भारत देश में बीते कुछ सालों से हर साल इंडिया लैंड एण्ड डेवलॉपमेंट कॉन्फ्रेंस (आईएलडीसी) का आयोजन किया जा रहा है। आईएलडीसी एक ऐसा अंतराष्टीय मंच है, जो भूमि शासन, नीति और विकास से जुड़े उभरते और दीर्घकालिक मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए अलग-अलग हितधारकों को एक मंच पर साथ लाता है। इनमें सरकारी निकाय, नागरिक संगठन, जमीनी कार्यकर्ताओं सहित अन्य लोग व संगठन शामिल होते हैं।
पिछले वर्ष 2025 की इस 9वीं कॉन्फ्रेंस का आयोजन 23 देशों के 492 प्रतिभागियों के साथ गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में किया गया। कॉन्फ्रेंस का कार्यक्रम 18 से 20 नवंबर अहमदाबाद मेनेजमेंट एसोसिएशन (एएमए) में सम्पन्न हुआ। कॉन्फ्रेंस में एक मुख्य और प्रबंधकीय भूमिका में ‘लैंडस्टैक’ संस्था रही। इस बार कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सतत विकास में भूमि की केन्द्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान’ था।
कॉन्फ्रेंस के अंतर्गत कार्यक्रमों में विभिन्न सत्रों का आयोजन किया गया। इन सत्रों में से 6 सत्र ‘होल्डिंग अवर ग्राउन्ड: वुमन लैंड एण्ड लाइफ, विषय पर आयोजित किये गए थे। इन 6 सत्रों पर कॉन्फ्रेंस के पहले दिन 18 नवंबर को संवाद किया गया। इस संवाद में डॉ सुशीला प्रजापति, डॉ चारु जैन, इब्राना नाज़, शिवानी गुप्ता, मधुबेन कोरडिया, बड़कीबाई, संध्या देवी, दामिनी रेगाड़े जैसी विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
मधुबेन कोरडिया गुज़रात से आती हैं। वे महिलाओं के भू-अधिकारों सहित अन्य अधिकारों पर कार्य करती हैं। अपने कार्य अनुभव के आधार पर वह कहती हैं कि, जमीन का अर्थ हर किसी के लिए अलग होता है। महिलाओं के लिए जमीन का अर्थ उनकी आर्थिक शक्ति का प्रमुख आधार है।
मगर, यह चिंतनीय है कि, गुजरात में महिलाओं को ऐसा कोई अधिकार नहीं है जो उन्हें जमीन दे सके और उसे सुरक्षित कर सके। यदि परिवार में जमीन है भी तो, वह केवल पुरुषों के नाम होती है। गुजरात जैसे राज्य में महिलाओं को जमीन के अधिकार का अवसर दिया जाना चाहिए। महिलाओं को जमीन मिलने से उन्हें आर्थिक आजादी में मदद मिलेगी। साथ में महिलाएं अपनी जमीन के सहारे कृषि, पशुपालन, औषधि पैदा करने जैसे रोजगार भी कर पायेंगी।
आज जमीन अधिकार की मांग पर किस तरह के हालात हैं, यह मेरे सामने आए एक मामले से समझा जा सकता है। कुछ दिन पहले तीन महिलाएं हमारे पास आयीं। उन्होंने हमें बताया कि, हम तीन बहनों ने अपने भाई से जमीन अधिकार की मांग की। मगर, इस मांग पर भाई की ओर से कहा गया कि, जमीन तो तुम्हें नहीं देंगे। हमने कहा कि, जमीन पर हमारा भी हक बनाता फिर क्यों ना हम जमीन लें। तब भाई ने कहा कि, जमीन नहीं दे सकते है। हाँ, लेकन, प्रत्येक बहन को 300000-300000 रुपए दे देंगे।
मगर, इसके बाद हम भाई-बहनों का कोई रिश्ता या संबंध नहीं रहेगा। इस घटना को जाहिर करने के बाद मधुबेन व्यक्त करती हैं कि, इस तरह के मामलों से कैसे निपटा जाए? ताकि महिलाओं को बिना विवाद के भू-अधिकार मिल पाए। इसका रास्ता हमें तलाशना होगा।
इस संवाद में उत्तर प्रदेश से आने वाली सीमा गौतम की भी भागीदारी रही। भूमि आधिकार पर अपना अनुभव साझा करते हुए सीमा कहती हैं कि, महिलाओं के लिए जमीन का सवाल बहुजन आंदोलन का हिस्सा रहा है। साहूजी महराज, महात्मा ज्योतिबा फुले, डॉ बाबा साहब अम्बेडर, मान्यवर कांशीराम साहब ने भी जमीन की लड़ाई लड़ी है। इन्हीं महापुरुषों को अपना आदर्श मानते हुए मैंने और मुझ से जुड़े कई साथियों ने महिलाओं के लिए जमीन के मुद्दे पर कार्य शुरू किया था।
शुरुआत में हमें यह चुनौती आती थी कि, लोगों हमसे कहते थे कि, जमीन है कहाँ? कहाँ से जमीन लाएंगे? तब हम यही जवाब देते थे कि, सरकारी परियोजनाओं के लिए जमीन कहाँ से आती है? वही से महिलाओं को जमीन का अधिकार मिलना चाहिए।
आगे सीमा बयां करतीं हैं कि, भारतीय समाज में जमीन आजीविका का वह साधन जिस पर लोग पीढ़ी दर पीढ़ी गरिमापूर्ण जीवन जीते और अपना पेट भरते आ रहे हैं। लेकिन, आज भी देश में मुठ्टीभर जमींदार और कॉरपोरेट घरानों से आने वाले लोगों के पास हजारों एकड़ जमीन है। वहीं, चिंताजनक है कि इसी देश के 57 प्रतिशत दलितों के पास भूमि नहीं हैं। मैंने उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में करीब 450 से ज्यादा गाँव में जाकर जमीन अधिकार के मुद्दे पर महिलाओं और उनके परिवारों को जागरूक किया है।
इस दौरान हमारे सामने सबसे बड़ी दो चुनौती थी। पहली यह कि, लोगों को अपने जमीन अधिकार के लिए खड़ा कैसे करें? दूसरी चुनौती थी कि, हम अपनी आवाज सरकार तक कैसे पहुचाएं? जब हमने जमीन के लिए आंदोलन किये और धीरे-धीरे हमारे आंदोलनों ने रफ्तार पकड़ी तब हमारे सामने कई तरह की गंभीर चुनौतियाँ आ गयीं। पहले तो हम पर यह आरोप लगाए गए कि, आपको विदेशी फंडिंग प्राप्त हुयी है। इसके बाद मेरे घर पर छापामारी भी की गयी।
वहीं, हमारे 28 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गयी। जबकि, 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
सीमा यहीं नहीं रुकती आगे वे कहती हैं कि, तेलंगाना सरकार जब 2014 से जमीन अधिकार का कार्य शुरू कर 2022 तक परिवारों को 3-3 एकड़ जमीन दे सकती है, तब अन्य राज्यों की सरकार क्यों परिवारों को जमीन नहीं दे सकती? यह बताते हुए हमने उत्तर प्रदेश सरकार से लोगों के लिए जमीन की मांग की। तब सरकार ने करीब 800 परिवारों को जमीन देने का आदेश दे दिया है। हमें उम्मीद है कि, जल्द ही इन 800 परिवारों को जमीन मिल जाएगी।
जमीन मिलने से कई फायदे हैं। जमीन सबसे पहले तो भुखमरी खत्म करती है। लोगों को दूसरे के खेतों पर काम करने नहीं जाना पड़ता। जमीन होने से मान-सम्मान भी मिलता है। आर्थिक तौर पर मजबूत होते हैं। शोषण नहीं होता। जमीन होगी तो छोटे-बड़े रोजगार होंगें। खुशहाली आयेगी।
आगे अपने विचार रखती हैं महाराष्ट्र से आने वाली दामिनी रागाड़े। वे कहती मैं ट्रांस समुदाय के संपत्ति अधिकार जैसे विषय पर कार्य करती हूँ। मैंने इस कार्य में कई तरह की चुनौतियाँ फेस की हैं। जिसमें सबसे मुख्य चुनौती यह है कि, खून का रिश्ता होने के बाद भी ट्रांस व्यक्तियों का परिवार उन्हें अपनाने को तैयार नहीं। यह मालूम पड़ने पर कि, हमारे घर में एक ट्रांस है, उसे सबसे पहले बेघर किया जाता है। तब सबसे पहले पहचान, संपत्ति, रिश्ते खत्म हो जाते हैं।
ऐसे में एक ट्रांस व्यक्ति का जमीन और संपत्ति का अधिकार भी छिन जाता है। वहीं, ट्रांस समुदाय के लोगों को सरकारी दस्तावेज बनवाने जैसे कार्यों में रुकावट आती है। तब उनके लोन प्राप्त करने जैसे कार्य भी नहीं हो पाते हैं।
दामिनी आगे फरमाती हैं कि, ट्रांस लोग जब एक समूह में रहते हैं, तब वहाँ गुरु-शिष्य परंपरा की संस्कृति होती है। जिसमें एक गुरु के 5 से 10 या इससे भी अधिक शिष्य होते हैं। मगर, गुरु के स्वर्गवास के बाद उनकी संपत्ति पर हक-अधिकार केवल एक और प्रिय शिष्य का होता है। तब गुरु की पूरी संपत्ति उसके सबसे प्रिय शिष्य को मिलती हैं। ऐसे में सभी शिष्यों में झगड़े की स्थिति बन जाती है।
वहीं, जमीन अधिकार को लेकर ट्रांस समुदाय की हालत इतनी खराब है कि, जब किसी ट्रांस का निधन होता है, तब उसके अंतिम संस्कार के लिए भी कोई जमीन देने को तैयार नहीं होता। इसके लिए भी ट्रांस समुदाय को संघर्ष करना पड़ता है। इन सब का मुख्य कारण क्या है?
इस तरफ गौर करने पर समझ आता है कि, समाज ने इंसान के तौर पर महिला और पुरुष वर्ग को ही समझने की कोशिश की है। अभी तक ट्रांस वर्ग को समझने की कोशिश ही नहीं की गयी। आज हमें जरूरत है कि, हम ऐसी जागरूकता फैलाएं जिससे समाज यह समझ सके की ट्रांस भी एक इंसान है। उसके भी अधिकार हैं।
बिहार के पटना से इस कार्यक्रम में शामिल होने वाली इब्राना नाज़ भी इस संवाद में अपनी बात रखती हैं। इब्राना मुस्लिम महिलाओं के प्रॉपर्टी राइट पर अपना अनुभव साझा करती हैं। वे व्यक्त करती हैं कि, मुस्लिम महिलाओं के प्रॉपर्टी राइट पर कार्य करने पर मैंने मुख्यत: दो विचारों को पाया। कुछ महिलाओं ने कहा हमें शादी के समय मिले पैसे और सामान से यह तय हो जाता है कि, हमें संपत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा। कुछ महिलाओं ने माना कि, यदि हमें संपत्ति में हक मिलता भी है, तब भाइयों की अपेक्षा कम मिलता है।
आगे इब्राना अपने परिवार की स्थिति बयां करते हुए बताती हैं कि, मैं और मेरी माँ संपत्ति के अधिकार से सीधे तब जुड़े जब मेरे पिता इस दुनियाँ में नहीं रहे। पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने हमारे दादा जी से संपत्ति के अधिकार की मांग की। इस मांग पर दादाजी ने एक विवाद खड़ा कर दिया। वे मेरी माँ को संपत्ति का अधिकार नहीं देना चाहते।
इसके बाद इब्राना अपने अनुभव के साथ कहती हैं कि, कार्य के दौरान मैंने पाया कि निकाह के बाद जब पति अपनी पत्नी को मेहर (एक राशि या संपत्ति) देता है, तब वह बहुत कम होता है। अधिक-अधिक से मैंने देखा है कि, मेहर 51000 हजार रुपए दिया जाता है। जबकि, मेहर के बजाय लड़की को प्रॉपर्टी में अधिकार मिलना चाहिए। मुस्लिम महिलाओं के निकाह के लिए एक ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि, प्रत्येक शादी या निकाह के लिए कानूनी तौर पर रजिस्टर करना पड़े।
जब निकाह का कानूनी रिकार्ड होगा, तब संपत्ति का अधिकार और अधिक मजबूत होगा। वहीं, महिलाओं के संपत्ति के अधिकार और सशक्तिकरण के जितने भी कानून देश में बनाए जाएं तब हमें ये देखना होगा कि, उन कानूनों में महिलाओं की सहभागिता कितनी है। मुझे लगता है कि, महिलाओं के अधिकार कानून में महिलाओं की भूमिका जितनी ज़्यादा होगी, कानून उतने अच्छे और मजबूत होंगें।
डॉ चारु जैन रिसर्च करती हैं। वे इस संवाद में अपनी एक रिसर्च की बात करते हुए बतलाती हैं कि, जब हमने देश के 12 स्टेट के 12000 डिजिटल लैंड रिकॉर्ड्स को देखा तब पाया कि, महिलाओं के लिए जमीन अधिकार में कई तरह की चुनौतियाँ आ रही हैं। महिलाओं के पास जमीन की कितनी साझेदारी है? कृषि भूमि और व्यक्तिगत भूमि के तौर पर महिलाओं की क्या स्थिति है? यह जानकारी हमें इस रिकार्ड में प्राप्त नहीं हुयी। हमें बस यही मालूम हुआ कि, महिलाओं का जमीन अधिकार उनके पति या परिवार के साथ जुड़ा हुआ है।
आगे डॉ चारु बयां करती हैं कि, आज शिक्षित होने बाद भी महिलायें घरेलू हिंसा जैसे गाली-गलौच, मार-पीट जैसे अन्य कारणों से भी अपने प्रॉपर्टी राइट की मांग नहीं कर पाती है। महिलाओं के भूमि और संपत्ति अधिकार के लिए आज हमें सामाजिक संस्कृति को बदलने की जरूरत है। वहीं, महिलाओं को संपत्ति व अन्य अधिकार और सशक्तिकरण दिलाने के लिए महिलाओं के बच्चों, पति और अन्य परिजनों को एक साथ खड़ा होना पड़ेगा।
इस संवाद में एक्शन एड संस्था से जुड़ी डॉ. सुशीला प्रजापति ने भी अपना वक्तव्य रखा। 20 वर्षों से उनका अनुभव सिंगल महिलाओं के अधिकारों पर कार्य करने का रहा है। उन्होंने कहा कि, महिलाओं और उनके भूमि अधिकारों पर केंद्रित इस वार्ता में वर्किंग ग्रुप फॉर वुमन एण्ड लैंड ओनरशिप नेटवर्क की अहम भूमिका हैं। यह नेटवर्क गुजरात के 17 जिलों में सक्रिय है। जो कि 45 से अधिक एनजीओ, सामुदायिक संगठनों और व्यक्तिगत सदस्यों के साथ मिलकर काम करता है।
इस नेटवर्क के प्रयासों से अब तक करीब 16000 महिलाओं को जमीन में अधिकार मिल चुके हैं। यह नेटवर्क ग्रासरूट स्तर पर महिलाओं को संगठित करने, सरकार के साथ नीतिगत संवाद करने और भूमि एवं संसाधन अधिकारों को मजबूत करने में लगा हुआ है।
आगे वे बताती हैं कि, एक्शन एड संस्था ने 2001 से गुजरात में कार्य शुरू किया। तब उसने एकारी शक्ति मंच नामक एक महत्वपूर्ण पहल की भी शुरुआत की। यह मंच गुजरात के 10 जिलों में विधवा, अलग-अलग और अविवाहित सिंगल महिलाओं के साथ काम करता है। इसकी सदस्यता लगभग 10000 है। संगठन सामाजिक सुरक्षा, संपत्ति अधिकार, जमीन अधिकार, आवास अधिकार और सिंगल महिलाओं के विरुद्ध होने वाली परंपरागत हिंसा जैसे मुद्दों पर फोकस करता है।
झारखंड से जुड़ाव रखने वाली सुहागिनी तउडू ने अपने शब्दों में कहा कि, मैंने अपने कार्य के दौरान पाया कि, झारखंड में आदिवासी एकल महिलाओं की स्थति बहुत भयावह है। वहाँ परंपरागत तौर पर पीढ़ियों से महिलाओं को जमीन का कोई अधिकार नहीं दिया जाता। हमने 4 पंचायतों की स्टडी में पाया कि, 97 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर जमीन नहीं है। इन महिलाओं में 85 प्रतिशत प्रभावित महिलाएँ आदिवासी समुदाय की हैं।
सुहागिनी आगे बोलती हैं कि, झारखंड में यदि कोई महिला अपना जमीन अधिकार का हिस्सा माँगती है, तब उसे ‘डायन’ घोषित कर दिया जाता है। मीडिया विश्लेषण से ज्ञात होता है कि, हर महीने औसतन 5 से अधिक जमीन से जुड़े अपराध होते हैं, जिनमें डायन हिंसा प्रमुख है। वहीं, महिलाओं के जमीन अधिकारों के मामले में मारपीट, उत्पीड़न और हत्याओं तक की स्थिति सामने आती है। ज्यादातर पीड़ित सिंगल, विधवा या बुजुर्ग महिलाएँ होती हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि मीडिया, पुलिस और प्रशासन को अधिक संवेदनशील होना चाहिए और लैंड लॉ की बेसिक जानकारी फैलाई जानी चाहिए।
इस चर्चा में चंद्रकला शर्मा भी राजस्थान से शामिल हुयी। उनका अनुभव 100000 से अधिक एकल महिलाओं के साथ काम करने का रहा हैं। वे बतलाती हैं कि, तलाकशुदा महिलाओं की स्थिति सबसे खराब होती है। इन महिलाओं को समाज से दया भी नहीं मिलती। कानून में तलाकशुदा महिलाओं को पति की संपत्ति में सीधा अधिकार नहीं मिलता। वे केवल भरण-पोषण ले सकती हैं।
आगे वे कहती हैं कि, राजस्थान में एकल शक्ति संगठन के माध्यम से हजारों महिलाओं को अधिकार दिलाए गए हैं। मेरा सुझाव है कि, महिलाओं का शादी के समय पति की संपत्ति में नाम जोड़ना अनिवार्य हो। ताकि, वे संपत्ति के अधिकार से वंचित न रह सकें।
महाराष्ट्र से इस कॉन्फ्रेंस के कार्यक्रम में शामिल हुयी रुकमणी नागापुरे ने भी अपनी बात इस चर्चा में रखी। वे बोलती हैं कि, वर्ष 2014-15 के एक सर्वे में हमने पाया था कि, 1800 से ज्यादा एकल महिलाओं की स्थिति संपत्ति के अधिकार के मामले में बड़ी दयनीय थी। आज महाराष्ट्र में 20000 महिलाएँ 11 जिलों के 500 गांवों में अपने संपत्ति जैसे अन्य अधिकारों के लिए संगठित हैं। आज महिलाएं पुरुषों से कदम से कदम मिलकर खड़ी हैं। मगर, उन्हें संपत्ति में बराबर का हिस्सा नहीं मिल पा रहा।
आज भी मेहनत का एक बड़ा हिस्सा पुरुषों को जा रहा हैं। महिलाओं के संपत्ति के मामले में प्रशासन और समाज दोनों में संवेदनशीलता की कमी है। मुझे लगता है कि, महिलाओं के संपत्ति अधिकार के लिए लंबे समय तक कानूनी और आर्थिक जागरूकता की जरूरत है।
बड़कीबाई राजस्थान से आती हैं। इस संवाद में वे अपने करीब 30 सालों के संघर्ष को याद करते हुए बतलाती हैं कि, जब मैंने महिला संपत्ति व भू-अधिकार जैसे मुद्दे पर कार्य किया तब महिलाओं ने कई तरह की समस्याएं मेरे सामने रखीं। इन समस्याओं को सुनकर मैंने महिलाओं का एक समूह बनाया। इस समूह के साथ महिला संपत्ति के अधिकार पर जयपुर से लेकर दिल्ली तक मैंने रैलियां और धरने किए। सरकारी विरोध के बाद भी हमने हार नहीं मानी और महिलाओं को 2022 तक वन अधिकार पत्र प्राप्त करवाए।
आगे वे जिक्र करती हैं कि, मैंने 2005 में वन अधिकार कानून बनने में भी योगदान दिया। वहीं, एकल महिलाओं की मदद भी की। साथ में समाज सुधार संघ बनाकर डायन-बांझ जैसी चुनौतियों का समाधान करने का कार्य कर रही हूँ।
सुकमती बघेल छत्तीसगढ़ में महिला अधिकारों के लिए कार्यरत हैं। वे बस्तर जिले की संस्कृति व महिलाओं के शोषण की स्थिति बयां करते हुए कहती हैं कि, जहां छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता हैं, वहाँ हमने महिलाओं को घर से निकालकर एकजुट करने, नेतृत्व विकसित करने और ग्राम सभा में भागीदारी बढ़ाने का कार्य किया है। हमने वन अधिकार पट्टों में महिलाओं का प्रतिशत 10% से 50% तक बढ़ाने की आधारशिला भी रखी।
अपनी चुनौतियों पर वे बोलती हैं कि, आज जमीन न मिलने और खनिज उत्खनन से भूमि हानि की चुनौतियां हमारे सामने आ रहीं हैं। मगर, हमारा प्रयास है कि, हम महिलाओं को भू-अधिकार दिलाने की लड़ाई और मजबूती से जारी रखेंगे।
वनिताबेन गावित गुजरात से आती हैं। वे एक आदिवासी और सिंगल महिला हैं। युवा अवस्था में ही उन्होंने कोरोना में अपने पति को खो दिया है। अपनी बात रखते हुए इस अवसर में वे बतलाती हैं कि, मेरे पति के स्वर्गवास के बाद मेरे ससुराल वाले मुझे जमीन देने से मना करते हैं। परिवार जमीन के दस्तावेज भी नहीं देता। परिवार कहता है कि, जब बेटा 18 साल का हो जाएगा, तब जमीन मिलेगी।
इस मामले में मैंने शासन-प्रशासन और अधिकारियों से भी बार-बार सहायता मांगी हैं। लेकिन, मुझसे रिश्वत की मांग की जाती है। अपना अधिकार कैसे हासिल करूँ? यह सवाल दिमाग में घर कर गया है।
आगे वनिताबेन अपना दर्द बताते हुए कहती हैं कि, मैं जब अन्य जगह खेती का काम करती हूँ, तब पुरुषों की बुरी नजर और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। मेरा अनुभव रहा है कि, विधवा महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक हिंसा झेलनी पड़ती है। वहीं, विधवा महिलाओं के ससुराल उन्हें प्रताड़ित कर भागने पर मजबूर करते हैं, ताकि वे उनकी संपत्ति पर कब्जा कर सकें।
आगे वे उल्लेख करते हुए कहती हैं कि, गुजरात के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में बेटी को पिता की जमीन में हिस्सा मिल सकता है। मगर, बहू को ससुराल में जमीन पर हिस्सा नहीं मिल सकता। मेरा सुझाव है कि, पति की मृत्यु के तुरंत बाद विधवा महिला का नाम जमीन पर दर्ज करवाने की जिम्मेदारी पंचायत की हो। साथ में एकल महिलाओं को जमीन, सरकारी योजनाओं और किसान मीटिंग्स में प्राथमिकता दी जाए।
गुजरात में महिला भूमि के मुद्दों पर कार्य करने वाली रेखा डोनाशिया भी इस कार्यक्रम में आयीं। इस दौरान उन्होंने भी अपने विचार साझा किये। उन्होंने कहा कि, गुजरात में करीब 18500 गाँव हैं। इन गाँव में से कई गाँव ऐसे हैं कि, वहाँ मृत व्यक्ति को दफनाने के लिए 3 फुट जमीन मिलना भी मुश्किल है। रास्ते के लिए जमीन से लेकर कचरा डालने तक के लिए जमीन की समस्या है। गुजरात में जमीन को लेकर लोगों में लड़ाई की स्थिति बनी रहती हैं।
यह स्थिति इतनी बिकराल हो जाती है कि, लोग एक दूसरे की जान तक ले लेते हैं। हाल में एक हत्या की घटना आनंद जिले से सामने आयी हैं। जहां खंभात ब्लाक अंतर्गत बुलाना गाँव में 4 दलितों को जमीन के लिए मार दिया। वहीं, दो वर्ष पहले भी मेरे संज्ञान में एक हत्या की घटना आयी थी। जो सुरेन्द्र नगर जिले की थी। जहां जमीन के लिए 2 दलितों की हत्या कर दी गयी थी।
आगे वे कहती हैं कि, एक घटना मेरे सामने अहमदाबाद के धोलका तहसीले के गोंठा गाँव की आयी। वहाँ, 250 बीगा सरकारी पट्टे वाली महिलाओं की जमीन पर कुछ दबंग समुदाय के लोग कब्जा करके खेती कर रहे थे। हमने तब 50 महिलाओं का एक संगठन बनवाकर एक आंदोलन शुरू कर दिया। जब वह आरोपी नहीं माने तो यह मामला कोर्ट में पहुंचाया। तब कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया। आज वे माहिलाएं अपनी जमीन पर खेती कर खुशहाली से जीवन जी रहीं हैं।
ओडिशा से चलकर इस संवाद का हिस्सा बनने संध्या देवी भी आयीं। वे 30 वर्षों से ओडिशा में आदिवासी महिलाओं के लिए भूमि अधिकार की लड़ाई लड़ रही हैं। संध्या ने कहा कि, भूमि महिलाओं के अस्तित्व और समानता का प्रतीक है। 1988 से हमने संगठित होकर इस नारे के साथ कि, ‘माटी हमारी माँ’ भू-अधिकार के लिए अभियान चलाया। इस दौरान हमने सामूहिक भूमि पट्टे की मांग भी की। तब जेल, पिटाई और विरोध की स्थिति को भी झेलना पड़ा।
मगर, फिर भी हमने महिलाओं को एकजुट कर भू-अधिकार के संघर्ष को जारी रखा हैं।
महाराष्ट्र से इस अवसर में शामिल होने कुमारी बाई भी आयीं। उन्होंने कहा कि, मैंने 1996 से महिला सशक्तिकरण और वन अधिकार पर कार्य किया। इस दौरान पेसा और वन अधिकार कानूनों का अध्ययन कर ग्राम सभा को मजबूत किया। साथ में जंगल संरक्षण, फायर लाइन और ‘मनरेगा’ के माध्यम से रोजगार के बढ़ावे पर जोर दिया। हमने वानाधिकार पट्टों के लिए भी आवाज उठाई।
वनाधिकार पट्टे पाने के लिए महाराष्ट्र से दिल्ली तक के संघर्ष किया। इस संघर्ष से हम 223 महिलाओं को व्यक्तिगत वनभूमि पट्टे दिलाने में सफल साबित हुए। हमारा निरंतर भूमि अधिकार ने मुद्दे पर कार्य जारी है।
आईएलडीसी के कॉन्फ्रेंस में ‘होल्डिंग अवर ग्राउन्ड: वुमन लैंड एण्ड लाइफ, विषय पर आधारित विभिन्न सत्रों में जमीनी स्तर से आए वक्ताओं के विचारों से संघर्ष और सफलता का रास्ता समझा जा सकता हैं।
वहीं, इन सत्रों में पेश की गईं चुनौतियाँ, अनुभव और घटनाओं से देश में जमीन व संपत्ति की लड़ाई को आँका जा सकता है। साथ में इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया जा सकता है कि, विभिन्न संगठन और जमीनी कार्यकर्ता किस तरह महिलाओं के जमीन और संपत्ति के मुद्दे को नई राह दे रहे हैं। ताकि, आने वाला वक्त महिला संपत्ति के अधिकार को मजबूत आधार और समृद्धि प्रदान करे।
(सतीश भारतीय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)