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Tuesday, September 28, 2021

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वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति पर फर्जी डिग्री घोटाले में शामिल होने और थीसिस चोरी का आरोप

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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) फिर एक बार सुर्खियों में आ गया है। सुर्खियों में आने का कारण पूर्व की भांति विश्वविद्यालय के कुलपति रजनीश शुक्ल हैं। शुक्ल अप्रैल 2019 में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति पद पर नियुक्त होते हैं। छात्रों की शिकायतों के अनुसार प्रवेश परीक्षा में धांधली की शिकायत के बाद भी कार्यवाही न किए जाने पर छात्रों के एक समूह द्वारा नागपुर न्यायालय में शिकायत को लेकर जाना, छात्रों के द्वारा अगस्त 2019 में कांशीराम की जयंती मनाने व देश में बढ़ते अपराध, साम्प्रदायिकता आदि विषय पर प्रधानमंत्री को सामूहिक रूप से पत्र लेखन कार्यक्रम किये जाने के कारण रजनीश कुमार शुक्ल के कार्यकाल में छह दलित-पिछड़ा जाति के छात्रों का पक्ष जाने बिना ही आनन-फानन में रातों-रात निष्कासन कर दिया जाना। बाद में जन दबाव के कारण चार दिन बाद ही तकनीकी त्रुटि का हवाला देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा निलंबन वापस ले लिया जाना जैसे कार्य शुक्ल को सुर्खियां दिलाए। हालिया घटना में शुक्ल अभी दो विभिन्न विवादों के कारण फिर से सुर्खियों में आ गए हैं।

पहली घटना संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से फर्जी डिग्री जारी होने के प्रकरण में 19 लोगों के खिलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश दिए जाने के सम्बन्ध में है। प्रत्यक्ष रूप से 19 लोगों की संलिप्तता एसआईटी (SIT) जांच में सामने आई है। इन नामों में कुलसचिव पद पर कार्य कर चुके तीन वरिष्ठ प्रोफेसर व अधिकारी और 10 कर्मचारियों के नाम सामने आ रहा है।

तीन प्रोफेसर में से एक नाम रजनीश शुक्ल भी शामिल हैं जो आजकल हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में कुलपति के पद पर काबिज़ हैं। अन्य गंगाधर पंडा, कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा, झारखंड में कुलपति पद पर कार्यरत हैं। वहीं अन्य आरोपी कर्मचारी अधिकारी दूसरे विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं और कुछ अपना कार्यकाल पूरा कर सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

शासन के नजरों में ये पूरा प्रकरण बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में शिक्षक भर्ती के दौरान संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की तरफ से जारी फर्जी डिग्रियों का भारी संख्या में उपयोग के कारण संज्ञान में आया। शासन के द्वारा पूरे प्रकरण की जाँच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन कर जाँच करने का आदेश दिया गया। जाँच में एसआईटी (SIT) ने सन् 2004 से 2014 के बीच चयनित शिक्षकों के दस्तावेज का पुनः सत्यापन करवाया तो पता चला कि इस पूरी प्रक्रिया में कई फ़र्ज़ी दस्तावेज मिले जिनको जारी करने वाला संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय था। जांच के दौरान संस्कृत विश्वविद्यालय में नियुक्त और कार्यभार संभालने वाले कुलसचिवों और परीक्षा नियंत्रकों को एसआईटी ने फर्जीवा़ड़े का दोषी माना।

उच्च शिक्षा विभाग के विशेष सचिव मनोज कुमार ने एसआईटी की जाँच रिपोर्ट का आधार पर बताया कि 19 लोगों ने पद पर रहते हुए अपने दायित्व का सही ढ़ंग से अनुपालन नहीं किया है। अनुचित लाभ अर्जित करने और निजी हितों के लिए डिग्रियों का फर्जी ढंग से सत्यापन किया और परीक्षा विभाग के दस्तावेजों के साथ हेर-फेर किया। विशेष सचिव ने निर्देशित किया है कि कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक, उपकुलसचिव और सहायक कुलसचिव के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई विश्ववविद्यालय अधिनियम-1973 के तहत होगी और दोषियों को किसी भी हाल पर छोड़ा नहीं जाएगा।

एसआईटी जांच में निम्न नाम सामने आये हैं-

1. प्रो. रजनीश कुमार शुक्ला- पूर्व कुलसचिव व परीक्षा नियंत्रक

2. दीप्ति मिश्रा: उप कुलसचिव परीक्षा, राजेंद्र सिंह रज्जू विश्वविद्यालय, प्रयागराज

3.विद्याधर त्रिपाठी- पूर्व कुलसचिव

4. योगेंद्र नाथ गुप्ता- पूर्व कुलसचिव

5. प्रो. गंगाधर पंडा- पूर्व कुलसचिव व परीक्षा नियंत्रक

6. प्रो. रमेश कुमार द्विवेदी- पूर्व कुलसचिव व परीक्षा नियंत्रक

7. आईपी झा- पूर्व उप कुलसचिव (परीक्षा)

8. सच्चिदानंद सिंह (पूर्व उपकुलसचिव/सहायक कुलसचिव)

9. महेंद्र कुमार-उप कुलसचिव (परीक्षा), सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, सिद्धा्र्थनगर

कर्मचारी

1. हरि उपाध्याय- प्रभारी सेवानिवृत्त

2. विजय शंकर शुक्ला-अधीक्षक सेवानिवृत्त

3. भगवती प्रसाद शुक्ला- प्रभारी सेवानिवृत

4. कृपाशंकर पांडेय- प्रभारी सेवानिवृत्त

5. मोहित मिश्रा- प्रोग्रामर

6. कौशल कुमार वर्मा – अधीक्षक

7. मिहिर मिश्रा- प्रभारी

8. शशींद्र मिश्र- सत्यापन अधिकारी

9. त्रिभुवन मिश्र- प्रभारी

10. विजय मणि त्रिपाठी- सिस्टम मैनेजर

दूसरी घटना रजनीश शुक्ल को लेकर दिनांक 14 मार्च को कारवां वेबसाइट पर छपी ख़बर के आधार पर पीएचडी की थीसिस की चोरी का मामला प्रकाश में आया है। रिपोर्ट के अनुसार रजनीश कुमार शुक्ल ने संपूर्णानंद विश्वविद्यालय के तुलनात्मक धर्म दर्शन के उपाचार्य (रीडर) पर कार्यरत होते हुए बीएचयू की डॉ. सुधा पांडेय के शोध-प्रबंध की नकल करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। इस घटना को सर्वप्रथम विक्रय अधिकारी पद्माकर मिश्र ने उस वक्त के कुलपति रहे बिंदा प्रसाद मिश्र से लिखित शिकायत कर राजनीश शुक्ल पर आरोप लगाया था। थीसिस चोरी की घटना के बारे में डॉ. सुधा पांडेय को दैनिक जागरण के माध्यम से पता चला।

डॉ. सुधा पांडेय से जनचौक ने जब फोन से बात किया तो उन्होंने बताया कि वो काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के दर्शन एवं धर्म विभाग कला संकाय में “काण्ट के सौंदर्यशास्त्र विषयक विचारों का अध्ययन” के विषय पर शोध 1991 में कर पीएचडी (पंजीयन-147630) की उपाधि प्राप्त की थीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के दर्शन एवं धर्म विभाग, कला संकाय से ही रजनीश शुक्ल ने सुधा पांडेय से चार साल बाद “काण्ट का सौंदर्यशास्त्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन” विषय पर थीसिस (पंजीयन-222899) जमाकर 1995 में पीएचडी उपाधि प्राप्त की है।

सुधा पांडेय के अनुसार रजनीश कुमार शुक्ल ने उनकी थीसिस के शीर्षक के साथ हेर-फेर कर उनके शोध का शब्दशः अधिकांश हिस्सा नकल किया है। शुक्ल ने अपनी थीसिस में शोध का लगभग 80 प्रतिशत भाग हूबहू नक़ल किया है। शुक्ल ने अपनी चोरी पर पर्दा डालने के लिए उनकी थीसिस को अपना बता कर 2001 में “काण्ट का सौंदर्यशास्त्र शीर्षक” के नाम से पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी करवा दिया।

आगे सुधा बताती हैं कि उस वक्त मेरी आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी कि अपनी थीसिस के काम को किताब की शक्ल दे सकूं। उस वक्त वो पूरी तरह पति विष्णुदत्त पांडेय को 1987 में मिलने वाले जेआरएफ फेलाशिप के भरोसे ही थीं।

पांडेय का आरोप है कि वो पिछले आठ सालों से संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक अपनी शिकायत लेकर चक्कर कांट रही हैं पर उन्हें कहीं से भी न्याय नहीं मिल रहा है। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र और राज्य में सरकारें हैं और रजनीश शुक्ल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में लम्बे समय से सक्रिय रूप से जुड़े होने के कारण अच्छी पैठ सत्ता के गलियारों में है, जिस कारण उनके शिकायत करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती दिख रही है। इसके उलट रजनीश शुक्ल द्वारा शक्ति का दुरुपयोग कर किसी भी प्रकार की जांच को प्रभावित कर दिया जाता है।

गंभीर आरोपों के लगने के बाद भी रजनीश शुक्ल फिलहाल महाराष्ट्र के केंद्रीय विश्वविद्यालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में कुलपति के पद पर बदस्तूर कार्यरत हैं। रजनीश शुक्ल कुलपति होने के साथ-साथ उच्च शिक्षण संस्थानों की कई मुख्य समितियों में निर्णायक सदस्य की भूमिका का कार्यभार केंद्र सरकार ने उन्हें दे रखा है। शुक्ल जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), गुजरात विश्वविद्यालय और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कार्यपरिषद सदस्य भी हैं।

सुधा पांडेय थीसिस चोरी के प्रकरण में अब भी न्याय पाने की आस में आज भी वो संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक के चक्कर काट रही हैं पर उन्हें कहीं से भी न्याय की आस नज़र नहीं आ रही है। वो अपनी लड़ाई को अब भी जारी रखे हुए हैं।

शुक्ल से फोन के माध्यम् से जब दोनों प्रकरण पर जनचौक ने बात की तो उनका कहना था कि “संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय फर्जी डिग्रियों को लेकर जिस विवाद में मेरा नाम सामने आ रहा है वह बेबुनियाद है। बल्कि इस फर्जीवाड़े को उजागार कर शासन के सामने लाने वाला मैं ही था”। वहीं सुधा पांडेय की थीसिस चोरी के मामले में उनका कहना है कि “यह विवाद पंद्रह साल पहले का है और इस पूरे विवाद का फैसला पहले ही हो चुका है जिसमें मुझे आरोप मुक्त कर दिया गया था। पूरे प्रकरण को फिर से प्रकाश में लाकर सिर्फ मेरी छवि धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है”।  

छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एन. साईं बालाजी ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुलपति रजनीश शुक्ल गंभीर आरोपों में लम्बे समय से घिरे हुए हैं। अकादमिक भ्रष्टाचार के एसआईटी जांच में दोषी सिद्ध हुए हैं। कारवां वेबसाइट पर छपी ख़बर और सुधा पांडेय के आरोपों के अनुसार शुक्ल पीएचडी थीसिस चोरी कर सत्ता की शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हुए उच्च पद पर काबिज़ हैं। जिसका खुलासा कारवां की रिपोर्ट ने कर दिया है। ऐसे भ्रष्ट व्यक्ति शैक्षणिक जगत के लिए कलंक हैं जो आने वाली युवा पीढ़ी को सिर्फ बर्बाद ही करेंगे। उन्होंने कहा कि वह शुक्ल के खिलाफ संवैधानिक कार्यवाही के साथ उनकी सभी पदों से निलंबन की मांग करते हैं।

(स्वतंत्र पत्रकार राजेश सारथी की रिपोर्ट। सारथी खुद वर्धा विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके हैं।)

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