रेप कल्चर के खिलाफ हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक पहल

सुबह से रेप की खबरें देखने को मिली हैं एक चित्रकूट में नीट छात्रा के साथ गैंगरेप की और दूसरी छत्तीसगढ के रायगढ़ और बिहार के नवादा में आठ साल की छोटी सी बच्ची के साथ रेप की। इन खबरों को देखने-सुनने पर कोई भी संवेदनशील इंसान दिमाग बुरी तरह हिल जाता है। पर ये खबरें या घटनाएं न तो पहली है न ही आखिरी। 

बलात्कार भारत में महिलाओं के खिलाफ चौथा सबसे आम अपराध है। महिलाओं के खिलाफ लैंगिक हिंसा की बात करें तो इसके जड़ में सेक्स कुंठा के अलावा पितृसत्तात्मक सोच भी है। जहां एक बेकार, आवारा पुरुष खुद को उस महिला से ऊपर रख पाता है जो पढ़ाई-लिखाई या काबिल होने की परिभाषा को पूरा करती है। एक मजबूत महिला को लैंगिक हमले से कमजोर साबित करने का सुख पाना भी इस अपराध की जड़ में निहित है।

एक रिपोर्ट की माने तो भारत में प्रतिदिन 87 से ज्यादा मामले रेप के आते हैं और 95% से ज्यादा लोग पहचान वाले होते हैं। इनमें पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार या सहकर्मी होते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 29,000 से 32,000 के बीच बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं।  

सजा की बात करें तो भारत में रेप को लेकर कठोर सजा की बात आती है। पर एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, मुकदमों के परिणाम में दोषसिद्धि दर करीब 27% से 28% दर्ज की गई है। अर्थात दोषसिद्धि व सजा भी बहुत कम दोषियों को ही हो पाती है। और अगर दोषी समाज में रसूख रखता हो तो गिरफ्तारी तक भी नहीं होती है। 

हालांकि कई मामलों में दोषियों की त्वरित गिरफ्तारी भी की गई है। बाक़ी के अपराध की तरह इसके लिए भी दोषियों को कड़ाई से सजा दिलाने की जरूरत है। पर, यहां कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि सजा मिलने के बाद या जेल से बेल पर रिहाई के बाद भी रेप के दोषी दुबारा भी उस महिला को परेशान करते हैं बजाय डरने के। 

यहां यह बात स्पष्ट होती है कि महिलाओं के साथ रेप बाक़ी अपराध से अलग प्रकृति रखता है। यह अपराध एक बीमार दिमाग को खुद को पीड़िता से ऊपर दिखाने और सेक्स कुण्ठा की परिणति है। जब तक महिला को एक प्रोडक्ट के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहेगा, ऐसी घटनाएं नहीं रुक सकतीं क्योंकि इन घटनाओं का सीधा संबंध सोच से है। घर-समाज में महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी नजरिया अपनाया जाता है।

फिल्म, विज्ञापन में महिलाओं के एक वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना, इन घटनाओं को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाता है। और वर्तमान में तो रोजगार और शिक्षा का जो बुरा हाल है उससे कोई भी अपराध बढ़ेगा ही। 

वर्तमान सरकार ने तो रील बनाने को ही रोजगार बता दिया है, और इस रील इन्डस्ट्री में अनगिनत वीडियो मिल जाएँगे जिसमें बिना वजह शरीर को एक उत्पाद के रूप में रखा जाता है, कारण है कि रील बनाने वाले को लगता है कि व्यूज बढ़ाने और पैसे कमाने का यह सबसे आसान उपाय है।

शिक्षा, रोजगार और किसी भी तरह की के सकारात्मक, रचनात्मक कार्यो से दूर इंसान कुण्ठा का शिकार होता है, और इन चीजों में अपनी खुशी, अपनी जीत पाने लगता है। कोई दो राय नहीं कि ये सब भी यौन कुण्ठा पैदा करने और रेप जैसे अपराध को बढ़ाने में मदद करते हैं।

समाज में दोषियों को फांसी देने की माँग भी उठती है।

पर इसके भी दो पक्ष हैं- पहला कि अगर दोषियों को सजा होने मात्र से यह अपराध रूकता तो ऐसे केस में सजा होने पर इसमें कमी देखी जाती। पर ऐसा देखने को नहीं मिलता है। 

दूसरा पक्ष यह है कि रेप के मामले में कई रसूखदार नेता, मंत्री,अफसर,धार्मिक बाबा भी शामिल रहते हैं तो ऐसे में ये लोग अपना कुकर्म किसी बेकसूर के मत्थे मढ़कर उसे फांसी में चढ़ा देंगे। बेकसूर होकर किसी भी तरह का सजा झेलना बुरा है। पर जीवन ही खत्म कर दिया जाना? एक सभ्य समाज में फांसी की सजा होनी ही नहीं चाहिए। 

महिला के खिलाफ इस अपराध को खत्म करने के लिए कड़े कानून, तत्काल मदद, दोषियों की गिरफ्तारी,त्वरित न्याय के अलावा सबसे ज्यादा जरूरी है महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी,पितृसत्तात्मक सोच को खत्म करने की। महिलाओं के साथ हुए किसी हिंसा में महिला को ही जवाबदेह साबित करने पर रोक की। महिलाओं को उपभोग की वस्तु, एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत करने पर रोक लगाने की। 

शुरुआत हम अपने घर से कर सकते हैं, बच्चों को बचपन से ही एक इंसान की दैहिक स्वतंत्रता की बात को समझने को तैयार किया जाना भी जरूरी है। इंसान की पसंद-नापसंद, इच्छा-अनिच्छा की कद्र करने की आदत हमें उनमें शुरुआत से ही डालनी होगी। समाज में उचित रोजगार, सृजन व रचनात्मकता भी इस अपराध को खत्म करने में मददगार होगा।

कहने का अर्थ है सजा के डर के अलावा हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक पहल इस अपराध की मानसिकता के जड़ को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाएगी और हमारे देश समाज से ऐसी विकृति, ऐसे अपराध खत्म हो सकते हैं।

(चित्र प्रतीकात्मक। कैग से साभार)

(ईप्सा शताक्षी स्वतंत्र लेखक हैं।)

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