जहाँ एक तरफ संसद से लेकर ‘वोट चोरी ‘ के नारों के साथ विपक्ष चुनाव आयोग और बीजेपी को घेर रहा है वहीं बिहार में एसआईआर के सहारे उसी वोट चोरी की कथित कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। बिहार को लेकर बिहारी विपक्ष तो सरकार और चुनाव आयोग को घेर ही रहा है ,सभी केन्दीय विपक्षी पार्टियां भी एसआईआर के खेल पर अचम्भित हैं और भयभीत भी। अब जिस अंदाज अंदाज में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को एसआईआर के तहत हटाए गए 65 लाख से ज्यादा लोगों की जानकारी देने की मनाही की है इसके मायने तो बहुत कुछ निकाले जा सकते हैं लेकिन सीधे शब्दों में यही कहा जा सकता है कि मौजूदा चुनाव आयोग किसी भी सूरत में सुप्रीम कोर्ट के सामने झुकने को तैयार नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि चुनाव आयोग ने खुद को सुप्रीम कोर्ट से भी बड़ा कर लिया है। और ऐसा है तो यह मान लेना चाहिए कि चुनाव आयोग जो भी करता दिख रहा है उसके परिणाम चाहे जो भी हों लेकिन बीजेपी पूरी तरह से चुनाव आयोग के साथ खड़ी है और साथ में जदयू भी चुनाव आयोग को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। बिहार एसआईआर पर हम और भी कई जानकारी साझा कर सकते हैं लेकिन पहले मंदिर की कहानी को बढ़ाने की जरूरत है। जिस मंदिर ने यूपी में बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने में महती भूमिका निभाई है अब उसी भूमिका की पटकथा बिहार में शुरू हो गई है। यह कहानी उत्तर बिहार के सीतामढ़ी में सीता माता या जानकी माता की मंदिर को लेकर है।
अभी दो दिन पहले ही अमित शाह सीतामढ़ी पहुँच गए और माता जानकी के भव्य मंदिर का शिलन्यास किया। शिलान्यास के समय भक्त जनों की भीड़ उमड़ी थी। बीजेपी वाले गला फाड़ नारे लगा रहे थे। पूरा का पूरा मिथिलांचल इलाका उमड़ा पड़ा था। लोगों की जुबान पर एक ही बात थी अयोध्या के बाद अब सीतामढ़ी। राम के बाद अब माता सीता का उद्धार। अमित शाह पुलकित थे।
शिलान्यास के समय सीएम नीतीश कुमार भी सम्राट चौधरी के साथ पूजन स्थल पर पहुंचे। वे भी खुश थे लेकिन मौन ही रहे। कहने को वे पूजा पाठ से तो दूर रहे लेकिन चन्दन ,टीका और कई धार्मिक पहलुओं से खुद को बचाते हुए अपने लोगों से जो बातें कह रहे थे उसका लब्बोलुबाव यही था कि देखो इस बार तो सीता मैया को भी हमलोग विश्व पटल पर कर रहे हैं। पहले अयोध्या को किया गया और अब सीतामढ़ी की बारी है।
नीतीश सेक्युलर समाज से आते हैं इसमें कोई शक नहीं है। चूँकि जदयू को सत्ता में बने रहना है इसलिए उसकी जीत जरुरी है। नीतीश भी जानते हैं कि जदयू के हाथ से सत्ता अगर चली गई तो पार्टी नहीं बचेगी। यह टूट जाएगी। पार्टी के अधिकतर लोग बीजेपी के साथ चले जायेंगे और जो नहीं जायेंगे वे राजद और कांग्रेस से सातरः हो लेंगे। यही सब सोच कर नीतीश कुमार अब धर्म का सहारा लेने से भी नहीं चूक रहे हैं। वे जानते हैं कि उनका इतिहास अब स्वर्णिम नहीं रहेगा। वे यह भी जानते हैं कि बिहार के लिए उन्होंने जो भी किया है उससे ज्यादा बिहार को रसातल में भी मिलाया है। बीजेपी के साथ जाकर उन्होंने न सिर्फ समाजवाद को मलिन किया है बल्कि अपमानित भी किया है। और वे यह भी जानते हैं कि इस बार एसआईआर और धार्मिक खेल के जरिये बीजेपी के साथ मिलकर वे जो कर रहे हैं वह कहीं से भी उनके चरित्र के अनुरूप नहीं है। लेकिन चूँकि सत्ता पाने की राजनीति अगर कुरूप ही होती है तो इससे कैसे अलग हुआ जा सकता है?
तो सीतामढ़ी में माता जानकी का भव्य मंदिर बनने जा रहा है। सीतामढ़ी के पुनौरा धाम स्थित माता जानकी मंदिर का पुनरुद्धार और जीर्णोद्धार, जिसका उद्देश्य अयोध्या के राम मंदिर के आकार और भव्यता को दोहराना है, एनडीए के प्रमुख चुनावी मुद्दों में से एक होगा। यह बीजेपी का प्रमुख मुद्दा तो है ही अब जदयू का भी एक बड़ा मुद्दा है। बीजेपी से ज्यादा जदयू के लोग मिथिलांचल इलाके में इसका अलख जगा रहे हैं। मोदी के नारे के साथ ही नीतीश के भी नारे लग रहे हैं। नारे की आवाज से जदयू के कुछ वोटर चकित हैं और मुसलमान भयभीत हैं। फिर भी नीतीश को लग रहा है कि उनके विकास के कामो में अगर धर्म का जोड़ भी हो जाए तो संभव है सत्ता की कुर्सी मिल जाए।
पुनौरा धाम स्थित सीता मंदिर का प्रस्तावित पुनरुद्धार और जीर्णोद्धार तीन महीने बाद होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ एनडीए के प्रमुख मुद्दों में से एक होगा। शाह ने इस साल मार्च में अहमदाबाद में आयोजित “शाश्वत मिथिला महोत्सव 2025” कार्यक्रम में इस परियोजना की घोषणा की थी।
अयोध्या के राम मंदिर के पैमाने और भव्यता का अनुकरण करने वाली इस परियोजना को पहली बार सितंबर 2023 में धार्मिक पर्यटन के विकास हेतु एक बड़ी परियोजना के साथ मंज़ूरी दी गई थी। उस समय, जद(यू) और राजद राज्य में सत्तारूढ़ महागठबंधन का हिस्सा थे।
जनवरी 2024 में जदयू फिर से एनडीए में शामिल हो गई, जो एक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले बुनियादी ढाँचे और धार्मिक पर्यटन परियोजनाओं पर ज़ोरदार ज़ोर देने के साथ मेल खाता है।
सीतामढ़ी के लिए नीतीश सरकार की योजना पहले से लागू है, हालाँकि यह रामायण सर्किट पर केंद्र की 15 पर्यटन-सह-धार्मिक स्थलों की सूची में शामिल है, जो केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की स्वदेश दर्शन योजना के तहत विकास के लिए चिन्हित 15 विषयगत सर्किटों में से एक है। इस योजना के तहत परियोजनाओं की पहचान राज्य सरकारों या केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के परामर्श से की जाती है।
बिहार सरकार की योजना में एक परिक्रमा पथ (मंदिर की परिक्रमा करने का मार्ग) बनाना शामिल है, जिसकी छत और बलुआ पत्थर के स्तंभ होंगे। एक कैफेटेरिया और पार्किंग स्थल के अलावा, सीता वाटिका (सीता का उद्यान), लव-कुश वाटिका (लव-कुश उद्यान) और एक शांति मंडप (ध्यान करने का स्थान) बनाने की भी योजना बनाई जा रही है। सीता के जीवन पर आधारित एक 3-डी एनीमेशन फिल्म भी बनाई जा रही है।
इस योजना के एक हिस्से के रूप में, जिसे 11 महीनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य है, राज्य का पर्यटन विभाग भगवान राम और सीता से जुड़े माने जाने वाले कम से कम एक दर्जन स्थलों के पुनर्विकास पर भी काम कर रहा है।इस वर्ष 1 जुलाई को, नीतीश मंत्रिमंडल ने इस परियोजना के लिए 882.87 करोड़ रुपये स्वीकृत किए। इसमें से 137 करोड़ रुपये मौजूदा मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र के जीर्णोद्धार के लिए, 728 करोड़ रुपये पर्यटन संबंधी बुनियादी ढाँचे के लिए और 16 करोड़ रुपये एक दशक तक व्यापक रखरखाव के लिए आवंटित किए गए हैं। इसी 29 जुलाई को हुई एक अन्य कैबिनेट बैठक में, मंदिर परिसर में वर्तमान में उपलब्ध 17 एकड़ भूमि के अलावा, अतिरिक्त 50 एकड़ भूमि के अधिग्रहण के लिए 165.57 करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान को भी मंजूरी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि नई भूमि का उपयोग पर्यटन संबंधी बुनियादी ढाँचे और संबंधित सुविधाओं के विकास के लिए किया जाएगा।
अब बड़ा सवाल तो यही है कि क्या बिहार चुनाव में इसका क्या असर होगा? बता दें कि उत्तर बिहार के अधिकतर लोग अभी मोदी के पांच सेर अनाज के चंगुल में फंसे हुए हैं। इसके साथ दो हजार की नकदी और फिर नीतीश सरकार द्वारा दिए जा रहे कुछ नकदी लाभ से लेकर नौकरियों के ऐलान से उत्तर बिहार के लोग पूरी तरह से मोदी -नीतीश के जाल में फंसे हुए हैं। फिर उत्तर बिहार के लोग माता जानकी के प्रति समर्पित भी हैं।
खासकर मिथिलांचल और तिरहुत प्रमंडल के लोग जो पिछले कई सालों से बीजेपी को वोट डालते आ रहे हैं वे अब और भी बीजेपी और जदयू के प्रति श्रद्धा भाव रख सकते हैं। अजर इसी श्रद्धा भाव का लाभ बीजेपी और जदयू को लाभ पहुंचा सकता है। अब यह लाभ कितना मिलेगा इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन एक बात साफ़ हो गया है कि नीतीश के साथ जो मुस्लिम वोट जुड़े हुए थे अब शायद नहीं रह सकेंगे। ऐसे में माता सीता के मंदिर का लाभ बीजेपी ज्यादा उठा सकती है और ऐसा हुआ तो जदयू को कोई बड़ा लाभ नहीं मिल सकेगा।
नीतीश कुमार वैसे भी अभी बिहार में ज्यादा बदनामी झेल रहे हैं। जनता के मुद्दों पर हमेशा मुखर रहने वाले जदयू के लोग जिस तरह से एसआईआर के मुद्दों पर बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव आयोग के सहभागी बने हुए हैं उसका खामियाजा बीजेपी से ज्यादा जदयू को हो सकता है। बिहार के लोगों में एक बात घर कर गई है कि बिहार में जो भी चुनाव आयोग कर रहा है उसमे जदयू की बड़ी भूमिका है और यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि किसी भी तरह सत्ता तक पहुंची जाए।
एसआईआर के तहत जिस तरह के आंकड़े बिहार के कई जिलों से मिल रहे हैं वे चौंका रहे हैं बल्कि भ्रमित भी कर रहे हैं। बिहार के जमुई के एक ही मकान में 247 वोटर पंजीकृत किये गए हैं। यानी की इस बूथ के 40 फीसदी लोग एक ही घर के पते पर पंजीकृत हैं। उधर मुजफ्फरपुर के भगवानपुर विधान सभा के बूथ नंबर 370 के मकान नंबर 27 में 629 लोग पंजीकृत पाए गए हैं। एक और मकान में 250 लोग पंजीकृत हैं तो एक दूसरे मकान में 269 लोग पंजीकृत हैं। बड़ी बात तो यह है कि इन मकानों में सभी धर्म और जाति के लोग है। कह सकते हैं कि ये घर देश के सबसे बड़े सेक्युलर घर के रूप में पहचाने जा सकते हैं।
इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य ये हैं कि हालिया एसआईआर में 2 लाख 92 हजार वोटरों के घर का पता शून्य ,डबल शून्य और ट्रिपल शून्य के रूप में निरूपित किया गया है। इन शून्य वाले एक घर में दर्जनों लोगों के पटे दर्ज हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठ रहा है कि बानगी के तौर पर जिस बात की जानकारी राहुल गाँधी कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा में हुई गड़बड़ी की दे रहे हैं ,वैसा ही खेल बिहार में होता दिख रहा है। ऐसे में इस बात की पूरी आशंका है कि यह चुनाव आयोग और बीजेपी की मिलीभगत से एक ऐसा पैटर्न खड़ा किया गया है जिसमे बीजेपी कभी चुनाव हार ही नहीं सकती। ऊपर से सब कुछ साफ़ दिखता हो और नीचे से सब कुछ खोखला। ऐसे में विपक्ष चाहे जो भी कर ले कभी चुनाव जीत ही नहीं सकता।
ऐसे में बिहार में भले ही नीतीश कुमार मंडल की जगह कमंडल के सहारे जीत की गुंजाइश देख रहे हैं लेकिन इसका लाभ जदयू को कितना मिलेगा यह कहना कठिन है। और बीजेपी जदयू की जीत हो भी जाती है तो फिर नीतीश को फिर से सत्ता मिलना कठिन है। उनकी आगे की राजनीति असंभव है। बिहारी समाज भले ही अभी मौन है लेकिन युवाओं के मन में अगर विपक्ष की बाते घर कर गई और चुनाव आयोग का खेल समझ में आ गयी तो बिहार में बड़े बदलाव को कोई रोक भी नहीं सकता।
समाजवादी राजनीति से लंबे समय से जुड़े होने के कारण, बिहार चुनावों में हिंदुत्व निर्णायक कारक नहीं रहा है। 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, भाजपा का प्रदर्शन लगातार खराब रहा। 1995 के विधानसभा चुनावों में, पार्टी 324 (अविभाजित बिहार) में से केवल 41 सीटें ही जीत पाई थी। भाजपा अकेले चुनाव लड़ने पर भी चुनावी दबदबा नहीं बना पाई है। 2015 के चुनावों में, नरेंद्र मोदी लहर के बावजूद, पार्टी 243 में से केवल 91 सीटें ही जीत पाई थी।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)