खेती के विकास के लिए 100 जिलों के लिए एक व्यापक योजना को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इस योजना के तहत विभिन्न तरह की 36 मौजूदा योजनाओं को एकीकृत किया जाएगा। साथ ही, प्रतिवर्ष 24,000 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है। इस योजना की अवधि 6 वर्ष निर्धारित की गई है। इसकी घोषणा में बताया गया है कि देश के प्रत्येक राज्य से कम से कम एक जिला इसमें शामिल किया जाएगा।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्र शासित प्रदेशों को इसमें शामिल किया जाएगा या नहीं। लेकिन, यह ज़रूर बताया गया है कि कृषि में पिछड़े जिलों को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके विकास के लिए तकनीक, भंडारण और प्रशिक्षण जैसी सुविधाएँ प्रदान की जाएंगी। देश के कुल लगभग 800 जिलों में से 100 जिलों को शामिल करने वाला यह प्रयास, क्षेत्रफल और किसानों की संख्या के हिसाब से काफी बड़ा है।
इस योजना पर चर्चा करने से पहले खेती से जुड़ी कुछ तकनीकी बातों को समझना ज़रूरी है। जब हम कृषि व्यवस्था की बात करते हैं, तो यह आधुनिक उत्पादन व्यवस्था में उद्योग और सेवा क्षेत्र के साथ गिने जाने वाले प्राथमिक उत्पादन क्षेत्र के रूप में चिह्नित होती है। खेती की उत्पादन व्यवस्था के तीन मुख्य हिस्से हैं, जो इसकी उत्पादकता को प्रभावित करते हैं: पहला, खेती का मालिकाना किसके पास है; दूसरा, खेती में उत्पादन का तरीका क्या है; और तीसरा, इस उत्पादन का संचयन और वितरण कैसे होता है।
खेती का मालिकाना खेत में उत्पाद और उसकी उत्पादन क्षमता दोनों को प्रभावित करता है। आजकल नकदी फसलों (कैश क्रॉप्स) की खेती की चर्चा खूब हो रही है। इस तरह की खेती का अंतिम निर्णय खेत का मालिक ही लेता है। इसी तरह, जब पंजाब में कुछ कॉर्पोरेट समर्थक बुद्धिजीवियों ने यह कहना शुरू किया कि यहाँ खेती अब घाटे का सौदा हो चुकी है और खेती के बुनियादी ढाँचे में बदलाव लाना चाहिए, तब किसानों को यह समझ में आने लगा कि दरअसल उनके खेती के मालिकाने पर दबाव बनाया जा रहा है।
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना इस मालिकाने के मुद्दे पर मौन है। यह योजना उत्पादन बढ़ाने, नकदी फसलों पर जोर देने और भंडारण-वितरण में सहयोग की बात करती है। यदि इस दिशा में किसानों को ऋण की आवश्यकता होगी, तो इसके लिए धन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया है। योजना में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि छोटे और सीमांत किसानों को विकास में मदद की जाएगी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह काम पहले से नहीं हो रहा है? और इस नई योजना में ऐसा क्या है, जो पहले की योजनाओं से गुणात्मक रूप से भिन्न है?
यहाँ तकनीकी बातों से हटकर इस योजना को बनाने की पद्धति की खामियों पर चर्चा करना अधिक उपयुक्त होगा। खेती पर्यावरण से सीधे जुड़ी उत्पादन पद्धति है। जिन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता अधिक है, वहाँ फसलों का पैटर्न अलग होगा। समुद्र तटीय क्षेत्रों में उत्पादन की व्यवस्था भिन्न होती है।
गंगा का मैदानी क्षेत्र एक खास तरह की फसलों के उत्पादन के लिए अनुकूल है। भारत में खेती के विकास की योजनाओं में हमेशा स्थानीय भू-परिस्थितिकी की विशिष्टता को ध्यान में रखा गया है। सिंचाई व्यवस्था, खाद और अन्य तकनीकी विकास ने निश्चित रूप से उत्पादन की संरचना में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि, यदि इन हस्तक्षेपों में निरंतर सुधार न किया जाए, तो ये लंबे समय तक स्थायी नहीं रह पाते। पंजाब और हरियाणा में गेहूँ और धान की खेती कैनाल कॉलोनियों से शुरू हुई। 1970 के दशक में ट्यूबवेल, खाद और रासायनिक पदार्थों के उपयोग से इन फसलों के उत्पादन में जबरदस्त उछाल आया। लेकिन, महज 30 वर्षों में इस उत्पादन पद्धति की खामियाँ सामने आने लगीं। इससे उत्पन्न संकट से हम सभी परिचित हैं।
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना में ऐसी किसी उत्पादन व्यवस्था से जुड़ी स्पष्ट पद्धति नहीं दिखती। इस योजना के तहत प्रत्येक राज्य से कम से कम एक जिले को लक्षित करने का प्रावधान है। ऐसे में यह किसी क्षेत्र-विशेष के खेती के विकास के लिए नहीं, बल्कि योजनाकारों के अनुकूल लगने वाले जिलों के चयन पर आधारित प्रतीत होती है। इस स्थिति में सिंचाई, तकनीकी सुविधाएँ, भंडारण और वितरण जैसी व्यवस्थाएँ इतने छोटे स्तर पर कैसे लागू होंगी, यह स्पष्ट नहीं है। 100 जिलों की खेती भारत के कुल कृषि क्षेत्र का लगभग दसवाँ हिस्सा है।
भारत के कई राज्यों में खेती का गंभीर संकट है। बिहार जैसे राज्यों में पिछड़ी उत्पादन पद्धति की समस्या है, तो महाराष्ट्र जैसे राज्यों में नकदी फसलों में हो रहे घाटे का संकट है। पंजाब का किसान बाजार की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि धन-धान्य कृषि योजना खेती के संकट को समग्रता में देखने और हल करने से क्यों कतरा रही है? यह इतने बिखरे हुए और गैर-पेशेवर तरीके को क्यों अपनाए हुए है? क्या योजनाकार खेती की उत्पादन व्यवस्था के लिए आवश्यक मौलिक दृष्टिकोण से अनभिज्ञ हैं? मेरा उत्तर होगा, नहीं। वे इसे अवश्य जानते होंगे।
भारत के उपनिवेशकाल से लेकर वर्तमान तक खेती के समग्र विकास के लिए कभी कोई ठोस योजना नहीं बनी। जो भी योजनाएँ बनीं, वे बहुत सीमित स्तर पर और बिखराव के साथ लागू हुईं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में खेती का एक सीमित हिस्सा कोऑपरेटिव सोसाइटी के भरोसे छोड़ दिया गया। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ जिलों को हरित क्रांति के तहत विकसित किया गया। बाद में दक्षिणी राज्यों के कुछ जिलों को इसमें शामिल किया गया। देश का बाकी हिस्सा प्रकृति के भरोसे खेती में जुटा रहा।
ऐसे में, धन-धान्य कृषि योजना से यह उम्मीद करना कि यह भारत की खेती में कोई गंभीर हस्तक्षेप करेगी, इसके प्रावधानों से नहीं बनता। कई योजनाओं को एक में मिलाकर, बजट का प्रावधान करके और उसे नया नाम देना संभव है, लेकिन यह सोचना कि इसके परिणाम गुणात्मक रूप से भिन्न होंगे, स्वयं को धोखा देने जैसा है।
भारत में खेती का संकट इसकी तीन-स्तरीय व्यवस्था में निहित है। जब दिल्ली में किसान आंदोलन इतिहास रच रहा था, तब सबसे बड़ी माँग थी कि खेती के उत्पाद का बाजार मूल्य निर्धारित हो और खेती को घाटे से उबारा जाए। लेकिन, इसके साथ ही किसानों में यह डर भी था कि वे अपनी जमीन का मालिकाना खो देंगे।
भारत की खेती में जमीन का मालिकाना सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आज भी अधिकांश किसान खेती के मालिकाना हक से वंचित हैं और खेती की बर्बादी के साथ अत्यंत कम आय वाला बदहाल जीवन जीने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, बड़ी परियोजनाओं के नाम पर भारत में जमीन की लूट का सिलसिला आज भी जारी है। खेती के संकट को हल करने के लिए इसके मूल तत्वों में हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
(अंजनी कुमार पत्रकार हैं)