कम से कम पंद्रह जाने-माने पूर्व सिविल सेवकों और कार्यकर्ताओं ने सोमवार (5 अक्टूबर) को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को “महाभियोग पत्र” सौंपा। उनके पत्र में उनसे जून 2025 से मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के संचालन के संबंध में उन पर लगे गंभीर आरोपों के मद्देनजर अपने पद से इस्तीफा देने का अनुरोध किया गया है।
यह नोटिस दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में जारी किया गया। इसमें ज्ञानेश कुमार पर मतदाता सूचियों के एसआईआर को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और उनसे पद से इस्तीफा देने की मांग की गई है।
नोटिस में एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने, चुनाव आयोग के कामकाज में कथित तौर पर सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन नहीं करने, फॉर्म 6 में कथित अवैध बदलाव, ईसीआईनेट के इस्तेमाल और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
इस नोटिस पर हस्ताक्षर करने वालों में कई पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इनमें दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लई, पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो स्पेशल डायरेक्टर यशोवर्धन आजाद और पूर्व केंद्रीय सचिव अमिताभ पांडे के नाम शामिल हैं। एक्टिविस्टों में अंजलि भारद्वाज, अमृता जोहरी और आइशी घोष समेत अन्य लोग शामिल हैं।
राजनीतिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव भी इस पहल में शामिल हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में इसे ‘पीपल्स नोटिस ऑफ़ इंपीचमेंट’ बताते हुए कहा कि संवैधानिक अधिकार के साथ संवैधानिक जवाबदेही भी जुड़ी होती है।
नोटिस में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सात हालिया घटनाओं और कथित कार्रवाइयों का ज़िक्र किया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं का दावा है कि इन घटनाओं के आधार पर सीईसी को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। नोटिस में कहा गया है कि एसआईआर के पूरा होने तक देश की वयस्क आबादी और मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं के बीच अंतर 15 करोड़ या उससे अधिक हो सकता है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के मूल सिद्धांत की अनदेखी बताया है।
चार्जशीट में पहला आरोप चुनाव आयोग के कलेक्टिव फंक्शनिंग यानी सामूहिक रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है। नोटिस में दावा किया गया है कि एसआईआर जैसे बड़े फैसलों पर चुनाव आयोग के सभी सदस्यों के बीच पर्याप्त चर्चा, विचार-विमर्श और परामर्श नहीं हुआ। आरोप है कि कुछ बड़े फ़ैसले आयोग के सामने सही तरीक़े से रखे बिना लिए गए।
इसमें हाल में सामने आई उन रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है, जिनके मुताबिक दो चुनाव आयुक्तों ने ऐसे फैसलों पर आपत्ति जताई थी जिन्हें कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना लिया गया। नोटिस के मुताबिक, अगर आयोग के नाम पर ऐसे फैसले लिए जाते हैं जिन्हें पूरे आयोग के सामने चर्चा के लिए रखा ही नहीं गया, तो यह संवैधानिक अधिकार के गंभीर दुरुपयोग का मामला हो सकता है।
चार्जशीट का दूसरा बड़ा मुद्दा फॉर्म 6 है। यह फॉर्म मतदाता सूची में नए मतदाता के नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 में बदलाव किया, जबकि आयोग के भीतर ही इस बदलाव को कथित तौर पर अनधिकृत और अवैध बताया गया था।
पूर्व नौकरशाह व एक्टिविस्ट हस्ताक्षरकर्ताओं का दावा है कि बाद में चुनाव आयोग ने मूल फॉर्म 6 को बहाल कर दिया। उनके मुताबिक, यह इस बात का महत्वपूर्ण संकेत है कि पहले किया गया बदलाव वैध अधिकार के तहत नहीं था।
चार्जशीट में फॉर्म 6 के इस्तेमाल को लेकर एक और गंभीर सवाल उठाया गया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि एसआईआर के दौरान जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हट गए थे और जो पहले चुनावों में वोट कर चुके थे, उन्हें दोबारा मतदाता सूची में शामिल होने के लिए फॉर्म 6 भरने की सलाह दी गई। नोटिस का दावा है कि फॉर्म 6 में आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार मतदाता सूची में शामिल होने के लिए आवेदन कर रहा है। हस्ताक्षरकर्ताओं का आरोप है कि इससे ऐसे नागरिकों को ऐसी घोषणा करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है जो उनकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती। फॉर्म 6 में गलत घोषणा करने पर आपराधिक सजा की चेतावनी भी होती है।
तीसरा आरोप ईसीआईनेट पोर्टल से केंद्रीकरण का है।नोटिस में पोर्टल और तकनीक के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं का आरोप है कि पोर्टल का इस्तेमाल इस तरह किया गया जिससे मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधारने के लिए कानून के तहत जिम्मेदार ईआरओ ईआरओ की भूमिका कमजोर या प्रभावित हुई। उनका दावा है कि ईसीआईनेट को लेकर उसकी कानूनी वैधता और कामकाज पर सवाल उठाए गए थे, इसके बावजूद इसका इस्तेमाल किया गया।
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने ईसीआईनेट पोर्टल के कामकाज की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने की घोषणा की थी। चार्जशीट में इसे भी चुनाव आयोग की ओर से सिस्टम की कानूनी और तकनीकी कार्यप्रणाली पर उठे सवालों की स्वीकारोक्ति के रूप में पेश किया गया है।
चौथा आरोप है कि एसआईआर को पर्याप्त तैयारी, परामर्श, नियम, प्रशिक्षण और गलत तरीके से हटाए गए नामों को तेजी से ठीक करने की प्रभावी व्यवस्था के बिना लागू किया गया। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में नागरिकों पर अपने मतदाता अधिकार को साबित करने का अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया।
नोटिस में दावा किया गया है कि एसआईआर से पहले की मतदाता सूचियों में 13.3 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं और यह चुनावी लोकतंत्रों के इतिहास में अभूतपूर्व संख्या है।
हस्ताक्षरकर्ताओं का अनुमान है कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया खत्म होने तक देश की वयस्क आबादी और मतदाताओं के बीच अंतर 15 करोड़ से अधिक हो सकता है। इसी आधार पर उन्होंने इसे दुनिया में ‘गायब मतदाताओं’ की सबसे बड़ी समस्या बनने की आशंका जताई है।
दावा किया गया है कि एसआईआर से होने वाली संभावित वोटर कटौती का असर समाज के कमजोर वर्गों पर ज्यादा पड़ा है। इसमें विशेष रूप से महिलाओं, गरीबों, प्रवासी मजदूरों, अल्पसंख्यकों और बुजुर्गों का उल्लेख किया गया है।
पांचवां आरोप यह है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणियों, कथित राजनीतिक बयानबाजी और एसआईआर से जुड़े फैसलों के कारण चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर गंभीर धारणा बनी है। इसी संदर्भ में नोटिस में कहा गया है, ‘आप अब उस खेल में रेफरी नहीं रह सकते, जिसमें आपको व्यापक रूप से एक खिलाड़ी के साथ खड़ा माना जाता है।’
छठा आरोप वैधानिक जिम्मेदारियों के उल्लंघन का है।चार्जशीट में जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1950 की धारा 32(1) का जिक्र किया गया है जिसके अनुसार चुनावी अधिकारी द्वारा मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन से जुड़े अपने आधिकारिक कर्तव्य का बिना सही कारण उल्लंघन करने को अपराध माना गया है।
नोटिस में फॉर्म 6 में कथित अनधिकृत बदलाव, ईआरओ की वैधानिक भूमिका को दरकिनार करने, तकनीकी सिस्टम के इस्तेमाल, रिकॉर्ड और जानकारी से जुड़े कथित मामलों को मिलाकर आधिकारिक कर्तव्य के जानबूझकर उल्लंघन का पैटर्न होने का आरोप लगाया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा है कि संवैधानिक पद पर होना किसी व्यक्ति को सामान्य कानूनी जिम्मेदारियों से ऊपर नहीं रखता।
नोटिस के अंत में हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा है कि जिन घटनाओं और कार्रवाइयों का उन्होंने उल्लेख किया है, उन्हें अलग-अलग प्रशासनिक गलतियों के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक, इन सभी मामलों को एक साथ देखने पर एक पैटर्न सामने आता है। इसी आधार पर उन्होंने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने और उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की मांग की है। पूर्व नौकरशाहों और एक्टिविस्टों ने ज्ञानेश कुमार से सीधे इस्तीफा देने की मांग भी की है। उनका कहना है कि गंभीर आरोपों के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त को पद पर बने रहने के बजाय इस्तीफा दे देना चाहिए।
(जनचौक ब्यूरो)