न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आंतरिक जाँच समिति की उस रिपोर्ट को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की है जिसमें उन्हें घर में नकदी रखने के विवाद में दोषी ठहराया गया है। उन्होंने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश को भी चुनौती दी है।
यह एक अभूतपूर्व घटनाक्रम है जहाँ एक वर्तमान न्यायाधीश ने अपने खिलाफ जाँच रिपोर्ट को रद्द करने की माँग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है। यह रिट याचिका 17 जुलाई, 2025 को दोपहर दायर की गई। भारत संघ और सर्वोच्च न्यायालय प्रतिवादी हैं। न्यायमूर्ति वर्मा का यह कदम संसद के मानसून सत्र से पहले आया है, जो आगामी सोमवार से शुरू हो रहा है और उसी दिन उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किए जाने की संभावना है।
न्यायमूर्ति वर्मा का तर्क है कि आंतरिक जाँच समिति ने उन्हें जवाब देने का उचित अवसर दिए बिना ही यह निष्कर्ष निकाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि समिति ने पूर्वाग्रहपूर्ण तरीके से कार्यवाही की और कोई ठोस सबूत न मिलने पर भी, सबूतों का भार उलटकर उनके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल दिए।
यह मामला 14 मार्च, 2025 को अग्निशमन अभियान के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास के बाहरी हिस्से में आंशिक रूप से जले हुए नोटों के विशाल ढेर की खोज से संबंधित है। इस खोज के बाद भारी सार्वजनिक विवाद उत्पन्न होने पर, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने तीन न्यायाधीशों की एक आंतरिक जाँच समिति गठित की, जिसमें निम्नलिखित शामिल थे: न्यायमूर्ति शील नागू (तत्कालीन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश), न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया (तत्कालीन हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति अनु शिवरामन (कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायाधीश)। न्यायमूर्ति वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया और जाँच लंबित रहने तक उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।
समिति ने मई, 2025 में मुख्य न्यायाधीश खन्ना को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे मुख्य न्यायाधीश ने आगे की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दिया। न्यायमूर्ति वर्मा ने मुख्य न्यायाधीश के इस्तीफे की सलाह मानने से इनकार कर दिया था।
तीन न्यायाधीशों वाली आंतरिक जाँच समिति ने 14 मार्च, 2025 को हुई आग की घटना के बाद न्यायमूर्ति वर्मा के आचरण को, जिसके कारण नोटों की बरामदगी हुई थी, अनुचित बताया, जिससे उनके खिलाफ कुछ प्रतिकूल निष्कर्ष निकले।
न्यायमूर्ति वर्मा और उनकी बेटी सहित 55 गवाहों और अग्निशमन दल के सदस्यों द्वारा लिए गए वीडियो और तस्वीरों के रूप में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जाँच के बाद, समिति ने माना कि उनके आधिकारिक परिसर में नकदी पाई गई थी। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि भंडार कक्ष न्यायमूर्ति वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों के “विशिष्ट या सक्रिय नियंत्रण” में था, समिति ने कहा कि नकदी की मौजूदगी के बारे में स्पष्टीकरण देने का दायित्व न्यायमूर्ति वर्मा का है। चूँकि न्यायाधीश “स्पष्ट इनकार या साजिश के अस्पष्ट तर्क” देने के अलावा, कोई उचित स्पष्टीकरण देकर अपना दायित्व पूरा नहीं कर सके थे, इसलिए समिति ने उनके खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव करने के लिए पर्याप्त आधार पाया।
इस प्रकार, जहाँ तक आंतरिक प्रक्रिया न्यायपालिका द्वारा न्यायाधीशों को “हटाने” के लिए किसी भी प्रकार की “सिफारिशों” की अनुमति देती है, इसे “सिद्ध कदाचार” और “उच्च पद के अनुरूप न होने वाले बुरे आचरण” के बीच के “अंतर” को भरने के रूप में वैध नहीं ठहराया जा सकता।
इसके अतिरिक्त, यह विधायी अनुमोदन के बिना दंडात्मक परिणामों को सक्षम करके, मानकों या सुरक्षा उपायों के बिना अत्यधिक शक्ति को केंद्रित करके संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करता है, और इस प्रकार न्यायिक स्वतंत्रता और जनता के विश्वास को कम करता है, उन्होंने अपनी याचिका में कहा।
इस बीच, वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ की गई आंतरिक जाँच पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि इस मामले में न तो पारदर्शिता रखी गई, न ही न्यायिक प्रक्रिया का पालन हुआ और न्यायाधीश को बिना सुने ही रिपोर्ट तैयार कर दी गई।
इस मामले पर कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर सरकार महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है तो उसे संसद के जरिए करना चाहिए, लेकिन यहाँ तो सीधे-सीधे हस्तक्षेप किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस आउटहाउस से नकदी मिली है, वह न्यायाधीश को आवंटित क्षेत्र में था, लेकिन बिना किसी ठोस जाँच के सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई की।
सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाई गई तीन सदस्यीय समिति की आलोचना करते हुए कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा को बयान देने का मौका तक नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, “आपने जाँच की और रिपोर्ट बनाई, लेकिन जज की बात तक नहीं सुनी। यह न्याय के खिलाफ है।”
कपिल सिब्बल ने कहा, “या तो सरकार किसी बात से नाराज़ है या फिर यह समय देखकर NJAC (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) को फिर से लाने की कोशिश हो रही है, ताकि न्यायपालिका पर दबाव बनाया जा सके।”
सिब्बल ने एक अन्य मामले का हवाला देते हुए बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की जाँच छह महीने से लंबित है। उन्होंने कहा, “राज्यसभा सचिवालय कहता है कि मेरे हस्ताक्षर नहीं मिल रहे हैं। छह महीने बीत गए, पर वे सत्यापन नहीं कर पाए। क्या यह दोहरा रवैया नहीं है?”
जाँच समिति ने पिछले महीने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजी थी। सिब्बल ने कहा कि रिपोर्ट में यह तक नहीं बताया गया कि कितनी नकदी मिली और कैसे यह मान लिया गया कि वह न्यायाधीश की अनुमति से रखी गई थी।
कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि पिछले साल पूरी तरह से सांप्रदायिक टिप्पणी करने के बावजूद केंद्र सरकार इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शेखर कुमार यादव को बचाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सवाल किया कि राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने न्यायाधीश यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए दिए गए नोटिस पर कोई कदम क्यों नहीं उठाया? सिब्बल ने कहा कि पूरे मामले में “पक्षपात” की बू आती है क्योंकि एक तरफ राज्यसभा के महासचिव ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि यादव के खिलाफ आंतरिक जाँच को आगे न बढ़ाएँ क्योंकि राज्यसभा में उनके खिलाफ एक याचिका लंबित है, जबकि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले में उन्होंने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने कहा कि यदि उच्च न्यायालय के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को आंतरिक जाँच रिपोर्ट के आधार पर हटाने की कोशिश की जाती है, तो यह संविधान के खिलाफ होगा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना जाएगा। दरअसल, यह विवाद तब और गहरा गया जब केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की बात कही।
उन्होंने कहा कि यह किसी राजनीतिक साजिश का मामला नहीं है, बल्कि न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे में इस पर संसद को एकजुट होकर निर्णय लेना चाहिए। कपिल सिब्बल ने इस पूरे घटनाक्रम को एक “खतरनाक परंपरा” करार देते हुए कहा कि हम सरकार को चेतावनी देते हैं कि यदि आंतरिक जाँच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई हुई तो वह संविधान का उल्लंघन होगा। यह न्यायपालिका को नियंत्रित करने का अप्रत्यक्ष तरीका होगा।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)