ग्राउंड रिपोर्ट: सिंगाराम एनकाउंटर मामले में 14 साल बाद भी नहीं मिला इंसाफ, पीड़ित परिवार निराश

सुकमा, बस्तर, छत्तीसगढ़।

एक अकेली आदिवासी लड़की को

घने जंगल से जाते हुए डर नहीं लगता है

बाघ-शेर से डर नहीं लगता

पर महुआ लेकर गीदम के बाजार जाने से

डर लगता है।

विनोद कुमार शुक्ल की यह लाइनें आज भी छत्तीसगढ़ के बस्तर में प्रासंगिक हैं। खनिज की पहाड़ियों के बीच बसे इस क्षेत्र में आज भी ऐसी कई आवाजें न्याय की आस में दब जा रही हैं। ऐसी ही एक आवाज है सिंगाराम एनकांउटर 2009 की, जो न्याय की आस में अब अपनी जीत की लड़ाई को न्यायालय के हाथों हार चुकी है।

जून के महीने में छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट ने आठ जनवरी 2009 में हुए सिंगाराम एनकांउटर में मारे गए लोगों की मांग पर फैसला सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया है।

लगभग 14 साल बाद इस फैसले ने आदिवासियों के हौसले को तोड़ दिया है। यह एनकांउटर बस्तर के रिमोट एरिया का है। जहां आज भी आसानी से पहुंचना संभव नहीं है। ‘जनचौक’ की टीम ने इस घटना के पीड़ित परिवार से मिलकर कोर्ट के इस फैसले के बारे में बात की है।

एक लंबा रास्ता तय कर हम सिंगाराम गए। बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगभग 178 किलोमीटर दूर स्थित कोंटा से 40- 45 किलोमीटर दूर स्थित है सिंगाराम गांव। यहां तक पहुंचना आसान नहीं है। पहाड़ियों से घिरे इस गांव तक पहुंचने के लिए हमें टूटी फूटी सड़क, पहाड़ी नाले को पारकर पहुंचना पड़ा। पहाड़ी के पीछे बसे इस गांव में छोटी-छोटी पगडंडियां बनी हुई हैं। जहां से लोग पैदल या बाइक पर चलते हैं।

सिंगाराम गांव।

गांव में आधारभूत सुविधाएं नहीं

इस गांव पर पहुंचते ही सबसे पहले एक आंगनवाड़ी भवन दिखा, पीले और नीले रंग से रंगे इस भवन में ताला लगा हुआ है। हमारे पहुंचते ही गांव के कुछ बच्चे दूर से हमें देखकर हंस रहे हैं। लेकिन उन्हें न तो हमारी भाषा समझ में आ रही थी न हमें उनकी।

इस गांव के चारों तरफ पहाड़ियां हैं। जहां एक भी पक्का मकान नहीं है। खेतों के बीच हर 100 से 200 मीटर की दूरी पर दूसरा एक घर है। मिट्टी से बने इन घरों पर टाली और भूसे से छत्ते बनाई गई है। लगभग 65 घरों के चार से पांच पाड़े हैं। इसमें जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी अच्छी है उन्होंने अपने घरों पर सोलर पैनल लगा रखे हैं। ताकि थोड़ी बहुत लाइट आ सके। कुछ लोगों के पास मोबाइल भी हैं। लेकिन उनमें नेटवर्क नहीं हैं। आज भी यह गांव आधारभूत सुविधाओं से बहुत दूर है।

गांव में एक कच्चा आंगनवाड़ी भवन है। जिसमें गांव के कुछ बच्चे आते हैं और बगल के गांव के एक शिक्षक यहां पढ़ाने आते हैं।

इस गांव में पहुंचते ही हमने रामबाबू  नाम के एक युवक का पता पूछा। मेरे साथ गए कोंटा के पत्रकार इरफान खान ने हल्बी (भाषा) में युवक के घर का पता पूछा। हम उसके पास गए। रामबाबू थोड़ा पढ़ा लिखा था और उसे थोड़ी बहुत हिंदी भी आती है।

मैंने मिलते ही उनसे पूछा क्या आपको पता है कि बिलासपुर हाईकोर्ट ने गांव द्वारा लगाई गई याचिका को खारिज कर दिया है? राम बाबू ने कहा उसे इसकी जानकारी नहीं। हमने राम बाबू को पीड़ितों के परिवार वालों से मिलाने की बात कही।

अब वह हमारे साथ चलना शुरू हुए और बीते सालों की बात करने लगे। उन्होंने बताया कि हमारे गांव के आसपास के गांव में भी आदिवासियों का एनकांउटर हुआ है। लेकिन मेरे पाड़ा में चार से पांच घर हैं। हमने उनसे परिवार वालों से मिलाने के लिए आग्रह किया। चूंकि शाम ढलने वाली थी इसलिए हमने उन्हें थोड़ा जल्दी करने को कहा।

बच्चे के जन्म से पहले ही पिता का एनकांउटर

गांव में सभी घर एक दूसरे से कम से कम 100 से 200 मीटर की दूरी पर हैं। सबसे पहले हम कराम लच्छा के घर गए। मिट्टी का घर और उसमें भूसे की छत। घर के पास आम और इमली का एक पेड़ है। इसमें ही रहते हैं कराम लच्छा की विधवा पत्नी और दो बच्चे।

राम बाबू ने इस घर में जाकर आवाज लगाई। एक बच्चा बाहर आया। उसके हाथ में फोन की बैटरी थी और मकड़ी चार्जर, जिसमें शायद वह तार फिट कर रहा था। राम बाबू ने बच्चे से हल्बी में पूछा कि तुम्हारी मां कहां है? उसने बताया कि मां तो आज कोंटा गई हैं। छोटी भाई को लेकर शाम तक ही लौटेंगी। हम लोग कुछ देर वहां खड़े रहे।

इसी दौरान राम बाबू ने बताया कि जिस वक्त जनवरी को यह घटना हुई तब कराम लच्छा की पत्नी कराम कन्नी गर्भवती थीं। पहले बेटा बहुत छोटा था। शायद उसे कुछ याद भी न हो।

कराम लच्छा की विधवा पत्नी कराम कन्नी।

हमने बच्चे से पूछा कि क्या आपको अपने पिता के बारे में कुछ याद है? उसने हल्बी में जवाब देते हुए कहा कि मुझे तो मां ने पाला है। खेती करती हैं मेरी मां, बाकी पिताजी के बारे में बहुत कुछ याद नहीं है। न ही कोर्ट में चल रहे किसी मुकदमें के बारे में कुछ पता है। लगभग 15 से 16 साल के बच्चे ने हमें अपने आम के पेड़ से आम तोड़कर दिया। चूंकि वह हिंदी नहीं बोल पा रहा था। उसने हंसकर ही अपनी भावना को प्रकट किया। इस बीच बातों का सिलसिला भी चल रहा था।

राम बाबू ने हमें बताया कि जिस वक्त यह एनकांउटर हुआ कराम कन्नी गर्भवती थीं। उसके दूसरे बेटे ने तो अपने पिता को देखा भी नहीं है। उसका जन्म इस घटना के बाद हुआ था।

अब हम लोग बढ़े। गांव की मौजूदा स्थिति पर बातचीत होती है। रामबाबू शिक्षा पर बात करते हुए कहते हैं कि यहां आंगनबाड़ी तो है लेकिन कार्यकर्ता कभी नहीं आती है। कोई सहायिका नहीं है। बच्चों को खाना भी नहीं मिलता है। सिंगाराम के चार पाड़े हैं जिसमें लगभग 63 घर हैं। इनके बच्चों की शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। साल 2022 में दो आंगनवाड़ी के भवन बने हैं। लेकिन उन पर ताला लगा हुआ है।

आज भी पुलिस से डर लगता है

इतनी बातों के बीच दूसरा घर आ जाता है। रास्ते में ही हमें बताया जाता है कि इस घर की बेटी का एनकांउटर हुआ है। अब घर में उसके चार छोटे भाई औऱ मां हैं। हमने घर पर पहुंचकर मलामसीती (मृतका) की मां से बातचीत की। उन्होंने बताया कि जिस वक्त यह घटना हुई बेटी की उम्र 26 साल की थी।

एनकांउटर के बाद मलामसीती के पिता मलाम लचा बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर करने गए थे। इस घटना के एक साल बाद बीमारी के कारण उनकी भी मृत्यु हो गई।

उस दिन की घटना का जिक्र करते हुए मलामसीती की मां बताती हैं कि “वह मेरी सबसे बड़ी बेटी थी। उसके बाद चार बेटे हैं। वह बड़े ही शांत भाव से बताती हैं कि जिस वक्त उसे गोली मारी गई, परिवार वाले घर में थे। बेटी दूसरे के घर में सोई थी। वहीं से उसे उठाकर लेकर गए थे”।

मलामसीती की मां।

बेटी के साथ रेप पर बात करते हुए बड़े दुखी मन से कहती हैं किया भी होगा तो हमें क्या पता। हमें तो हमारी बेटी की लोथ ही मिली थी। अब वहां कैसे प्रताड़ित किया गया। इसके बारे में हम क्या कह सकते हैं।

वह कहती हैं “इतना लंबा समय बीत गया है कि हमने न्याय की उम्मीद ही छोड़ी दी है”।

हमने उनसे पूछा कि क्या अब भी पुलिस गांव आती है? क्या पुलिस से डर लगता हैं? इसका जवाब वह बड़े ही सहज भाव से देते हुए कहती हैं कि “अब भी पुलिस गांव में कभी-कभी गश्त लगाने आती है। बाकी जहां तक डर की बात है हमें पहले भी डर लगता था अब भी लगता है। पता नहीं कब कोई अनहोनी हो जाए”।

इस घर से दो तीन लंबी पगडंडी पार करने के बाद आता है कारामुक्ता का घर। सिर्फ मिट्टी की दीवारों और भूसे की छत का बना एक कमरा था। जिसमें से कारामुक्ता को एसपीओ (स्पेशल पुलिस फोर्स) बुलाकर लेकर गए थे।

सोए को उठाकर घर से लेकर गए

कारमकारा (कारामुक्ता के भाई) कमरे से बाहर निकलते हैं। शाम के करीब चार बज रहे थे, वह इसी कमरे में जमीन पर लेटे थे। इस कमरे में कुछ नहीं था। वह बाहर आकर हमसे मिलते हैं। मैंने उन्हें अपना परिचय बताया और पूछा कि आपको पता है आप लोगों की तरफ से साल 2009 की घटना पर जो मुआवजा और सीबीआई की मांग की थी उसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है।

इस बात को सुनकर वह कुछ देर के लिए सोचने लग जाते हैं और कहते हैं कि मुझे या परिवार में किसी को भी इसकी जानकारी नहीं है। अब इस बात को इतने साल हो गए हैं कि न्याय की उम्मीद तो हम पहले से ही छोड़ चुके थे, अब यह सूचना भी मिल गई है।

कारमकारा के घर में तीन सदस्य हैं। माता-पिता और वह स्वयं। उसके माता-पिता दोनों घर पर नहीं थे। उस दिन की घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि कारामुक्ता 20 साल के थे। जब उसे मारा गया। वह खेती करता था।

मेरा भाई इसी घर में था जब उसे यहां से उठाकर ले गए। भाई घर में अकेला था। हमें बाद में उसके एनकांउटर की खबर मिली।

कारमकारा

इन सब बातों के बीच रामबाबू गांव की स्थिति पर बात करते हुए कहते हैं कि देश बहुत आगे निकल गया है लेकिन हमारे यहां बिजली नहीं पहुंच पाई है। जिस डीआरजी मड़काम मुदराज ने ये सारी फर्जी मुठभेड़ करवाई आज उसकी पत्नी यहां की सरपंच है। कोई उसको नहीं जानता। न ही वह कभी गांव आई है।

इस घटना पर सामजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने याचिका दायर की थी। वह लंबे समय से आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमने उनसे इस फैसले के बारे में बात की।

उस समय की घटना का जिक्र करते हुए हिमांशु कुमार कहते हैं कि “जिस वक्त यह घटना हुई उस वक्त मैं दिल्ली में था। मुझे यह जानकारी मिली कि छत्तीसगढ़ में एक बड़ा जनसंहार हुआ है। मैंने तुरंत इसके बारे में अपने एक साथी के साथ बात कर उसे घटनास्थल पर जाने को कहा और जाकर फैक्ट फांइडिंग करने को कहा। क्योंकि पुलिस का दावा था कि उसने नक्सलियों को मारा है। जबकि कहानी इसके उलट थी।”

वह बताते हैं कि इस घटना के बाद तहलका के पत्रकार अजीत साही और वर्तमान में छत्तीसगढ़ के मंत्री कवासी लखमा भी गांव लोगों से मिलने गए। पत्रकार ने गांव के लोगों से अलग-अलग बात की। पूरे गांव ने एक ही बात बताई।

इसके बाद अजीत साही दंतेवाड़ा गए और उस वक्त की एसपी राहुल शर्मा से बातचीत की और एनकांउटर में शामिल पुलिस वालों से बातचीत करने की अनुमति मांगी। जब उन्होंने पुलिस वालों से बातचीत की तो सबकी बात अलग-अलग थी। जिससे यह साफ पता चलता है कि वह फर्जी एनकांउटर था। जिसमें मासूम आदिवासियों को टारगेट किया गया था।

अपने 13 साल के संघर्ष पर बात करते हुए हिमांशु कुमार बताते हैं कि “इस घटना के बाद मैं पीड़ित परिवारों को बिलासपुर लेकर गया। वहां केस फाइल करवाया। इतने लंबे समय तक इसके लिए लड़ाई लड़ी। साल 2009 को जब केस फाइल किया उस वक्त राजनीतिक गलियारों में भी इसको लेकर खूब गहमगहमी थी।”

उस वक्त की राजनीति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि साल 2009 में सिंगाराम एनकांउटर के वक्त भाजपा की सरकार थी और कांग्रेस विपक्ष में। अब कांग्रेस की सरकार है और इसी दौरान याचिका का खारिज कर दिया गया है। जबकि 2009 में जब कांग्रेस विपक्ष में थी तो पार्टी के लोगों ने इसे फर्जी मुठभेड़ बताते हुए विधानसभा से वॉक ऑउट किया था। जिसमें कांग्रेस के 30 विधायक निलंबित हुए थे।

वह कहते हैं कि लड़ाई में मुझे अपना बहुत कुछ कुर्बान करना पड़ा है। साल 2009 में इस घटना के बाद ही उनके “वनवासी चेतना आश्रम” पर बुलडोजर चलाकर उसे पूरी तरह से जमींदोज कर दिया गया।

हमने उनसे पूछा कि हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद क्या अब वह सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे? इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि अब मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि दोबारा केस लड़ा जाए। उस वक्त मेरे पास पैसे थे तो बस्तर से आदिवासियों को बिलासपुर ले जाता था। लेकिन अब संभव नहीं है। अगर कोई हमें सपोर्ट करें तो जरूर इस लड़ाई को लड़ा जाएगा।

उस वक्त के तहलका के वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही जो कि अब अमेरिका में रहते हैं, उनसे हमने इस बारे में बात की। इस घटना पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि सिंगाराम गांव की घटना एक दशक से भी ज्यादा पुरानी है। फिलहाल इस बारे में बहुत सारी बातें मुझे पूरी तरह से याद नहीं है। लेकिन मैंने इस घटना पर एक महीने बाद रिपोर्ट की थी, यह रिपोर्ट आज भी इंटरनेट पर मौजूद है, आपको वहां से जानकारी मिल जाएगी।

वह बताते हैं कि मुझे अच्छे से याद है, वहां (सिंगाराम गांव) जाने की कोई सुविधा नहीं थी। हमलोग कई किलोमीटर तक पैदल चलकर उस गांव तक पहुंचे थे। गांव में कोई भी सुविधा नहीं थी। यहां तक की आजादी के इतने साल बाद भी गांव में लाइट नहीं थी। लोगों के बीच में उस घटना के लेकर काफी डर था।


सिंगाराम गांव का एक घऱ।

वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही ने बस्तर में नक्सली और सुरक्षा बल के बीच पिसते आदिवासियों पर एक सीरीज लिखी है। जिसमें सिंगाराम एनकांउटर पर पूरी दास्तां को लिखा है। स्टोरी में बताया गया है कि सात जनवरी 2009 को किस तरह से गांव के लोगों को पहले इकट्ठा किया और बाद में उन्हें नक्सली कह कर एनकांउटर किया गया।

बेला भाटिया का कहना है कि हाईकोर्ट किसी भी राज्य के न्याय प्रक्रिया की सबसे बड़ी ईकाई है। जहां लोगों को उम्मीद होती है कि उन्हें न्याय मिलेगा। लेकिन आदिवासियों को तो यहां भी न्याय नहीं मिल रहा है।

वह सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौरान हुई प्रताड़ना का जिक्र करते हुए वो कहती हैं कि इसमें कई लोग मारे गए हैं। उसके बाद इन मामलों के बाद कुछ ही ऐसे केस थे जो हाईकोर्ट तक पहुंच पाए थे। उस पर हाईकोर्ट ने इतने साल बीत जाने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं की। बल्कि एक ही सप्ताह में सभी केसों को खारिज कर दिया। जिसमें बीजापुर जिले के पेद्दागेल्लूर रेप केस का भी मामला था, उसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया या यूं कह सकते हैं कि पल्ला झाड़ लिया।

बेला भाटिया कहती हैं कि अब इस फैसले की जितनी भी निंदा करें वह कम है। इस तरह का फैसला उन गरीब आदिवासी जनता के साथ धोखा है।   

बिलासपुर हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अपने फैसले में कहा है कि याचिकाकार्ताओं की मांगों को पूरा नहीं किया जा सकता है। 15.09.2015 की मजिस्ट्रियल इंक्वायरी रिपोर्ट के अनुसार जिन 15 लोगों की पुलिस इनकांउटर में मृत्यु हुई थी। वो सभी नक्सली गतिविधियों में संलिप्त थे।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह केस बहुत पुराना है। इसमें सभी तरह की जांच हो चुकी है। इसलिए अब इसमें सीबीआई की जांच की जरूरत नहीं है। जितनी भी जांच हुई है उससे यह स्पष्ट होता है कि इसमें कोई भी निर्दोष नहीं था।

वहीं दूसरी ओर कार्यकर्ता हिमांशु कुमार का कहना है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में यह पाया गया था कि ये मुठभेड़ फर्जी थे। इसकी जांच में गड़बड़ियां थीं।

वह कहते हैं कि इस मुठभेड़ में एक भी पुलिस सिपाही नहीं था। सिर्फ एसपीओ ही थे और कानूनी तौर पर उन्हें कोई भी ऑपरेशन करने के अनुमति नहीं है।

वह आईपीएस राहुल शर्मा द्वारा की गई करवाई पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि यह फर्जी मुठभेड़ थी, इसमें आदिवासियों को कुछ लोगों द्वारा मारा गया था। यह सारी बातें हमारी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार की रिपोर्ट से जाहिर होती है।

वह कहते हैं कि इस फर्जी मुठभेड़ के कानूनी पेचों में वह बहुत बुरी तरह से फंस गए थे। शायद इसलिए उन्होंने आत्महत्या भी कर ली। क्योंकि राहुल शर्मा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि जज उसे परेशान कर रहा था।

मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए वह कहते हैं कि इस घटना के बाद हमने पुलिस से इस बारे में बात की। हमने पुलिस से पूछा कि कितने राउंड फायरिंग हुई थी। उनका जवाब था अंधाधुंध। जबकि पुलिस द्वारा कितनी गोली चलाई गई। इसके जवाब था सिर्फ 25।

हमने तुरंत पुलिस से पूछा कि अपने उनके तरफ से अंधाधुध गोलियां चलाई गईं तो आपकी तरफ से कोई भी नहीं मरा। जबकि आपकी 25 गोलियों से 19 लोग मर गए।

वह कहते हैं जहां भी फायरिंग होती है वहां पेड़ की पटिया गिर जाती हैं। लेकिन वहां ऐसा कुछ भी नहीं था। ये सारी चीज़ें यह बताने के लिए काफी हैं कि मुठभेड़ फर्जी थी।

दायर की गई याचिका में यह मांग की गई थी कि मृतक के परिवार वालों को सरकार द्वारा 25 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही सीबीआई से जांच करवाई जाए। इन दोनों मांगों से कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

(बस्तर के सिंगाराम से पूनम मसीह की ग्राउंड रिपोर्ट।)

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