‘देश की बदनामी हुई’: नीट पेपर लीक मामले में आरोपी डॉक्टर को दिल्ली कोर्ट ने ज़मानत देने से इनकार किया

दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार (24 जुलाई) को बच्चों के डॉक्टर मनोज शिरूर को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। शिरूर नीट यूजी पेपर लीक मामले के आरोपियों में से एक हैं। कोर्ट ने कहा कि इस लीक से “देश की बदनामी” हुई है।

राउज़ एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज अजय गुप्ता ने 24 जुलाई के अपने आदेश में कहा, “यह सभी जानते हैं कि पेपर लीक का भारत और विदेशों में लाखों नीट उम्मीदवारों पर बुरा असर पड़ा है। अगर आरोपियों पर लगे आरोपों को… जैसा कि अब तक पेश किया गया है, उसी रूप में देखा जाए, तो पहली नज़र में यह साफ़ होता है कि अपने लालच और गैर-कानूनी तरीके से पैसा कमाने के लिए, उन्होंने न केवल उस परीक्षा की पूरी प्रक्रिया को खराब किया जिसे निष्पक्ष और बिना किसी गलती के आयोजित किया जाना था, बल्कि अपनी इन गैर-कानूनी हरकतों से देश की बदनामी भी कराई है।”

शिरूर पर मुख्य आरोप यह था कि महाराष्ट्र के लातूर में उनके द्वारा चलाए जा रहे सिद्धि विनायक अस्पताल का इस्तेमाल “अप्रैल 2026 में केमिस्ट्री का प्रश्न पत्र उपलब्ध कराने” के लिए किया गया था, जबकि परीक्षा 3 मई को होनी थी।

इस मामले की जांच कर रही सीबीआई ने आरोप लगाया है कि “डॉ. मनोज भगवानराव शिरूर ने सह-आरोपी शिवराज रघुनाथ मोटेगांवकर के बेटे आदित्य मोटेगांवकर को अप्रैल 2026 के तीसरे हफ़्ते में अपने अस्पताल में केमिस्ट्री का प्रश्न पत्र देखने में मदद की थी, और उक्त आरोपी की पत्नी से 5 लाख रुपये लिए गए थे, जिसे कथित तौर पर उसकी बहन के घर से ज़ब्त किया गया था।”

स्पेशल जज गुप्ता ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी के “घिनौने और गैर-कानूनी कामों” ने उन ईमानदार छात्रों का भरोसा तोड़ा है जो पूरी लगन और ईमानदारी से, और रात-दिन मेहनत करके इस परीक्षा की तैयारी करते हैं, ताकि वे अपने साथी उम्मीदवारों के साथ अपनी काबिलियत और हुनर के दम पर मुकाबला कर सकें।

जज ने कहा, “…सीबीआई की जांच और अब तक इकट्ठा किए गए सबूतों से यह साफ है कि मौजूदा आरोपी एक संगठित पेपर लीक गैंग का सक्रिय साजिशकर्ता है। आरोप है कि उसने परीक्षा की तय तारीख (यानी 03.05.2026) से काफी पहले ही पेपर लीक करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी।”

सीबीआई की ओर से वरिष्ठ सरकारी वकील नीतू सिंह पेश हुईं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि सीनियर मोटेगांवकर के मोबाइल फोन से मिले 136 हाथ से लिखे सवालों में से 111 सवाल नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा तैयार किए गए मास्टर क्वेश्चन सेट से मेल खाते थे। 

सिंह ने यह भी तर्क दिया कि पेपर लीक के कारण कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली और सरकारी खजाने को 600 करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ। उन्होंने कोर्ट को बताया कि दोबारा परीक्षा कराने के लिए असाधारण कदम उठाने पड़े, जिसमें हेलीकॉप्टर से परीक्षा केंद्रों तक प्रश्न पत्र भेजना भी शामिल था।

सीबीआई के अनुसार, मोटेगांवकर को ये सवाल सिद्धि विनायक अस्पताल परिसर में मिले थे। सीबीआई का आरोप है कि ये सवाल एनटीए के पैनल में शामिल अनुवादक पी.वी. कुलकर्णी ने लीक किए थे।

सीबीआई ने कोर्ट में कहा, “आरोपों से प्रथम दृष्टया पता चलता है कि आवेदक/आरोपी डॉ. मनोज भगवानराव शिरुरे एक संगठित परीक्षा धोखाधड़ी/साजिश में शामिल थे। जांच संवेदनशील और बड़े दायरे वाली है, और इस चरण में आवेदक/आरोपी को रिहा करने से जांच और/या मुकदमे पर बुरा असर पड़ सकता है।”

इससे पहले 9 जून को कोर्ट ने सह-आरोपी मनीषा संजय वाघमारे की ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी। अन्य आरोपियों की ज़मानत याचिकाओं पर आदेश अभी लंबित हैं।

सीबीआई के अनुसार, लीक हुए प्रश्न पत्रों की पीडीएफ फाइलें मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम के ज़रिए 10 लाख रुपये में बेची गई थीं।

जांचकर्ताओं ने इस मामले में कई गिरफ्तारियां की हैं, जिनमें दिल्ली, जयपुर, गुड़गांव, नासिक, पुणे, लातूर और अहिल्यानगर के शिक्षक और छात्र शामिल हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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