संविधान एक अनमोल धरोहर है, इसलिए कोई इसकी पहचान को नष्ट नहीं कर सकता: चीफ जस्टिस चंद्रचूड़

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कॉलेजियम सिस्टम को लेकर मोदी सरकार और न्यायपालिका में तकरार बढ़ता ही जा रहा है। केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 1973 में दिए गए फैसले पर सवाल उठाकर उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ ने जाने बर्रे के छत्ते को छेड़ दिया है।केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मुकदमे के फैसले से सुप्रीमकोर्ट ने भारत में डंके की चोट पर ये स्थापित कर दिया है कि देश में संविधान सर्वोच्च है। इससे ऊपर संसद भी नहीं है जहां जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं।चीफ जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़ ने संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन की तुलना ध्रुवतारा से की है, जो रास्ता बताता है। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचा सिद्धांत ध्रुव तारे की तरह है जो संविधान की व्याख्या करने वालों का मार्गदर्शन करता है। यह संविधान की व्याख्या और कार्यान्वयन करने वालों को एक निश्चित दिशा देता है। चीफ जस्टिस  ने कहा कि संविधान एक अनमोल धरोहर है, इसलिए आप इसकी पहचान को नष्ट नहीं कर सकते।

भारत के चीफ जस्टिस  डी. वाई. चंद्रचूड़ ने शनिवार को बुनियादी ढांचे के सिद्धांत को ध्रुवतारा के समान करार दिया। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचा सिद्धांत ध्रुव तारे की तरह है जो आगे का रास्ता जटिल होने पर मार्गदर्शन करता है। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जब आगे का रास्ता जटिल होता है तो भारतीय संविधान की मूल संरचना अपने व्याख्याताओं और कार्यान्वयन करने वालों को मार्गदर्शन और निश्चित दिशा दिखाती है।

जस्टिस चंद्रचूड़ की टिप्पणी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की हालिया टिप्पणी की पृष्ठभूमि में आई है, जिसमें उन्होंने 1973 के केशवानंद भारती मामले के ऐतिहासिक फैसले पर सवाल उठाया था।धनखड़ ने कहा था कि फैसले ने एक बुरी मिसाल कायम की है और अगर कोई प्राधिकरण संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाता है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि ‘हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं। चीफ जस्टिस  ने कहा कि संविधान एक अनमोल धरोहर है, इसलिए आप इसकी पहचान को नष्ट नहीं कर सकते।’

मुंबई में नानी ए पालकीवाला स्मृति व्याख्यान देते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि एक न्यायाधीश की शिल्पकारी संविधान की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए बदलते समय के साथ संविधान के पाठ की व्याख्या करने में निहित है। उन्होंने कहा कि हाल के दशकों में ‘नियमों का गला घोंटने, उपभोक्ता कल्याण को बढ़ावा देने और वाणिज्यिक लेनदेन का समर्थन करने’ के पक्ष में भारत के कानूनी परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है।हमारे संविधान की मूल संरचना या दर्शन संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, शक्तियों के पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, स्वतंत्रता और व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता पर आधारित है।’

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उभरती विश्व अर्थव्यवस्था ने राष्ट्रीय सीमाओं को मिटा दिया है और कंपनियां अब सीमा पर नहीं रुकती हैं। उन्होंने कहा कि संविधान सरकार को सामाजिक मांगों को पूरा करने के लिए अपनी कानूनी और आर्थिक नीतियों को बदलने और विकसित करने की अनुमति देता है।

उन्होंने कहा कि  समय-समय पर हमें अपने आसपास की दुनिया को रोशन करने के लिए नानी (पालकीवाला) जैसे लोगों को अपने हाथों में मशाल पकड़ने की आवश्यकता होती है। नानी ने हमें बताया कि हमारे संविधान की एक निश्चित पहचान है जिसे बदला नहीं जा सकता है। पालकीवाला और उनके कई प्रमुख मामलों के बारे में बात करते हुए चीफ जस्टिस  ने कहा कि वह संविधान में निहित मूल पहचान और मूलभूत सिद्धांत को संरक्षित करने में सबसे आगे थे।

चीफ जस्टिस ने मूल संरचना सिद्धांत के वैश्विक होने को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, जब भी एक कानूनी विचार किसी अन्य अधिकार क्षेत्र से ले जाया जाता है, तो यह स्थानीय बाजारों पर निर्भर अपनी पहचान में परिवर्तन के दौर से गुजरता है। भारत द्वारा मूल संरचना सिद्धांत को अपनाने के बाद, यह हमारे पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में चला गया। मूल संरचना सिद्धांत के विभिन्न सूत्रीकरण अब दक्षिण कोरिया, जापान, कुछ लैटिन अमेरिकी देशों और अफ्रीकी देशों में भी सामने आए हैं। महाद्वीपों में संवैधानिक लोकतंत्रों में प्रवासन, एकीकरण और मूल संरचना के सिद्धांत का सूत्रीकरण दुनिया के कानूनी विचारों के प्रसार की एक दुर्लभ सफलता की कहानी है। इससे बड़ा सम्मान हमारे लिए और क्या हो सकता है?

मूल संरचना सिद्धांत’ केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के प्रसिद्ध मामले में विकसित हुआ, जहां प्रसिद्ध न्यायविद नानी पालकीवाला ने भारती का प्रतिनिधित्व किया था। सिद्धांत में पालकीवाला के योगदान के बारे में बात करते हुए सीजेआई ने कहा, “अगर नानी ना होते तो हमारे पास भारत में मूल संरचना सिद्धांत नहीं होता।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि नानी पालकीवाला एक सच्चे संविधानविद थे जिन्होंने भारत के संविधान को प्रकट किया और अपना पूरा जीवन हमारे संविधान की अखंडता को बनाए रखने, भारतीय नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। संवैधानिकता की भावना की रक्षा के लिए नानी हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहे।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने याद किया कि आपातकाल घोषित होने के बाद नानी पालकीवाला ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का प्रतिनिधित्व करना बंद कर दिया था। जस्टिस चंद्रचूड़ ने मिनर्वा मिल्स मामले में सुनवाई के बारे में बात की जिसमें एक जज समाजवाद के गुणों के बारे में बात कर रहे थे।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि नानी बचपन में हकलाने की समस्या से पीड़ित थे और उन्होंने इस पर काबू पा लिया। नानी ने 11 साल की उम्र में अपने हकलाने को दूर करने के लिए भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया। उनके पिता ने युवा नानी को अपने मुंह में बादाम घुमाते हुए बोलने की प्रैक्टिस करने के लिए प्रोत्साहित किया। नानी ने ‘कोशिश करो और तब तक कोशिश करो जब तक तुम सफल नहीं हो जाते’ विषय पर भाषण दिया।विषय के सार के अनुसार नानी ने अपने हकलाने पर काबू पाया और फिर एक उत्कृष्ट वक्ता बन गए।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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