तानाशाही हमेशा गोलियाँ और टैंक लेकर नहीं आती… कभी-कभी अटपटे फ़ॉर्म और चुनावी धाँधली के रास्ते भी आती है।
एसआईआर को लेकर सवाल अब लगातार गहराते जा रहे हैं। इसके ज़रिए इस आधे-अधूरे लोकतंत्र को भी खत्म करने की साज़िशों की बू आ रही है।
निर्वाचन आयोग के ही दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने चुनाव प्रक्रिया में किए जा रहे बदलावों को लेकर पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के भीतर आपत्तियाँ दर्ज कीं। फॉर्म 6 को लेकर दोनों ने आपत्ति की। जोशी ने कहा कि निर्धारित फॉर्म 6 को नियमों में बदलाव किए बिना बदला नहीं जा सकता। बाद में संधू ने इस बदलाव को “अनधिकृत/अवैध” बताते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही। लेकिन फिर भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सारी आपत्तियों को अनदेखा कर अपनी मनमर्जी चलाये जा रहे थे, आख़िर क्यों?
और अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि संशोधित फॉर्म 6 को उसकी मंज़ूरी नहीं मिली थी, जबकि नियमों के मुताबिक इसे सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी से ही संशोधित किया जा सकता है।
अब सवाल है—इसे किसने बदला, किसकी मंज़ूरी से बदला और क्यों बदला?
तो सवाल सिर्फ एक फॉर्म 6 का नहीं है।
सवाल लोकतंत्र के उस दरवाज़े का है, जिससे होकर नागरिक सरकार चुनता है।
क्योंकि तानाशाही हमेशा टैंक, बंदूक और गोलियों के साथ नहीं आती।
कभी वह एक साधारण-से फ़ॉर्म के रास्ते आ सकती है,
कभी मतदाता सूची के रास्ते—असल नाम हटाकर, नक़ली नाम जोड़कर,
कभी ईवीएम की गड़बड़ियों के रास्ते,
कभी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), आयकर विभाग (आईटी) जैसी संस्थाओं के दुरुपयोग के रास्ते,
कभी विधायकों-सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त के रास्ते,
और कभी अदालतों के जनविरोधी फ़ैसलों के रास्ते।
सबसे बड़ा ख़तरा तब है—
जब जनता सरकार चुनने जाए, लेकिन उससे पहले यह तय किया जाने लगे कि कौन जनता की ओर से वोट देने का अधिकार रखता है और कौन नहीं।
फिर सवाल सीधा है—
लोकतंत्र में मतदाता सरकार चुनता है,
या किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी और उसकी चाटुकार संस्थाएँ मिलकर अब मतदाता चुनने लगी हैं?
क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव कराने का नाम नहीं है।
लोकतंत्र का अर्थ है—निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र मतदाता, बहुसंख्यक जनता के हितों के अनुरूप शासन-तंत्र और सत्ता की जवाबदेही।
क्या एसआईआर के नाम पर लोकतंत्र का गला नहीं घोंटा जा रहा है?
क्या संस्थाओं का दुरुपयोग करके तानाशाही कायम नहीं की जा रही है?
क्या इन सारी धाँधलियों के बढ़ने के साथ-साथ पूँजीपतियों और भ्रष्टाचारियों को देश को लूटने-खसोटने की छूट भी बढ़ती नहीं जा रही है?
क्या इसके विरोध में उठने वाली आवाज़ों का दमन करना और महिलाओं के साथ बदतमीज़ी करना सत्ता की गुंडागर्दी नहीं है?
अब सिर्फ सवाल नहीं—जवाबदेही चाहिए।
सबसे पहले, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, जो मतदाताओं का विश्वास खो चुके हैं, को तत्काल अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।
एसआईआर और फॉर्म 6 में हुए बदलावों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच हो। स्पष्ट किया जाए—बदलाव किसने किया, किसकी मंज़ूरी से किया और किसके निर्देश या प्रभाव में किया।
जिन राज्यों में एसआईआर के बाद चुनाव हो चुके हैं, वहाँ पूरी चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की स्वतंत्र जाँच हो। यदि यह साबित होता है कि एसआईआर के कारण वैध मतदाता मतदान से वंचित हुए, या फर्जी मतदाता जोड़े गए, या चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई, तो संबंधित चुनाव को रद्द कर पुनर्निर्वाचन कराया जाए।
एसआईआर में हटाए गए प्रत्येक मतदाता के मामले की स्वतंत्र समीक्षा हो और गलत तरीके से हटाए गए नाम तत्काल बहाल किए जाएँ।
निर्वाचन आयोग और प्रशासन के उन अधिकारियों की उच्चस्तरीय जाँच हो, जिन्होंने इस प्रक्रिया में निर्णय लिए। साथ ही, जिन राजनीतिक दलों, नेताओं या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों पर अनुचित दबाव या हस्तक्षेप के आरोप हैं, उनकी भी उच्चस्तरीय और समयबद्ध जाँच हो।
दोष सिद्ध होने पर सभी दोषियों को कानून के अनुसार कड़ी सज़ा दी जाए।
मामलों का समयबद्ध न्यायिक निपटारा हो, ताकि लोकतंत्र से जुड़े अपराध और अनियमितताएँ वर्षों तक फाइलों में दबी न रहें।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसने फॉर्म 6 बदला।
सवाल यह है—
क्या किसी ने मतदाता के अधिकार के साथ खिलवाड़ किया?
और अगर किया, तो जवाबदेह कौन है?
लोकतंत्र में मतदाता सरकार चुनता है—
सत्ता मतदाता नहीं चुनती।
(धर्मेंद्र आज़ाद की टिप्पणी)