Wednesday, February 1, 2023

ग्राउंड रिपोर्ट: देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी छोटी कर दे रही है श्रमिकों और ग्रामीणों की जिंदगी 

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चन्दौली (उत्तर प्रदेश)। दुलहीपुर की 26 वर्षीय सविता (बदला हुआ नाम) को लगातार 40 दिनों से खांसी आ रही है। वह ‘जनचौक’ के इस संवाददाता से कहती हैं कि जब से ब्याह कर यहां आई हूं, तब से खांसी, जुकाम, बुखार और थकान से परेशान रहती हूं। गांव और आसपास के इलाके में हमेशा धूल और धुंआ जैसा माहौल रहता है। एक वर्ष पहले खांसी आती थी, तो इलाज कराए तो ठीक हो गया। लेकिन नवंबर के शुरुआत से लगातार खांसी आ रही है। कभी सूखी तो कभी कफ वाली। भूख भी नहीं लग रही है। हमेशा थकान बना रहता है। आशा ने अस्पताल में चेक करवाने के लिए बोला। अपने ससुर के साथ राजकीय महिला अस्पताल मुगलसराय में जांच कराई तो टीबी निकला। बहुत डर लग रहा है। डॉक्टर बताते हैं कि बहुत लंबा इलाज चलेगा। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं? ” विदित हो कि चंदौली जनपद के मुगलसराय तहसील में जिले के सबसे अधिक 742 टीबी के मरीज हैं। जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ राजेश कुमार के अनुसार टीबी मरीजों की मृत्यु दर 06-08 फीसदी है।

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चंधासी कोयला मंडी से बमुश्किल पांच से छह किलोमीटर की दूरी पर ग्रैंड ट्रंक रोड पर बसा है दुलहीपुर गांव। गांव का नाम दुलहीपुर भले है, लेकिन यह गांव हाल के दशक से कई दुश्वारियों को झेल रहा है। जिसमें प्रमुख है साल के बारह महीनों और दिन-रात के चौबीस घंटे वायु प्रदूषण और कोयले के महीन धूल की आंधी समस्या। दुलहीपुर के साथ-साथ महबलपुर, सतपोखरी, बिसौड़ी, बगही, हरिकेशपुर, डांडी, करबत और चंधासी समेत दो दर्जन गांवों की लगभग चालीस हजार की आबादी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है। 

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कोयला मंडी के आसपास 10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में हर समय धूल के गुबार उड़ते रहते हैं।

भारत की सबसे बड़ी कोयला मंडी कही जाने वाली चंधासी, उत्तर प्रदेश के चन्दौली जनपद के मुगलसराय तहसील में स्थित है। चंधासी कोयला मंडी का विस्तार डीडीयू नगर पालिका और महबलपुर ग्राम पंचायत में आता है। कोयले का गर्द चौबीस घंटे करीब 12 से 15 किमी के दायरे में घरों और छतों पर गिरता रहता है। कुछ ही देर में कालिख की काली पर्त जम जाती है। मंडी की धूल हवा में मिलकर और वाहनों के आवागमन से उक्त गांवों के वातावरण में धुंधलापन हमेशा बना रहता है। मुगलसराय तहसील में 20 दिसंबर तक 38 से अधिक टीबी के मरीज मिले हैं।

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मुगलसराय स्थित राजकीय महिला अस्पताल के क्षय रोग निदान केंद्र पर अपने परिवार के मुखिया के साथ इलाज के लिए आई टीबी रोग से पीड़ित महिला।

जीवन का कोई भरोसा नहीं 

मुगलसराय राजकीय महिला में सविता के अलावा दर्जन भर अन्य टीबी के मरीज मिले। इनमें से एक टीबी के पेशेंट 55 वर्षीय नरेंद्र ने बताया कि “अब हम लोगों के जीवन का कोई भरोसा नहीं है। दवा आदि खाकर गुजारा तो हो रहा है लेकिन, पहले वाली आम जीवन जीने वाली बात नहीं रह गई है। लोग-समाज हमें दूसरी नजर से देखता है। जान-पहचान के लोग किनारा किये रहते हैं। हमारा अधिकतर समय काम में और बाकी समय एकांत में अकेले सोचते-विचरते गुजर जाता है। इस इलाके से कोयला मंडी और वायु प्रदूषण की समस्या का निदान खोजना होगा तभी, बढ़ते टीबी मरीजों की तादाद में कमी आ सकती है।” नरेंद्र ने अपनी और दवा की पर्ची का फोटो खिंचवाने से मना कर दिया। 

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कोयला मंडी का एक दृश्य।

बुखार-खांसी से श्रमिक परेशान 

चंधासी कोयला मंडी में तकरीबन तीन साल से ट्रकों से कोयला उतारने और लादने का काम 25 वर्षीय राधेश्याम करते आ रहे हैं। वे पड़ोसी राज्य पश्चिमी बिहार के भभुआ जिले के मोहनिया के निवासी हैं। वे कहते हैं कि “कोयला मंडी में रिस्क बहुत है। काम के दौरान कोयले की धूल और राख से चेहरा से लेकर पूरा शरीर काला हो जाता है। काम के दौरान सांस के द्वारा छाती में राख और धूल के जाने से दम फूलने लगता है। हर दूसरे और तीसरे दिन बुखार और खांसी की शिकायत रहती है। आसपास के मेडिकल स्टोर से खांसी और बुखार की दवा खरीदकर खा लेते हैं और काम में लगे रहते हैं।”

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कोयला मंडी के पास धूल से पटा यातायात का साइन बोर्ड।

“कई बार मन करता है कि कोयला लदाई-उतराई का काम छोड़ दूं, लेकिन परिवार को पालने के लिए रोज कुछ रुपयों की जरूरत पड़ती है। वह बंद हो जाएगा। यहां रोजाना काम मिलता है और मज़दूरी का शाम तक भुगतान मिल जाता है। इस लालच में मेरे अलावा सैकड़ों लोग जान जोखिम में डालकर लगे रहते हैं। कई बार पत्नी कहती हैं कि जब बार-बार खांसी और बुखार लगा रहता है तो अस्पताल में जाकर जांच करवा लूं, लेकिन डरता हूं कि कहीं अस्पताल जाने के बाद टीबी, दमा या अन्य कोई गंभीर बीमारी नहीं निकल आये। काम छोड़कर इलाज के लिए रुपए कहाँ से आएंगे ?” ऐसा राधेश्याम ने बताया।

जहरीली हवा में घुटता है दम  

चंधासी कोयला मंडी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र से महज पांच से सात किलोमीटर दूर गंगा पार पूरब दिशा में स्थित है। वर्ष 1970-71 में कोयला मंडी वाराणसी से सटे पड़ाव में थी। इसके पांच साल बाद सन 1976 में कांग्रेस के शासनकाल में स्थानांतरित कर चंधासी लाया गया। यहां कोयला मंडी के होने के बाद से लोगों में इलाके के विकास की उम्मीद जगी। समय गुजरने के साथ तकरीबन दो दशक से ट्रकों के रेलम-रेल और कोयला मंडी की राख व धूल मंडी के 12 से 15 किमी की परिधि में बसे दो दर्जन से अधिक गांवों के लिए नासूर बन गई है।

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राजकीय महिला अस्पताल के छह रोग हेल्प डेस्क प्रभारी सुपरवाइजर रमेश चंद्र यादव क्षय रोगियों का डिटेल्स उपलब्ध कराते हुए।

सुबह धूल, दोपहर में धूल, शाम में धूल और रात में भी धूल और राख के गुबार से स्थानीय लगभग 35 हजार से अधिक की आबादी का जहरीली हवा में दम घुटता है। नारकीय जीवन जीना पड़ रहा है। मंडी से ही जीटी रोड गुजरता है। इससे बिहार, बंगाल, मिर्जापुर, सोनभद्र, गाजीपुर, बनारस समेत 20 से अधिक जनपदों के लाखों लोगों का आवागमन रोजाना होता है। इनको भी धूल और वायु प्रदूषण से कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। धूल के चलते कई बार जानलेवा हादसे भी हो चुके हैं।

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मुगलसराय स्थित राजकीय महिला अस्पताल। जो कोयला मंडी से 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर पूरब दिशा में स्थित है।

 श्रमिकों के जीवन को गंभीरता से ले सरकार  

पत्रकार राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि “चंधासी कोयला मंडी में पूर्वांचल और बिहार के मजदूर काम की तलाश में आते हैं। यहां वनवासी, आदिवासी, गोंड, कुम्हार, अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति के लोग कोयला मजदूर ज्यादा हैं। शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित होने की वजह इन्हें श्रम कानून और अधिकारों की जानकारी नहीं होती है। हक़ और कानून की जानकारी नहीं होने की वजह से इन मजदूरों का शोषण, जुल्म, अन्याय और बीमारी के साथ जीना आम है।

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टीबी मरीज की पर्ची।

इतना ही नहीं चंधासी कोयला मंडी मजदूरों को रोजगार तो ज़रूर देती है, लेकिन उनके स्वास्थ्य और लंबे जीवन को गिरवी भी रख लेती है। यहां काम करने वाले मजदूरों का डाटा न तो सरकार के पास है और न ही इनसे श्रम कानून के दायरे में काम लिया जाता है। ये अनपढ़ और गरीब मजदूर हाड़तोड़ मेहनत कर रोजाना टनों-टन कोयला ट्रकों से उतारते और लादते हैं। स्थानीय प्रशासन और सरकार को जल्द से जल्द मामले को गंभीरता से लेना चाहिए।”

मजदूरों के हक़ पर डाका, मुनाफा कमाते व्यापारी

जानकारी के अनुसार कोयला मंडी में रोजाना 40-50 ट्रक कोयला आता-जाता है। एक ट्रक में 30 से 40 टन कोयला रहता है। इसे लादने या उतारने के लिए चार से पांच मजदूर लगते हैं। एक ट्रक खाली करने में आठ से दस घंटे का समय लगता है। जिसका 1200 से 1500 रुपया मेहनताना मिलता है। इसे प्रति मजदूर 300 या 350 रुपये आपस में बांट लेट हैं। वहीं, इनकी जिंदगी के जोखिम को जानकर भी अनजान बने मंडी के कोयला व्यापारी दिन रात मुनाफा कूटने में जुटे रहते हैं। कोयला मंडी में 6000 से अधिक की तादाद में कोयला मजदूर काम करते हैं। तकरीबन 800-900 कोयला व्यापारी पंजीकृत हैं। जो हजारों-हजार महिला-पुरुष मजदूरों को बगैर सुरक्षा के धूल और राख उड़ने की विपरीत परिस्थिति में भी काम लेते हैं।

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सड़क पर जमा कोयला मंडी की धूल व राख को दिखाते समरजीत सिंह।

मांग पूरी नहीं होने पर पब्लिक ने विधायक को लगाया किनारे 

समाजवादी पार्टी चंदौली की महिला जिलाध्यक्ष गार्गी सिंह पटेल ने चंधासी कोयला मंडी को आबादी से कहीं दूर शिफ्ट किये जाने को लेकर अभियान छेड़े हुए हैं। वह ‘जनचौक’ को बताती हैं कि चंधासी कोयला मंडी का आधा हिस्सा डीडीयू नगर (मुगलसराय) में है तो आधा महबलपुर ग्राम पंचायत में। दुलहीपुर, डांडी, सतपोखरी, महबलपुर, बिसौड़ी, बगही, सीतापुर, हरिकेशपुर करबत और चंधासी गांव के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। कोयला मंडी की वजह से मजदूरों और आस-पास की आबादी का जीवनकाल कम हो रहा है।

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कोयला मण्डी में खड़े ट्रक।

इस पूरे इलाके में एक हजार से अधिक लोगों को टीबी है। वर्ष 2017 की विधानसभा में मुगलसराय की विधायक ने यहां की जनता से कोयला मंडी को शिफ्ट कराने और शिफ्ट नहीं होने की दशा में ओवरब्रिज बनवाने का वादा किया था। जनता राह देखती रही और पूरे पांच साल निकल गए। दोनों में से कोई भी काम नहीं हो सका। नाराज जनता ने उन्हें किनारे लगा दिया। हम लोग भी मंडी को स्थानांतरित या फिर ओवरब्रिज बनवाने की मांग कर रहे हैं ताकि लाखों लोगों को जहरीली हवा और नारकीय जीवन से आजादी मिल जाए।”  

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बगैर सुरक्षा उपकरणों के काम पर जाते श्रमिक।

सिर्फ मुगलसराय में 742 टीबी के मरीज

राजकीय महिला अस्पताल मुगलसराय के क्षय रोग हेल्प डेस्क प्रभारी सुपरवाइजर रमेश चंद्र यादव ने बताया कि “मुगलसराय तहसील में तकरीबन तीन लाख की आबादी के टीबी निदान केंद्र बना है। यहां चंधासी कोयला मंडी व इसके आसपास के गांवों से  प्रति महीने 350 से अधिक लोग जांच व इलाज के लिए आते हैं। औसतन प्रति महीने 50 से 52 मरीजों में क्षय रोग की पुष्टि होने पर इलाज किया जाता है। आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2022 में जनवरी में 59, फरवरी 64, मार्च 77, अप्रैल 71, मई 55, जून 52, जुलाई 65, अगस्त 59, सितम्बर 55,  अक्टूबर 56, नवंबर 66 और दिसंबर में अब तक 40 क्षय रोग के मरीजों की पुष्टि हो चुकी है। 

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क्षेत्र में वायु प्रदूषण से दम तोड़ रहे पेड़।

हासिए पर मजदूरों का अधिकार व स्वास्थ्य

चार-पांच साल पहले तक चंधासी कोयला मंडी में 9000 से 10000 की संख्या में मजदूर काम करते थे। कोयले का ऑक्शन (खरीद-बिक्री) ऑनलाइन होने से इन दिनों मंडी में काम कम हो गया है। कई बार तो मजदूरों को वापस घर और कम मेहनताना पर अन्य काम करना पड़ता है। मजदूरों को न तो दस्ताने, जूते, हेलमेट, मास्क और न ही अन्य सुरक्षा व जरूरी उपकरण मुहैया कराये जाते हैं। लगातार धूल और डस्ट में काम करने की वजह से चर्म रोग, टीबी, सांस की बीमरियां, सिर दर्द, आंख की समस्याएं, हड्डी और पाचन संबंधी समस्याएं आम हैं। पेट, आंख और सांस की बीमारियां इनकी जिंदगी का हिस्सा होती हैं। ये तनाव और दिल संबंधी बीमारियों के अभ्यस्त हो जाते हैं। 

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ये लक्षण दिखें तो तुरंत कराएं जांच 

जिला क्षय रोग अधिकारी चंदौली डॉ राजेश कुमार का कहना है कि राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के अंतर्गत जनपद के सभी क्षय रोगियों के परिवार के सदस्यों को टीबी प्रिवेंटिव थेरेपी (टीपीटी) दी जा रही है। टीबी के प्रसार को रोकने के लिए यह थेरेपी रामबाण साबित हो रही है । टीबी को जड़ से समाप्त करने के लिए टेस्टिंग (जांच), ट्रीटमेंट (उपचार) और प्रिवेंशन (बचाव) पर पूरा ज़ोर दिया जा रहा है । पाँच वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को कीमोप्रोफ़ाइलिक्सिस थेरेपी दी जा रही है।

डॉ राजेश कुमार के अनुसार अगर लगातार दो हफ्ते से खांसी आए, बलगम में खून आए, रात में बुखार के साथ पसीना आए, तेजी से वजन घट रहा हो, भूख न लगे तो नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर टीबी जांच करवा सकते हैं । अगर जांच में टीबी की पुष्टि हो तो पूरी तरह ठीक होने तक इलाज चलाना है। चंधासी कोयला मंडी और आसपास के इलाकों में लोगों को जागरूक करने व क्षय रोगियों की पहचान के लिए समय-समय पर टीबी रोग जांच शिविर भी लगाया जाता है। इस इलाके में वायु प्रदूषण व घनी आबादी होने की वजह से क्षय रोग के अधिक पेशेंट मिलते हैं। “

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पिता एनजीओ के संरक्षक चंद्र भूषण मिश्र।

टीबी-खांसी यानी चंधासी : चंद्रभूषण मिश्र 

पब्लिक इंट्रेस्ट थिंकर एसोसिएशन (पिता) एनजीओ ने चंधासी कोयला मंडी के चलते होने वाले वायु प्रदूषण को बंद किये जाने की मांग को लेकर कई बार आंदोलन चलाया है। एनजीओ के संरक्षक चंद्रभूषण मिश्र ने “जनचौक” से कहा कि “जब हम लोगों को बनारस जाना होता है तो चंधासी की धूल हमारे  कपड़ों को गंदा कर देती है, हमारे बच्चे जब स्कूल जाते हैं तो उनके ड्रेस गंदे हो जाते हैं ,जब हमारे बीच का कोई बीमार व्यक्ति इलाज हेतु चंधासी होते हुए बनारस जाता है तो वह चंधासी की धूल के गुबार से और ज्यादा बीमार हो जाता है। राहगीर जब बनारस जाता है तो चंधासी की धूल से नहाता हुआ जाता है। बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने वाले दर्शनार्थी जब यहां से गुजरते हैं तो चंधासी आकर यहां की धूल से स्नान पहले करते हैं फिर दर्शन पूजन करते हैं। जल्द से जल्द यहां से कोयला मंडी को शिफ्ट किया जाए।” समरजीत सिंह भी इनकी बातों से इत्तेफाक रखते हैं।

…तो योगी और मोदी की सरकार : अधिवक्ता संतोष 

एनजीओ पिता के विधिक संरक्षक वरिष्ठ अधिवक्ता संतोष कुमार पाठक ने कहा कि “पांच-पांच इंजन वाली भाजपा सरकार जिसका नगर पालिका में चेयरमैन है। मुगलसराय से भाजपा का विधायक है। चंदौली से भाजपा का सांसद है। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार है और देश में केंद्र की मोदी की सरकार भाजपा की है।  फिर भाजपा के आदर्श पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से रखा गया नगर मुगलसराय अभी तक प्रदूषण मुक्त क्यों नहीं हुआ ? चंधासी में धूल के गुबार क्यों उड़ रहे हैं ? अगर चंधासी के धूल के गुब्बार शांत नहीं हुए तो योगी की सरकार भी जाएगी और मोदी जी की सरकार भी जाएगी।”

(चन्दौली से पत्रकार पीके मौर्य की रिपोर्ट।)

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