ट्रंप की नई आक्रामकता के पीछे की वजह-1 

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई आक्रामकता को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया समूहों ने ‘आक्रामक राष्ट्रवाद’, ‘अत्यधिक संरक्षणवाद’ जैसे विभिन्न स्वरूपों के तौर पर वर्णित किया है, और उन्हें एक ‘नए व्यापार योद्धा’, ‘नए शीत युद्ध योद्धा’, और ‘मनमौजी की वापसी’ जैसी उपाधियों से नवाजा जा रहा है, जैसे मानो ‘एक नए निरंकुश की वापसी हो चुकी है जो मीडिया और मानव अधिकारों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर चुका है, और असहमतियों को कुचलने का काम कर रहा है’ जैसी व्याख्याएं बाजार में चल निकली हैं। इन सभी व्याख्याओं के पीछे जो मूल धारणा है वह यह है कि इस प्रकार का असामान्य राजनीतिक व्यवहार ट्रंप की व्यक्तिगत विचित्रताओं और उनकी अजीबोगरीब हरकतों की वजह से उत्पन्न हो रहा है और इसे उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक तुनकमिजाजी का हिस्सा माना जा रहा है।

लेकिन ट्रंप के व्यक्तित्व में के तौर पर सामने आयी ये समाजिक-राजनीतिक झक्कीपना असल में अमेरिकी पूंजीवाद के भीतर नई वास्तविकताओं एवं अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आ चुके नए तनाव बिंदुओं का प्रतीक है, भले ही अभी भी इसकी गिनती दुनिया के दो सबसे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक की हो रही है और यह शीर्ष पर बना हुआ है।

ये तनाव बिंदु ठीक-ठीक क्या हैं? ट्रंप की इस नई आक्रामकता का नया आर्थिक आधार क्या है? आइए इसकी गहराई में चलते हैं और अमेरिकी पूंजीवाद की स्थिति के बारे में विस्तार से परीक्षण करने का प्रयास करते हैं।

ट्रंप के व्यापार युद्ध की धमकियां

ट्रंप की नई आक्रामकता का सबसे प्रमुख पहलू मुख्यतया चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध की धमकी है, लेकिन इसमें कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय संघ और भारत जैसे देश भी शामिल हैं। वे टैरिफ बढ़ाने में पूरी तरह से तल्लीन नजर आते हैं, विशेषकर बाकी के देशों के द्वारा अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं के आयात पर लगाए जाने वाले उच्च टैरिफ के खिलाफ। यहां तक कि उन्होंने हाल ही में पारस्परिक टैरिफ नीति का भी ऐलान कर दिया है जो एक तरह से अमेरिका के सभी प्रमुख व्यापारिक भागीदार देशों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक प्रतिकार टैरिफ माना जा रहा है।

ट्रंप का दृढ़ मत है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मामले में अमेरिका के लिए कोई लेवल प्लेईंग फ़ील्ड नहीं रखा गया है, और सिर्फ उनके पारस्परिक टैरिफ के माध्यम से ही इसे समतल किया जा सकता है, विशेषकर वे देश जिनके बारे में उनका मानना है कि उन्होंने अमेरिका के खिलाफ बेहद ऊंचे टैरिफ लगा रखे हैं। वे इस बात से बेहद खफ़ा हैं कि अमेरिका का लगभग सभी प्रमुख व्यापारिक भागीदार देशों  के साथ उच्च व्यापार घाटे की स्थिति है।

नव ट्रंपवाद का सामाजिक आधार

ट्रंप की आक्रामक मुद्रा उनके राजनीतिक आधार के बड़े हिस्से के साथ काफी अच्छी तरह से मेल खाती है। उस संकटग्रस्त बुर्जुआ वर्ग के साथ, जो अमेरिकी पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्रों में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन की मार से पीड़ित है, जो न सिर्फ चीन से आने वाले सस्ते माल के हमले को झेल रहा है, बल्कि कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय संघ और यहां तक कि मैक्सिको और भारत से भी वह मुकाबले की स्थिति में खुद को नहीं पा रहा है।

राजनीतिक लिहाज से, यदि इसे चुनावी राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में समझें तो जिन अमेरिकी राज्यों को नीले राज्यों के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है, वहां पर डेमोक्रेट्स का समर्थन आधार मजबूत होगा, जबकि लाल राज्यों में रिपब्लिकन का समर्थन आधार मजबूत होगा। हालांकि कुछ नीले राज्यों, जैसे मिशिगन, विस्कॉन्सिन और इलिनॉय में भी विनिर्माण से जुड़ी नौकरियों में गिरावट आई है, किंतु डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन और ब्लू कॉलर बेरोजगारी वाले अलबामा, ओहियो और वेस्ट वर्जीनिया जैसे रेड स्टेट्स में स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर है।

अमेरिकी विनिर्माण का संकट

यहां का ऑटोमोटिव उद्योग अलबामा राज्य के डेट्रॉयट शहर में केंद्रित है और अमेरिकी ऑटो उद्योग में जो संकट गहराया हुआ है, वह यहां पर प्रमुखता से छाया हुआ है। डेट्रॉयट आज भयानक डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन के उपरान्त, ऑटो सिटी के स्थान पर औद्योगिक बंजर भूमि की तरह नजर आता है, जो बंद पड़े कारखानों से भरा पड़ा है और बेरोजगार श्रमिकों की यहां पर भरमार है, जो किसी तरह बेरोजगारी भत्तों पर गुजर-बसर कर रहे हैं। आउटसोर्सिंग और सस्ते आयात के चलते घरेलू बाजार में नौकरियों के खात्मे के खिलाफ ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों को यहां का संकटग्रस्त बुर्जुआ वर्ग और पीड़ित श्रमिक वर्ग दोनों के द्वारा व्यापक समर्थन हासिल है।

अमेरिकी माल और सेवाएं लगातार सस्ते विदेशी वस्तुओं और सेवाओं की मार से पीड़ित हैं, और यही वह मुख्य वजह है जो अमेरिकी विनिर्माण के संकट को गहरा रहा है। वैश्विक बाजारों में अमेरिकी निर्यात कम से कम प्रतिस्पर्धी रह पा रहे हैं। इसका सामाजिक प्रभाव उद्योगों के बंद होने और बड़े पैमाने पर नौकरियों के नुकसान के रूप में देखने को मिल रहा है।

ट्रंप की नई आक्रामक व्यापार नीतियों की पृष्ठभूमि में यही वह मुख्य प्रस्थान बिंदु है, जो उनके चीन, कनाडा, मैक्सिको, और यहां तक कि यूरोपीय संघ के खिलाफ की जाने वाली बयानबाजियों और धमकियों में परिलक्षित हो रही है, जिसे आधार बनाकर उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में इससे प्रभावित होने वाले वर्गों में अपने लिए समर्थन जुटाया और कमला हैरिस के खिलाफ चुनावी जीत दर्ज करने में सफल रहे। अमेरिकी मतदाता भी इस बात से सहमत थे कि अमेरिकी विनिर्माण के कुछ क्षेत्रों को संरक्षित किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन क्या टैरिफ लगाने से अस्थायी तौर पर ही राहत मिलने जा रही है? क्या यह दीर्घकाल के लिए इस समस्या को सुलझा सकने में समर्थ है?

विदेशों में अमेरिकी माल और सेवाओं की घटती प्रतिस्पर्धात्मकता

मौजूदा अमेरिकी पूंजीवाद के तनाव की जड़ में मूल समस्या है, अमेरिकी अर्थव्यवस्था निर्यात के मामले में खुद को दूसरे देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बना पाने की स्थिति में नहीं है। पिछले तीन दशकों से अमेरिका वैश्विक निर्यात में अपनी हिस्सेदारी को सिकुड़ते हुए पा रहा है। 1990 के सकल वैश्विक निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 22.47% हुआ करती थी। 2000 में यह घटकर 18.16% रह गया था, और 2010 में और गिरकर 11.70% हो गया था। 2020 में इसमें कुछ हद तक सुधार देखने को मिला, और यह बढ़कर 13.44% तक पहुंच गया था, लेकिन उसके बाद 2024 में इसके मात्र 10.5% के आसपास रह जाने की उम्मीद है।

इसकी एकमात्र बड़ी वजह दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन जैसे अधिक प्रतिस्पर्धी निर्यात वाली अर्थव्यवस्थाओं और अमेरिकी महाद्वीप के भीतर कनाडा, ब्राजील और मैक्सिको जैसे देशों का उभरना है, जिन्होंने नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (NAFTA) को पूरी तरह से अपने फायदे और अमेरिका के लिए नुकसान के तौर पर तब्दील कर डाला है!

यह एक नई विरोधाभासी स्थिति थी कि दुनिया की सबसे उत्पादक अर्थव्यवस्था कम से कम प्रतिस्पर्धी होती जा रही थी। इसके साथ ही एक और दुविधा यह बनी हुई है कि डॉलर के लगातार मजबूत बने रहने के कारण सारी दुनिया से पूंजी का प्रवाह अमेरिका में हो रहा है। लेकिन मजबूत डॉलर के चलते अमेरिकी माल और सेवायें विदेशी बाजारों में महंगी हो जाती हैं, और प्रतिस्पर्धी नहीं रह जातीं।

आर्थिक मंदी की ओर बढ़ती अमेरिकी अर्थव्यवस्था

इसके साथ ही, एक मजबूती से बढ़ती अर्थव्यवस्था, जिसमें उत्पादकता में पर्याप्त वृद्धि हो, वही सतत निर्यात वृद्धि को समर्थन प्रदान कर सकती है। लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी का रुझान दिख रहा है। 2025 में अमेरिकी विकास दर के 1.6% रहने का अनुमान है और 2026 में संभावित संकुचन (या नकारात्मक वृद्धि) के -2.1% हो जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। अमेरिकी मंदी की परिभाषा के मुताबिक लगातार दो तिमाही में यदि नकारात्मक वृद्धि दर पाई जाती है, तो उसे मंदी कहा जाता है।

इसलिए, इस बात की पूरी-पूरी आशंका है कि 2026 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी में प्रवेश कर जाएगी। दूसरे शब्दों में कहें तो, ट्रंप 2.0 एक ऐसी अर्थव्यवस्था को विरासत में ग्रहण कर रहा है जो मंदी में प्रवेश करने जा रही है। यह संभावित मंदी अमेरिकी निर्यात को और कमजोर करने जा रही है।

मार्क्सवादी सिद्धांतों में, पूंजीवाद के आवधिक संकट में जब आर्थिक उछाल का चरण मंदी के दौर में तब्दील होने लगता है, तो पूंजीवाद का राजनीतिक नेतृत्व और सत्ता स्वंय पूंजी को बचाने के लिए क्षतिपूरक उपायों के साथ सामने आ जाते हैं। ट्रंप की इस नई आक्रामकता के पीछे का यही मूल निचोड़ है। लेकिन यह नई आक्रामकता अपने विरोधाभासों और आत्म-खंडनों के बगैर भी नहीं है।

सबसे पहला और सर्वाधिक महत्वपूर्ण आत्म-खंडन यह है कि क्या पूंजीवादी विकास को कायम रखने के लिए बुर्जुआ वर्ग के लिए फ़ेडरल फंडिंग के तौर पर सरकार के द्वारा बड़े पैमाने पर मदद की जानी चाहिए। मार्क्सवादी परंपरा में, यह लेनिन थे जिन्होंने सबसे पहले 20वीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी देशों के उन्नत पूंजीवाद को स्टेट-मोनोपली कैपिटलिज्म के तौर पर व्याख्यायित किया था।

अपनी दो रचनाओं,  “इम्पीरियलिज्म, द हाइएस्ट स्टेज ऑफ कैपिटलिज्म” और “स्टेट एंड रिवॉल्यूशन” में, उन्होंने दर्शाया था कि किस प्रकार पूंजीवादी राज्य सार्वजनिक धन को पूंजीपतियों के हाथों में पहुंचाकर पूंजीवादी विकास को बरकरार रखने और उसे बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, यह सब आंतरिक विरोधाभासों के बगैर संभव नहीं है। पूंजीवाद में नव-उदारवादी स्कूल किसी भी प्रकार के राज्य विनियमन का विरोध करता है, हालांकि पूंजीवाद को यदि राज्य-प्रोत्साहन और सरकार की मदद मिले तो उससे उसे कोई परहेज नहीं होता।

2008 की वैश्विक मंदी और नवउदारवाद का संकट

हम इस बात को देख चुके हैं कि 2008 के वैश्विक पूंजीवादी संकट के दौरान किस प्रकार से अमेरिकी राज्य ने पूंजीवादी एकाधिकारों को बचाने के लिए बेलआउट के साथ हस्तक्षेप किया था। चूंकि यह वित्तीय संकट के बतौर शुरू हुआ था, जिसके चलते बैंकों और वित्तीय निवेश फर्मों के दिवालियेपन की स्थिति उत्पन्न हो गई थी, और चूंकि लेहमैन ब्रदर्स जैसे वित्तीय दिग्गज के 600 बिलियन डॉलर ऋण और निवेश के  जोखिम के तहत आने से फर्म दिवालिया हो गई थी, उस समय अमेरिकी सरकार ने पूरी ताकत से काम किया और बेलआउट में करीब 700 बिलियन डॉलर खर्च कर डाले।

इसके तहत, वित्तीय और बीमा प्रमुख AIG ग्रुप को 182 बिलियन डॉलर का बेलआउट दिया गया, बैंक ऑफ अमेरिका को 45 बिलियन डॉलर, सिटी ग्रुप को सीधे 45 बिलियन डॉलर का बेलआउट और उसकी नॉन-परफार्मिंग असेट्स के लिए 300 बिलियन डॉलर तक की स्टेट गारंटी की व्यवस्था की गई। यहां तक कि जेपी मोर्गन जैसी निवेश फर्मों को 25 बिलियन डॉलर और गोल्डमैन सैक्स को 10 बिलियन डॉलर की मदद प्राप्त हुई। यहां पर सवाल अग्रणी एकाधिकार पूंजीवाद के अस्तित्व के संकट को लेकर था। इस प्रकार, 21वीं सदी के पहले बड़े पूंजीवादी संकट की पृष्ठभूमि में देखने पर पता चलता है कि किस प्रकार, राज्य की अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए और सारा कुछ बाजार की शक्तियों के भरोसे छोड़ देना चाहिए, वाले नव-उदारवादी सिद्धांत धुएं में उड़ा दिए गये!

फिर हमने देखा कि किस प्रकार से कोविड-19 महामारी के दौर में अमेरिकी राज्य ने अमेरिकी निगमों को मदद पहुंचाने के लिए तकरीबन 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर डाले। नव-उदारवाद के सिद्धांतकारों ने यह बहाना बनाकर पूरी तरह से चुप्पी साध ली थी कि यह तो एक असाधारण परिस्थिति थी।

इस सबके बावजूद, नव-उदारवादी सिद्धांतकारों का यह तर्क अभी भी जारी है कि पूंजीवाद की व्यवहार्यता के लिए सबसे बेहतर गारंटी यही है कि राज्य की भूमिका को कम से कम रखा जाये। ट्रंप भी इस आत्म-विरोध से मुक्त नहीं थे।

हालांकि ट्रंप ने AI के लिए 500 बिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट की घोषणा कर दी है, लेकिन उनकी इच्छा थी कि इसे निजी निवेश तक सीमित रखा जाये। हालिया पेरिस AI सम्मेलन में, जिसकी सह-अध्यक्षता में मोदी भी शामिल थे, में अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वांस ने ट्रंप की बातों को दोहराया और AI के लिए यूरोपीय संघ के रेगुलेशन प्रस्ताव पर जमकर हमला किया और अनरेगुलेटेड AI पूंजीवाद के पक्ष में वकालत की।

फ़ेडरल फंडिंग को लेकर ट्रंप की खुद के सिद्धांत से विरोध वाली स्थिति 

कोविड महामारी के बाद के दौर में कॉर्पोरेट घरानों को अमेरिकी फेडेरल फंडिंग को पुनर्गठित करने के पीछे आंशिक रूप से एक वजह यह थी कि तकरीबन सभी निगमों की यह मांग थी और साथ ही विश्व व्यापार संगठन (WTO) और NAFTA (जो बाद में USMCA जिसमें अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा के बीच समझौते के द्वारा इसे प्रतिस्थापित कर दिया गया) जैसे बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के द्वारा लगाये गये प्रतिबंध प्रमुख कारक रहे थे, और नतीजतन मुख्य रूप से तकनीकी नवाचार के लिए अनुसंधान और उन्नत संचार, डिजिटल तकनीकों और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे उच्च-तकनीक वाले क्षेत्रों के विकास के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाने लगा। इसे इस विश्वास के साथ किया गया था कि हाई-टेक में निवेश पूंजीवादी वृद्धि और विस्तार के लिए आज की जरूरत है।

बाइडेन प्रशासन के तहत, अमेरिकी सरकार ने संघीय सरकार के माध्यम से, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं तकनीकी विकास के लिए 150 बिलियन डॉलर तक का फ़ेडरल सपोर्ट मुहैया कराया।

लेकिन 20 जनवरी 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में दूसरी बार पदभार संभालने के ठीक एक सप्ताह बाद, 28 जनवरी 2025 को, ट्रंप ने सभी संघीय अनुदानों और ऋण पर प्रतिबंध लगा दिया, जो कि  मुख्य रूप से औद्योगिक क्षेत्रों एवं वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए तकनीकी समर्थन से संबंधित थे। हालांकि, पूंजीवाद के लिए ‘चेक एंड बैलेंस’ के तौर पर काम करते हुए एक अमेरिकी फ़ेडरल जज ने इन फंड्स को फ्रीज किये जाने के ट्रंप के निर्देश को अस्थायी तौर पर ब्लॉक कर दिया। इस मामले में अंतिम नतीजा क्या होने जा रहा है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

लेकिन, इससे पहले ही ट्रंप ने अपने एक विरोधाभासी कदम के तौर पर, 21 जनवरी 2025 को अमेरिका में AI के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 500 बिलियन डॉलर की स्टारगेट प्रोजेक्ट की घोषणा कर दी थी। हालांकि इसके साथ ही यह घोषणा की गई थी कि यह 500 बिलियन डॉलर ओपन AI, ओरेकल, और सॉफ्टबैंक से निजी निवेश के रूप में आएगा, लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि फिर ट्रंप सरकार ने इसकी घोषणा क्यों की। इस घोषणा में ही यह बात निहित है कि ट्रंप सरकार भी अमेरिका में AI के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए वित्तीय योगदान देगी, विशेषकर उस स्थिति में जब  AI के क्षेत्र में अमेरिका को न सिर्फ चीन बल्कि यूरोप से भी बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, जैसा कि पेरिस AI सम्मेलन में देखने को मिला है, जहां फ्रांस AI शक्ति के रूप में उभरते भारत के साथ टीम बना रहा है।

ट्रंप के करीबी सहयोगी और दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क, और नई AI तकनीक के बादशाह सैम अल्टमैन, जो कि एलन मस्क के प्रतिद्वंद्वी भी हैं, लेकिन ट्रंप के आंतरिक सलाहकार समूह में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुके हैं, ने अमेरिका में AI के बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के लिए राज्य समर्थन के ट्रंप के निर्णय को बड़े स्तर तक प्रभावित करने का काम किया है। इस फैसले तक पहुँचने में एक घटना ने विशेष रूप से मदद की है, और वह है एक बेहद छोटे चीनी स्टार्टअप डीपसीक के द्वारा अपने नवाचार AI कार्यक्रम के माध्यम से, जो अमेरिकी टेक दिग्गजों द्वारा खर्च की गई लागत के एक बेहद छोटे से अंश की मदद से विकसित किया गया था, ने फिलहाल माइक्रोसॉफ्ट, ओपन AI, एनविडिया और ओरेकल जैसे अमेरिकी AI तकनीक दिग्गजों को हिला कर रख दिया है।

तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के अलावा, अमेरिकी राज्य अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता को बनाए रखने के लिए व्यापार सौदों के माध्यम से भी कोशिशें कर रहा है। आइए इन व्यापार सौदों की समीक्षा करें।

(बी. सिवरामन स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। sivaramanlb@yahoo.com पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।)

जारी…

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