Friday, March 1, 2024

जेल आपको धीरे-धीरे अंदर से तोड़ देता है: फहाद शाह

जेल में 600 दिन बिताने के दौरान कश्मीरी पत्रकार फहाद शाह उम्मीद छोड़ चले थे कि वह कभी आज़ादी देख पाएंगे। जम्मू कश्मीर में बची चंद स्वतंत्र समाचार वेबसाइट में से एक ‘कश्मीरवाला’ के 34 वर्षीय संपादक को पिछले साल फरवरी में “आतंकवाद का महिमा मंडन करने” और “देश विरोधी सामग्री प्रकाशित करने” के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

अगले 21 महीने शाह के लिए भारी गुज़रे और उनका हाई-प्रोफाइल मामला कश्मीरी पत्रकारों की तरफ से झेली जा रही प्रताड़ना का प्रतीक बन गया। उन्हें एक मामले में जमानत मिली तो बिना समय गंवाये, दूसरे मामले में गिरफ्तार कर लिया गया और नये व संगीन आरोप लगाये गये।

हालांकि धीरे-धीरे उनके खिलाफ आरोप निरस्त होने लगे और चार में से तीन मामलों में जमानत मिल चुकी थी पर अदालतों से राहत उन्हें पिछले महीने जाकर मिली जब अदालतों ने पाया कि आतंकवाद के आरोपों के संबंध में प्रमाण अपर्याप्त थे। 23 नवंबर को ताजा जमानती आदेश के बाद वह कश्मीर के कोट भलवाल जेल से बाहर निकल सके।

राहत और परिवार के बीच वापसी की खुशी से भरे शाह जब श्रीनगर में अपने घर में बैठे बात कर रहे थे तो कमज़ोर, थके हुए लग रहे थे और कंबल ओढ़े थे। वह धीमी आवाज़ में बता रहे थे कि उन्होंने क्या झेला है। इस दौरान उन्होंने कहा कि वह मामलों के बारे में बात करने को स्वतंत्र नहीं हैं। 

वह कहते हैं, “जेल धीरे-धीरे अंदर से आपको तोड़ देता है।” सलाखों के पीछे रहने के दौरान शाह को विभिन्न जेलों में स्थानांतरित किया जाता रहा और महीनों तक पूछताछ की जाती रही।

उन्होंने कहा, “आप शारीरिक और मानसिक रूप से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। आप ऐसे बिंदु पर पहुंचते हैं जहां आप टूट चुके होते हैं और जेल में बने आपके नये व्यक्तित्व को स्वीकार करने लगते हैं।”

एक बार 20 दिनों तक उन्हें छह बाई छह फीट की कोठरी में रखा गया जहां बाहरी दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं था। कठोर परिस्थितियों ने उन्हें बीमार कर दिया और वह हैल्यूसीनेट करने लगे। उन्होंने बताया, “मुझे पता नहीं था कि चल क्या रहा है। इस पूरे वक्फे में वह सबसे बुरा समय था।”

शाह की गिरफ्तारी के पहले, उनकी वेबसाइट ‘कश्मीरवाला’ क्षेत्र के चंद समाचार समूहों में से थी जो स्वतंत्र मीडिया पर हमलों के बीच आलोचनात्मक खबरें व मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की खोजी रिपोर्ट प्रकाशित कर रही थी। शाह कभी कभार गार्जियन में भी लिखते थे।

अगस्त 2019, जब केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने कश्मीर से राज्य का दर्जा छीन लिया और उसे सीधे सरकार के नियंत्रण में लिया, के बाद महीनों तक इंटरनेट व संप्रेषण बंदी लागू की गई और स्वतंत्र पत्रकारिता को योजनाबद्ध ढंग से कुचलने का कार्य शुरू हुआ।

कई पत्रकारों को जेलों में ठूंसा गया अथवा मामले दर्ज किये गये, इनमें से कुछ पर संगीन आरोप लगाये गये। कई अन्य को पुलिस ने धमकाया, कई दिनों तक पूछताछ की गई और अपने स्रोत बताने के लिए मजबूर किया गया। कइयों को काली सूची में डाला गया और उनके विदेश जाने पर प्रतिबंध लगाया गया। मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कड़े नियम बनाये गये और कभी भरा रहने वाला प्रेस क्लब बंद कर दिया गया।

प्रकाशनों पर दबाव लाने के लिए स्थानीय अखबारों के राजस्व के प्रमुख स्रोत विज्ञापनों में कटौती की गई और उन्हें सरकार की आलोचना करने वाली किसी भी रिपोर्टिंग से रोक दिया गया।

कमेटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्टस के भारतीय प्रतिनिधि कुणाल मजूमदार कहते हैं कि फहाद की यंत्रणा दर्शाती है कि जम्मू कश्मीर में पत्रकारों को अपने कार्य के दौरान कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जम्मू कश्मीर के अधिकारियों को पत्रकारों का अपराधीकरण करने का यह ट्रेंड बंद करना होगा और आलोचनात्मक व असंतोष भरी आवाज़ों के प्रति सहिष्णु होना होगा।

शाह को जमानत मिलने के कुछ दिन बाद अदालत ने एक और कश्मीरी पत्रकार सजाद गुल के खिलाफ आतंकवाद के आरोप निरस्त किये जो जनवरी 2022 से जेल में हैं। उनके परिजनों ने गार्जियन को बताया कि उन्हें रिहा किया जाना बाकी है। तीन और कश्मीरी पत्रकार अब भी जेलों में हैं।

संसाधनों के मामले में जूझते हुए भी कश्मीर वाला शाह की गिरफ्तारी के बाद भी काम करती रही, हालांकि उसके पास सिर्फ छह कर्मचारी बचे थे। लेकिन सरकार ने अगस्त में बिना किसी पूर्व चेतावनी के इसकी वेबसाइट ब्लॉक कर दी और कार्यालय बंद करवा दिया।

हालांकि उनका प्रकाशन बंद हो चुका है, शाह ने कश्मीर में पत्रकार के रूप में कार्य जारी रखने का निश्चय किया है। उन्होंने जरूर जोड़ा कि दुनिया के प्रति उनका नज़रिया बदल चुका है। उन्होंने कहा, “मैं कार्य शुरू करने पर चीज़ों को अलग तरीके से देख पाऊंगा। मुझे लगता है कि जेल में बिताये समय ने मुझे एक नयी दृष्टि दी है और अब मैं चीज़ों को अलग तरीके से देख पाऊंगा।”

शाह ने बताया कि पिछले साल जून में जम्मू शहर के जेल कोट भलवल में लाये जाने के बाद आखिरकार उन्होंने जेल की सच्चाई को स्वीकार किया, जहां उन्हें किताबों और समाचार पत्रों तक पहुंच मिली और अन्य कैदियों से बातचीत करने लगे। उनके लिए यह आश्चर्यजनक ही था कि कई कैदी उन्हें पहले से जानते थे क्योंकि या तो उन्होंने शाह का कार्य देखा था या शाह ने कभी रिपोर्टर के रूप में उनका इंटरव्यू किया था।

शाह ने कहा कि वह अभी तक घर के सामान्य माहौल से एडजस्ट करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शाह कहते हैं, “जेल में मैंने योजनाएं बनाई थीं कि रिहाई के बाद क्या-क्या करूंगा। क्या भोजन खाऊंगा लेकिन वह सारी बातें अब अचानक महत्वपूर्ण नहीं रह गईं। मेरा परिवार मेरे पास है, साथी मिलने आ रहे हैं, चिंता व करुणा दर्शाते हुए। ऐसा लगता है वह इसी दिन का इंतज़ार कर रहे थे।”

(आकाश हसन की रिपोर्ट, गार्जियन से साभार।)

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