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल क्यों बनाया गया इस पर कयासबाजी का दौर जारी है।

मनोज सिन्हा के उपराज्यपाल पद पर नियुक्ति के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट करके कहा कि कल रात एक या दो नाम थे, जिनके नाम सामने आए थे, इनका नाम उनके बीच नहीं था। आप इस सरकार पर हमेशा भरोसा कर सकते हैं कि ये स्रोतों से पहले लगाए गए किसी भी कयास के विपरीत अप्रत्याशित नाम सामने आता है।

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 के हटाए जाने की पहली वर्षगांठ पर बुधवार देर शाम, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। मुर्मू ने देर रात राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इस्तीफा भी सौंप दिया था। मुर्मू को केंद्र सरकार ने सीएजी में नियुक्ति कर दिया है।

बिहार चुनाव से ठीक पहले उपराज्यपाल बना कर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। बिहार वमन एक जमाने से भूमिहार वर्ग और भाजपा/जनसंघ को एक दूसरे का पर्यायवाची माना जाता रहा है पर पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भूमिहार प्रत्याशियों को ताकत देने में उदारता से भूमिहारों का एक अच्छा खासा वर्ग कांग्रेस और राजद के पाले में शिफ्ट हुआ है। रही सही कसर सीपीआई नेता कन्हैया कुमार के उभरने से पूरी हो गई है। भूमिहारों का युवा वर्ग कन्हैया कुमार के साथ तेजी से जुड़ता जा रहा है।

पूर्वांचल से रोटी-बेटी के रिश्ते से जुड़े बिहार के भूमिहार समाज को सीधा संदेश देने की कोशिश की गई है। इसके अलावा इस निर्णय को वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए पूर्वांचल में जमीन मजबूत करने की कवायद से जोड़ा जा रहा है।

वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल सिन्हा को जम्मू कश्मीर की नई जिम्मेदारी देकर पार्टी ने यूपी के सियासी समीकरण भी साधे हैं। बिहार में यदि बहुसंख्यक भूमिहार मतदाता भाजपा से विमुख होते हैं तो यह एनडीए की चुनावी संभावना को धूमिल करेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 7, 2020 4:27 pm

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