Sunday, December 4, 2022

सुप्रीम कोर्ट से जकिया जाफरी की याचिका खारिज होने के बाद एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ और पूर्व डीजीपी श्रीकुमार गिरफ्तार

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गुजरात दंगों पर नियंत्रण करने में प्रशासनिक लापरवाही की दोषी गुजरात पुलिस ने उच्चतम न्यायालय द्वारा जकिया जाफरी की याचिका ख़ारिज किये जाने के एक दिन बाद ही अदालती आदेश का सहारा लेकर तीस्ता सीतलवाड़ को हिरासत में लेकर अपनी फुर्ती दिखा दी। सामाजिक कार्यकर्ता सीतलवाड़ को मुंबई में गुजरात एटीएस (ने हिरासत में ले लिया है। उन पर कार्रवाई करने के लिए गुजरात एटीएस की टीम मुंबई आई थी।अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने शनिवार को ही तीस्ता सीतलवाड़, पूर्व पुलिस अधिकारी आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट व अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। सीतलवाड़ ने अपनी ओर से मुंबई के सांताक्रुज पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई और दावा किया कि “गिरफ्तारी” अवैध थी और उन्होंने अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताई। उन्हें अहमदाबाद ले जाया गया है। इस बीच, गुजरात के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

सीतलवाड़ के खिलाफ यह कार्रवाई ऐसे वक्त की गई है, जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों (Gujarat Riots 2002) से जुड़ी जकिया जाफरी की याचिका खारिज की है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद आया है, जिसमें गुजरात दंगों के मामले में सवाल उठाते हुए कहा गया है कि कुछ लोग कड़ाही को लगातार खौलाते रहना चाहते हैं। इसे तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ के संदर्भ में माना जा रहा है, जो दंगों की पीड़ितों के साथ लंबे समय से काम कर रही हैं।

इसके पहले दिन में दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट में उन पर और पूर्व आईपीएस अधिकारियों आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट पर 2002 के गुजरात दंगों के मामलों में “निर्दोष” लोगों को झूठा फंसाने के लिए जालसाजी और आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया है ।

अहमदाबाद अपराध शाखा के निरीक्षक डीबी बराड द्वारा की गयी शिकायत में कहा गया है कि इस मामले में मिली सामग्री और अन्य सामग्रियों के संदर्भ में, साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार कार्रवाई की गई है। इस मामले में पर्दे के पीछे रची गई आपराधिक साजिश और वित्तीय और अन्य लाभ, अन्य व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों की मिलीभगत से विभिन्न गंभीर अपराधों के लिए उकसाने का पता लगाने के लिए एफआईआर दर्ज की जाए। जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, उनमें 468 आईपीसी – धोखाधड़ी के लिए के लिए जाली कागजातों का इस्तेमाल करना, 471 आईपीसी – जानबूझकर जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रानिक रिकॉर्ड गढ़कर असली के तौर पर इस्तेमाल करना, 194 आईपीसी – मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के आशय से झूठे सबूत देना या गढ़ना,211 आईपीसी -नुकसान करने के लिए झूठा आरोप लगाना, 218 आईपीसी- लोक सेवक होते हुए रिकॉर्ड की गलत रचना करना जिससे किसी व्यक्ति का नुकसान हो सके तथा 120बी आईपीसी – आपराधिक साजिश रचना शामिल है।

सीतलवाड़ उस केस की सह याचिकाकर्ता हैं, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मामले में मिली क्लीनचिट को चुनौती दी गई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका खारिज कर दी गई है। कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी, जो दंगों में मार दिए गए थे, उनकी विधवा जकिया जाफरी इसमें मुख्य याचिकाकर्ता थीं। गुजरात एटीएस ने तीस्ता को हिरासत में लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है। शुक्रवार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जाकिया जाफरी व अन्य पर पर सवाल उठाए थे । 514 पेजों में याचिका के नाम पर जाकिया परोक्ष रूप से विचाराधीन मामलों में अदालतों के फैसलों पर भी सवाल उठा रही थीं।

पीएम मोदी (2002 दंगों के वक्त गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री) को कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी की ओर से क्लीनचिट दी गई थी, जिसे कोर्ट ने बरकरार रखा है । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला “मेरिट से अलग” था और जाहिर है, गलत इरादों के तहत दायर किया गया था। न्यायाधीशों ने कहा कि प्रक्रिया के इस तरह के दुरुपयोग में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए और कानून के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए ।

सीतलवाड़ के एनजीओ ने जकिया जाफरी का समर्थन किया था, जिन्होंने अपनी कानूनी लड़ाई के दौरान दंगों के पीछे एक बड़ी साजिश का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी। जाफरी के पति और कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी दंगों के दौरान मारे गए थे। सीतलवाड़ की शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गुजरात पुलिस उनके परिसर में जबरन घुस आयी, उनके साथ “जबरदस्ती” की, उन्हें उनके खिलाफ प्राथमिकी या वारंट की प्रति नहीं दिखाई और उनके बाएं हाथ पर “बड़ा घाव” था। उनकी शिकायत में कहा गया है कि मुझे अपने जीवन के लिए गंभीरता से डर है ।

2002 के दंगों की जांच फिर से शुरू करने के प्रयास पर से पर्दा हटाते हुए, जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने शुक्रवार को बर्तन को उबालने के लिए कुटिल चाल की भी बात की, जाहिर है, उल्टे डिजाइन के लिए, और असंतुष्ट अधिकारियों ने कहा कि झूठे खुलासे कर सनसनी पैदा करने के लिए गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा होना चाहिए और कानून के मुताबिक आगे बढ़ना चाहिए।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने कई लोगों को प्रताड़ित करने के इरादे से निर्दोष लोगों के खिलाफ झूठी और दुर्भावनापूर्ण आपराधिक कार्यवाही शुरू की।यह दंगों के मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) के समक्ष किए गए विभिन्न प्रस्तुतीकरणों और न्यायमूर्ति नानावती-शाह जांच आयोग के समक्ष अभियुक्तों द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्तुतीकरण पर आधारित है। शिकायत के अनुसार सीतलवाड़ ने मनगढ़ंत, जाली, गढ़े हुए तथ्य और दस्तावेज और/या उन लोगों द्वारा दस्तावेजों के निर्माण सहित साक्ष्य गढ़ा, जो शिकायतकर्ता (जकिया) के सुरक्षात्मक गवाह थे।

सीतलवाड़ पर गवाहों को प्रभावित करने और उन्हें पढ़ाने और उन्हें पहले से टाइप किए गए हलफनामों पर हस्ताक्षर करने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि जकिया जाफरी को भी सीतलवाड़ ने पट्टी पढ़ायी थी, जैसा कि 22 अगस्त 2003 को नानावती आयोग के समक्ष उनके बयान से स्पष्ट है।

शिकायत में कहा गया है कि आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और आरबी श्रीकुमार ने नानावटी जांच आयोग के समक्ष कई बयान दिए थे जो गुजरात सरकार के खिलाफ थे। भट्ट ने कथित तौर पर एसआईटी को भेजे गए विभिन्न दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया और यह भी झूठा दावा किया कि वह 27 फरवरी, 2002 को तत्कालीन मुख्यमंत्री (मोदी) द्वारा अपने आवास पर बुलाई गई बैठक में शामिल हुए थे।

भट्ट फिलहाल एक अन्य मामले में जेल में बंद हैं। शिकायत में कहा गया है कि एसआईटी द्वारा की गई जांच ने निर्णायक रूप से स्थापित किया कि भट्ट उक्त बैठक में मौजूद नहीं थे, और उन्होंने घटना के नौ साल बाद विभिन्न व्यक्तियों को कानून की गंभीर धाराओं में फंसाने के लिए उपरोक्त दावे किए थे।

इसमें कहा गया है कि नानावती-शाह आयोग के समक्ष श्रीकुमार के नौ हलफनामे जकिया जाफरी की याचिका में अधिकांश आरोपों का स्रोत थे। दंगों के समय वह सशस्त्र इकाई के अतिरिक्त डीजीपी थे, लेकिन एसआईटी के समक्ष उनके बयान से पता चला कि तथ्यों की उनकी जानकारी 9 अप्रैल, 2002 को एडीजी (खुफिया) के रूप में तैनात होने के बाद हासिल की गई थी। उन्होंने शुरुआती दो हलफनामों में सरकार के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया, केवल तीसरे हलफनामे में ऐसा किया। उन्होंने इन कृत्यों और कई अन्य लोगों को जानबूझकर कानून की गंभीर धाराओं में फंसाने के लिए किया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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