राधिका को मारने आए मनु के चरणों में लोटते मनुजाये

पिछले सप्ताह, जब दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा नदी की तरह उफन रहा था, गाड़ियाँ डूब रही थीं, यूपी से गुजरात तक चारों ओर पुल टूटकर गिर रहे थे, उसी सप्ताह में राष्ट्रीय राजधानी के एक पॉश इलाके के बड़े से घर में एक अंतरराष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी राधिका यादव की साँसों का पुल टूट गया। एक युवती के सपने उसी के खून में डूब गए। दिल्ली देर-सबेर सूख जाएगी, मगर राधिका के खून के धब्बे-यदि उनके निशान और जहाँ वे ले जाने के संकेत दे रहे हैं, उस मुकाम की सही शिनाख्त नहीं हुई तो-बहुत कुछ लहूलुहान करने की आशंका से भरे हैं।

राधिका यादव को उनके पिता ने मार डाला। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हो गया कि हत्यारे पिता का पीछे से गोलियाँ मारने का दावा गलत था; गोलियाँ आँखों में आँखें डालकर उनके सीने में मारी गई थीं। हत्या के पीछे के जघन्य इरादों पर पर्दा डालने के लिए आनन-फानन में इसे हिंदू-मुस्लिम रंग देने की कोशिशें हुईं, मगर वे ज्यादा देर तक टिक न सकीं।

हालाँकि, हरियाणा पुलिस ने इसे लपककर अपने खीसे में डाल लिया और जाँच के लायक बताया। बहुत संभव है कि देर-सबेर इस कुटिलता को आजमाया जाए। मगर फिलहाल, राधिका की खास दोस्त ने हत्या से पहले उनके यातना भरे दौर की सच्चाई सामने ला दी है। सभी अफवाहों और सनसनीखेज बातों को बेबुनियाद बताते हुए हिमांशिका ने जो बताया, उसका सार यह है कि राधिका का परिवार उनकी खेलकूद और सांस्कृतिक अभिरुचियों को नापसंद करता था।

राधिका पर सख्त पाबंदियाँ लगाई जाती थीं, उनके वीडियो कॉल्स पर निगरानी रखी जाती थी, और समाज के दबाव की बात की जाती थी। हर छोटी-बड़ी बात पर उन्हें टोका जाता, सफाई माँगी जाती। वह घुटकर रह गई थी। लड़कों से बात करने और शॉर्ट्स तक पहनने पर रोका-टोका जाता था। राधिका अपनी शर्तों पर जीती थी, जो उनके परिवार को पसंद नहीं था। आखिरकार, इन सब पर रोक लगाने के लिए उनकी हत्या कर दी गई।

उनके पिता ने भी यही बात अलग अंदाज में कही। उन्होंने कहा कि गाँव के लोग और रिश्तेदार उनकी बेटी को लेकर ताने मारा करते थे। पुलिस के मुताबिक, उनकी नजर में “ग्रामीणों द्वारा ताने मारे जाने के बाद अपनी बेटी को अकादमी बंद करने के लिए कहने के अलावा कोई और मकसद सामने नहीं आया है।”

मतलब यह कि यह हत्या तात्कालिक गुस्से या क्रोध में नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से योजनाबद्ध तरीके से की गई। एक काबिल खिलाड़ी की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वह अपनी सृजनात्मकता में रुचि रखती थी, बच्चों को ट्रेनिंग देती थी, उन्हें खेलना सिखाती थी, संगीत पसंद करती थी। उसे सिर्फ इसलिए मार डाला गया, क्योंकि उसके ऐसा करने से परिवार की ‘इज्जत और प्रतिष्ठा’ खराब हो रही थी।

उनके पिता को “समाज” के ताने सुनने पड़ते थे। यह हत्या उन लोगों द्वारा की गई, जो आधुनिकता से अपरिचित किसी दूरदराज के गाँव-खेड़े में नहीं, बल्कि मॉडर्न और विकसित भारत की धनी बस्तियों में से एक, गुड़गाँव-जिसे अब गुरुग्राम कहा जाता है-में रहते थे। यह उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में हुई, जिसके बारे में यह भ्रम पाला जाता है कि वह दकियानूसीपन से बाहर आ चुका है।

यही है न्यू इंडिया-मोदी का न्यू इंडिया। यही वह ताने मारने वाली ‘सोसायटी’ है, जो इस नए भारत में पाल-पोसकर तैयार की जा रही है; यही हैं उसकी ‘इज्जत और प्रतिष्ठा’ के मानदंड, जो एक पिता को अपनी ही बेटी की हत्या करने और उसे ‘वध’ बताने की बर्बरता से लैस करते हैं। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि इसके पहले का भारत युवतियों और महिलाओं के लिए कोई स्वर्ग था-बिल्कुल नहीं। मगर नरक जैसे हालात से बाहर आने की दिशा में उद्यत तो था। पूरी तरह सुबह नहीं हुई थी, मगर भोर के उजाले की आमद तो दिखने लगी थी।

समाज की चेतना और जागृति में, भले धीमे-धीमे ही सही, सकारात्मक परिवर्तन तो हो रहा था। महिलाओं में बेड़ियों से मुक्त होने की जिद और उसके लिए जूझने का संकल्प सुदृढ़ हो रहा था। बहसों, आंदोलनों, संघर्षों और उनके दबाव में उठाए गए सकारात्मक कदमों से सदियों पुरानी वे जंजीरें ढीली हो रही थीं, जिन्हें कुछ स्मृतियों की धधकती आग में पिघलाकर, कई संहिताओं के कठोर साँचों में ढालकर, परंपराओं के नाम पर आभूषण बताकर भारतीय समाज, और खासकर महिलाओं, को नख से शिख तक पहनाया गया था।

मोदी के न्यू इंडिया-जो दरअसल मनुस्मृति में यकीन करने वाले संघ का न्यू इंडिया है-में इस सबको उलट दिया जा रहा है। मनु का झंडा उठाए पिछड़ी चेतना का अंधड़-सा ला दिया गया है। राधिका यादव उसी अंधड़ की भेंट चढ़ गई। यह दीपक यादव नहीं था, यह मनु था, जो इस बार हाथ में बंदूक लेकर मनु की तय सीमाएँ लाँघ रही राधिका का ‘वध’ करने आया था। उनके द्वारा हत्या की जगह ‘वध’ शब्द का उपयोग अकारण नहीं; वह हत्या और वध में अंतर जानता है। उसे पता है कि शास्त्रानुसार ‘वध’ दैत्यों और असुरों, बुरे लोगों का किया जाता है और इस तरह यह पुण्य कार्य माना जाता है।

मनुस्मृति, जिसे भारत के संविधान की जगह प्राण-प्रतिष्ठित करने के लिए भाजपा का मातृ-पिता संगठन कटिबद्ध है, वह ग्रंथ है, जो पूरे विस्तार के साथ महिलाओं की स्थिति के बारे में नियम निर्धारित करता है। इसके अध्याय नौ में 300 से ज्यादा श्लोक हैं, जिनमें महिलाओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार के बारे में विस्तार से प्रावधान किए गए हैं।

एक श्लोक कहता है कि “सभी जातियों में इस कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए कि पत्नियों और महिलाओं पर चौकसी रखी जाए।” एक अन्य श्लोक में कहा गया है कि “ईश्वर ने महिला को बनाते वक्त उसमें जिस तरह की मनोवृत्ति जोड़ी थी, उसे ध्यान में रखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि पुरुष पूरे ध्यान से उन पर निगरानी रखें।”

मनुस्मृति का एक और कुख्यात श्लोक महिलाओं के बारे में यह प्रावधान करता है कि “बचपन में उसे अपने पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के संरक्षण में, और बुढ़ापे में अपने पुत्रों के संरक्षण में रहना चाहिए। एक औरत कभी भी स्वाधीन रहने के काबिल नहीं होती।” एक अन्य श्लोक निर्देश देता है कि “परिवार में पुरुषों को चाहिए कि वे औरत को दिन-रात अपनी गुलाम बनाकर रखें और जब भी वे इंद्रिय सुख लेना चाहें, तब लें और स्त्री को हमेशा अपने वश में रखें।”

यह मनुस्मृति ही थी, जो भारत की गुलामी का एक बड़ा कारण बनी थी। यही वजह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जितने भी राजनीतिक और सामाजिक सुधार आंदोलन चले, उनमें से ज्यादातर ने मनुस्मृति को अभिशाप माना और इसके दुष्प्रभावों से समाज को मुक्त कराने के अभियान छेड़े। मगर कुछ लोग थे, जो उस दौर में अंग्रेजों की गुलामी को भी अभिशाप नहीं मानते थे। वे तब भी मनुस्मृति को ही भारत पर राज करने का एकमात्र समुचित और व्यवस्थित प्रावधान मानते थे।

यही लोग बाद में आरएसएस के रूप में संगठित हुए और उन्होंने आजादी के महासंग्राम का विरोध किया। जनता ने इन्हें तब ठुकरा दिया था। हालात कुछ बदले, मगर पुनरुत्थानवादी गिरोह ने अपनी कोशिशें जारी रखीं। पिछले 11 वर्षों से सत्ता सूत्र उनके हाथ में आते ही सामाजिक सोच को दूषित करने का नतीजा 10 जुलाई को राधिका यादव के घर पहुँच गया।

इन्होंने मनुस्मृति कभी नहीं त्यागी-उसके प्रति अपना समर्पण बार-बार दोहराया। आरएसएस-जो मनुस्मृति के आधार पर राज लाना-चलाना चाहता है-के विचार गुरु गोलवलकर के शब्दों में: “एक निरपराध स्त्री का वध पापपूर्ण है, परंतु यह सिद्धांत राक्षसी के लिए लागू नहीं होता।” राक्षसी कौन? जो उनके मनु के कहे को न माने।

इस प्रसंग में वे एक कहानी सुनाते हैं, जिसमें शादी के लिए अपने परिवार को राजी करने में असफल प्रेमी अपनी प्रेमिका का गला घोंटकर मार देता है और उसे तनिक भी पीड़ा नहीं होती। उन्होंने अनेक बार कहा कि महिलाएँ मुख्य रूप से माँ हैं; उनका काम बच्चों को जन्म देना, पालना-पोसना, संस्कार देना है। यह सिर्फ एक ‘गुरुजी’ के कथन नहीं, यह संघ के हिंदू राष्ट्र का विधान है, जिसे बाद के सरसंघचालकों ने भी बार-बार दोहराया।

इसकी महिला शाखा, राष्ट्र सेविका समिति की नेता सीता अन्नदानम भी यही मानती हैं। उन्होंने कहा कि “हमारी परंपराओं में महिला अधिकारों के बीच संतुलन चाहिए। पिता की संपत्ति में हिस्सा हमारी संस्कृति नहीं है। शास्त्रों में जैसा लिखा है, वैसा ही किया जाना चाहिए-वैवाहिक बलात्कार नाम की कोई चीज नहीं होती; यह पाश्चात्य धारणा है। समता, बराबरी, लोकतंत्र सब पाश्चात्य धारणाएँ हैं।”

इन्हें समय-समय पर लागू भी किया गया। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए महिलाओं की “सुरक्षा” के नाम पर एक खास “इंतजाम” का ऐलान किया गया था, जो पुलिस द्वारा उनकी आवाजाही पर नजर रखने का था। शिवराज के बयान के अनुसार, मध्यप्रदेश में “जो भी महिलाएँ नौकरी या काम पर जाएँगी, उन्हें अपने पुलिस थाने में पंजीयन कराना होगा ताकि पुलिस उन्हें ट्रैक कर सके, यानी उन पर निगरानी रखी जा सके।”

कामकाजी महिलाओं से शुरू किए गए इस इंतजाम में बाद में सभी लड़कियों, कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राओं और घर से बाहर निकलने वाली अन्य महिलाओं को भी निगरानी के दायरे में लिया जाना था। यही सोच है, जिसके चलते इन 11 सालों के राज में कथित सम्मान हत्याओं-ऑनर किलिंग-के खिलाफ कोई कानून नहीं लाया गया।

तय है कि लोकतंत्र की सिकुड़न के इस दौर में, जहाँ यह पहले से ही सिकुड़ा हुआ था, वहाँ यह और भी संकुचित होगा। जहाँ सामाजिक लोकतंत्र नाममात्र का हो, पारिवारिक लोकतंत्र एकदम अनुपस्थित हो, ऐसे समाज में मनु की बहाली सिर्फ सदियों पुरानी कीचड़ और काई को लहलहाने तक नहीं रुकेगी; यह हाल की डेढ़-दो सदी में चले सामाजिक सुधार आंदोलनों की हासिल कमाई को भी हड़प लेगी।

भारतीय दर्शन के इतिहास में एक कहानी है। जनक के दरबार में शास्त्रार्थ चल रहा था। एक तरफ पुनर्जन्म और कर्मफल के सिद्धांत, नारी की हीनता और ब्राह्मणवाद की श्रेष्ठता के प्रतिपादक याज्ञवल्क्य थे, दूसरी तरफ याज्ञवल्क्य के गुरु की पत्नी की भतीजी और इन सब धारणाओं की मुखर विरोधी गार्गी थी। दो दिन तक चले शास्त्रार्थ में, जब याज्ञवल्क्य हारने को हुआ और निरुत्तर हो गया, तो वह चिल्लाकर बोला, “गार्गी, अब अगला सवाल मत करना, वरना तेरा सिर धड़ से गिर जाएगा।” गार्गी ने जवाब दिया, “याज्ञवल्क्य, तेरी भाषा एक विद्वान की नहीं, ऐसा तो उग्र लोहितपाणी-खून से हाथ रंगने वाला-ही बोल सकता है।”

गार्गी को बोलने से रोक दिया गया। याज्ञवल्क्य को विजयी घोषित किया गया। इनाम में हजारों सुंदर दासियाँ, अनगिनत सोने की अशर्फियाँ, हजारों गायें मिलीं। इस अपमान से आहत गार्गी का अपनी बुआ लोपा के साथ संवाद दिलचस्प है। राहुल सांकृत्यायन इसे वोल्गा से गंगा में दर्ज करते हैं।

लोपा कहती हैं, “तू बच्ची है, गार्गी। तू जानती है कि यह ब्राह्मणवाद मन की उड़ान है, मन की कलाबाजी है। इसके पीछे राजाओं और ब्राह्मणों का बहुत बड़ा स्वार्थ छिपा है। यह राजसत्ता और ब्राह्मणसत्ता को दृढ़ करने का भारी साधन है। बहुत से लोग इस बात को नहीं समझते। राजा जनक भी नहीं समझता होगा, मैं भी नहीं समझती थी, पर मेरा पति प्रवाहण समझता था, और याज्ञवल्क्य, जो उसका पक्का चेला है, एकदम समझता है। जनता की गाढ़ी कमाई को मुफ्त में खाने का तरीका है यह राजवाद, ब्राह्मणवाद, यज्ञवाद। प्रजा को कोई इस जाल से तब तक नहीं बचा सकता, जब तक वह खुद सचेत न हो, और उसे सचेत होने देना इन स्वार्थियों को पसंद नहीं। क्या मानव हृदय हमें इस वंचना से घृणा करने की प्रेरणा नहीं देगा? बेटी, मुझे एकमात्र उसी की आशा है।” लोपा को एकमात्र आशा मानव हृदय से थी। मनुजायों का कुनबा इसीलिए समाज को हृदयहीन बनाने की महापरियोजना लेकर आया है।

राधिका की निर्मम हत्या के बाद सोशल मीडिया पर किया जा रहा कपालिक नृत्य इसी परियोजना का हिस्सा है। यही बिना किसी प्रमाण या आधार के राधिका को लांछित करने वाले उन कुंठित कापुरुषों में दिखता है, जो हत्यारे पिता के लिए ‘सैल्यूट दीपक यादव’ की मुहिम छेड़े हुए हैं। उनके द्वारा टेनिस पर खर्च की गई ढाई करोड़ की कथित रकम और स्कूल की पढ़ाई के लिए चुकाई गई फीस की दुहाई देकर दावा कर रहे हैं कि जिस पिता ने उसे उड़ान के लिए पंख दिए, उसी को गालियाँ दी जा रही हैं। इनमें से कई तो इस बात के लिए भी हत्यारे की स्तुति गा रहे हैं कि उसने बजाय पीठ पर मारने के, सीधे सीने पर गोलियाँ दागीं।

कहने की जरूरत नहीं कि हत्यारे की प्रशंसा में हुआं-हुआं करते ये शाखा-शृगाल किस सोच से इतनी नफरत और विषाक्तता लेकर आए हैं। ये वही भाषा बोल रहे हैं, जो कोई दो हजार साल पहले मनु ने बोली थी-वही हिदायतें दे रहे हैं, जो मनुजाये देते रहते हैं। ऐसी ऑनर किलिंग्स को धर्मोचित बताने वाले ये बर्बर माँग कर रहे हैं कि लड़कियों की शादी के लिए शास्त्रसम्मत नियम-विधान-नॉर्म्स-तय किए जाएँ और उन्हें सख्ती से लागू किया जाए। कल्पना ही की जा सकती है कि इनके अपने घर की स्त्रियाँ-इनकी माँ, पत्नी, बहन और बेटियाँ-किस तरह का जीवन जीने के लिए अभिशप्त होंगी।

ऊपर लिखी कथा में, जब याज्ञवल्क्य ने गार्गी को मार डालने की धमकी देकर चुप कराया था, तब जनक खामोश था। आज जनक और याज्ञवल्क्य एकमेक हो गए हैं। गार्गी को जबरन खामोश किए जाने के साथ आधी आबादी की बाड़ाबंदी और मौन की शुरुआत हुई थी, जिसने न जाने कितनी लोपा, अपाला और मैत्रेयियों को अंधेरे में धकेल दिया, कितनी राधिकाएँ मार डाली गईं।

इस बाड़े और मौन को तोड़ना है, तो गार्गियों को जोखिम उठाना ही होगा-वे उठा भी रही हैं। अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर भी उतर रही हैं, जान का जोखिम भी उठा रही हैं। मगर यह सिर्फ गार्गियों और राधिकाओं तक की बात नहीं है। जो भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज और मानवीय दुनिया चाहते हैं, उन्हें भी बोलना होगा। जनक या उसका दरबारी बनने की बजाय, गार्गी से लेकर राधिका तक को चुप कर देने के खिलाफ बोलना होगा।

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं)

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