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हमारा गुमान हमारा डर बन गया है

सुप्रीम कोर्ट की ओर से शाहीन बाग का रास्ता खुलवाने के लिए पहुंचे दो वार्ताकारों में से एक साधना रामचंद्रन ने यह पूछा कि क्या आप लोगों को सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है तो वहां मौजूद लगभग सभी लोग एक स्वर में यही बोले कि भरोसा है। लेकिन मेरे पास रिकॉर्डेड दूसरा सुर, जो पहले वाले से थोड़ा मध्यम था, और जो वार्ताकारों तक नहीं पहुंचा, वह यही था कि भरोसा नहीं है। अदालत पर ‘भरोसा है भी और नहीं भी’ की जो भावना है, यह सिर्फ शाहीन बाग तक ही नहीं है। पिछले कुछ सालों में हमारी अदालतें, खासतौर पर हमारे सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से कायदे कानून का तिया पांचा किया है, भरोसा रहना और ऐन उसी वक्त भरोसे के न रहने को क्या मानें?

एक सामान्य बात या एक नियति, जो संसद से लेकर अदालत की उस गोल गुंबद वाली इमारत में बैठे लोग अपने-अपने हिसाब से तय कर रहे हैं? जस्टिस दीपक मिश्र से लेकर जस्टिस रंजन गोगोई और अब जस्टिस बोबडे जो कुछ और जैसा कुछ भी कर रहे हैं, उसका खामियाजा कम से कम यह तीनों तो नहीं भुगतेंगे। उसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ हमारी न्याय व्यवस्था भुगतेगी। आज अगर शाहीन बाग सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकारों को सुनने को तैयार नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट को खुद सोचना होगा कि आखिरी बार उसने मुसलमानों की कब सुनी थी?

तीन तलाक का मामला हो, बाबरी मस्जिद विध्वंस का मामला हो या फिर जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का मामला हो, शाहीन बाग को ही नहीं, कायदा कानून जानने-मानने वाले हर किसी को लगता है कि अन्याय हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी नजर में जो न्याय किया, उसको अनुचित ठहराने और बताने के लिए एक से बढ़कर एक फैसले पहले से ही हैं, नजीरें हैं और शाहीन बाग जैसे देश भर में जो साढ़े चार सौ से भी अधिक बाग बन चुके हैं, सभी बागों में इन दिनों यही सब डिसकस हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तो खैर अन्याय करके अपना दरवाजा यों बंद कर लिया कि चेहरा नहीं दिखाएंगे। फिर जब शाहीन बाग की दादी कहती हैं कि कागज नहीं दिखाएंगे तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि वो चीजें बाद में बताएंगे, पहले रास्ते से हटो।

गुरुवार को जब सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकार संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन शाहीनबाग में बातचीत कर रहे थे, जामिया के पास रहने वाले इमरान अपनी दो बच्चियों के साथ उनके सामने पहुंचे और बेसाख्ता रोने लगे। कहने लगे कि उन्हें डर लगता है। अपने लिए और अपनी दो बच्चियों के लिए डर लगता है। इमरान की दोनों बच्चियों ने अपनी साइकिल पर तिरंगे बांध रखे थे और हाथ में एक पोस्टर ले रखा था, जिस पर लिखा था कि हम आपको हिम्मत देने आए हैं। इमरान का कहना था कि ये तिरंगा जो आज तक हमारा गुमान हुआ करता था, अब हमारा डर बन गया है। डर के मारे हमें तिरंगा अपने साथ रखना पड़ रहा है क्योंकि इसे नहीं रखेंगे तो आप हमें हिंदुस्तानी नहीं मानेंगे।

किसे हिंदुस्तानी मानें और किसे न मानें की शायद कोई याचिका अभी तक सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर नहीं पहुंची है। किसे हिंदुस्तानी मानें और किसे न मानें का कोई गैजेट अभी तक केंद्र की मोदी सरकार ने जारी नहीं किया है। सीएए जब सीएबी था, तभी से केंद्र सरकार के गृह मंत्री अमित शाह सहित कई दूसरे मंत्री समूचे भारत में घूम-घूमकर वह क्रोनोलॉजी समझा रहे हैं, जिसकी आग से इन दिनों असम भभक रहा है। असम की आंच समूचे भारत को महसूस हो रही है और इसी आंच से वह भय पैदा हुआ जो गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकारों के सामने बेसाख्ता बह निकला।

वार्ताकार कहते रहे कि कौन कहता है कि आप हिंदुस्तानी नहीं हो, वार्ताकार ढांढस बंधाते रहे कि आप हिंदुस्तानी ही हो, मगर भय का बहना बंद नहीं हुआ। भरी सभा से भय उठा और बाहर जाकर फुटपाथ पर बैठ गया। मैंने देखा, सभा से एक शाहीन उठी, फुटपाथ पर गई और उसने उस भय के आंसू पोंछ दिए। उसका इमरान से कोई नाता नहीं था, एक रिश्ता था, जिसे हम दर्द के रिश्ते के रूप में समझ सकते हैं और इन दिनों दर्द के इस रिश्ते में डर के एक नाते ने भी घर कर लिया है।

मोदी सरकार हर मंच से यही कह रही है कि किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है। फिर क्या बात है कि डरे हुए सारे लोगों ने हर शहर में अपना एक घेरा बना लिया है, जो मुसलसल बढ़ता जा रहा है?  इस बात का जवाब शाहीन बाग की सरवरी दादी देती हैं। वो कहती हैं कि हमें तो ये लोग एकदम बीच में लाकर घेर रहे हैं। दादी की बात में सच्चाई है। 2014 में जब से नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार बनी है, तब से जो मॉब लिंचिंग शुरू हुई, अगर इसे हांकने के रूप में ग्रहण करें तो दादी की बात बिल्कुल सही है।

मार मार कर मुसलमानों को बीच में लाकर खड़ा कर दिया है और अब क्रोनोलॉजी के जरिए उनमें से लोगों को चुनने की कवायद होने वाली है। और ये कवायद होने ही वाली है क्योंकि बीजेपी की सरकार ने संसद में यह लिखकर दिया है कि अभी उन्होंने एनआरसी लागू करने के बारे में तय नहीं किया है। शाहीन बाग में बैठे लोगों की मांग यही है कि एनआरसी को सिरे से रद्द किया जाए। अगर इसके बारे में सोचा भी गया है तो उस सोच को भी रद्द किया जाए और संसद को यह लिखकर दिया जाए कि एनआरसी नहीं होगी।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की ओर से जो दो वार्ताकार शाहीन बाग भेजे गए, उनका कोई मतलब बनता नहीं दिख रहा है। गुरुवार को शाहीन बाग और वार्ताकारों के बीच कुछ बातों को लेकर कई बार गहमागहमी हुई। पहली यही कि वार्ताकारों का कहना था कि वो सिर्फ रास्ते की बात करने आए हैं, कैसे दूसरों को परेशानी न हो, उनके अधिकार की रक्षा हो, इसकी बात करने आए हैं। शाहीन बाग की महिलाओं का कहना था कि दो महीने छह दिन से वे यहां रास्ते की बात करने नहीं बैठी हैं। वे यहां सीएए, एनआरसी और एनपीआर की बात करने बैठी हैं और सुख से नहीं बैठी हैं।

उन्हें दुख और डर, दोनों है। मगर सुप्रीम कोर्ट ने अपने वार्ताकार शाहीन बाग का दुख सुनने नहीं भेजे थे, इसलिए जब भी लोग यह कहें कि हमारा दुख तो सुनिए तो साधना रामचंद्रन उन्हें डांट दें कि हमें हमारा काम मत बताइये। जाहिर है कि इस तरह की लाग-डांट बेनतीजा ही रहने वाली थी और बेनतीजा रही भी। सुप्रीम कोर्ट जो सुनना चाहता है, सड़क पर बैठे लोग वह बात बोलें भी तो कैसे बोलें? मौके पर मौजूद रुखसाना सवाल करती हैं कि सवा दो महीने से यहां बैठे हैं, अभी तक तो कोई बात करने आया नहीं।

ये लोग बात करने आए हैं तो हमारे दुख पर नहीं बल्कि इनके सुख कैसे पूरे हों, इस पर बात करने आए हैं। फिर क्या गारंटी है कि कहीं और जाकर बैठ जाएंगे तो कोई बात करने आ ही जाएगा? नब्बे की हो रही आसमां बेगम, जो शाहीन बाग की दादी के नाम से मशहूर हैं, कहती हैं कि वे बापू के जुग-जमाने की हैं। मुंह दुख गया बताते-बताते कि ये बापू वाली बात नहीं है। दादी ने तो पूछा नहीं, मगर हम खुद से तो पूछ ही सकते हैं कि बापू वाली बात क्या है? बापू होते तो ये होता?

(लेखक राइजिंग राहुल दिल्ली में रहते हैं।)  

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This post was last modified on February 21, 2020 4:25 pm

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