Saturday, October 16, 2021

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“घर के दो भाइयों में एक अलगवादियों का समर्थक था जबकि दूसरा भारत के साथ, सरकार ने दोनों को एक कर दिया”

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नई दिल्ली/श्रीनगर। श्रीनगर शहर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित खानयार एक इलाका है जो अपने भारत विरोधी प्रदर्शनों के लिए बदनाम है। 24सों घंटे कर्फ्यू के बीच यहां पहुंचने के लिए हमें तकरीबन आधे दर्जन से ज्यादा बैरीकेड पार करने पड़े।

जब हम एक बैरिकेड के पास पहुंचे तो मैं कुछ फोटो लेने के मकसद से कार से निकली। उसी समय पास की लेन से कुछ लोग निकले जो सूबे को पूरी तरह से बंद कर देने की शिकायत करना चाहते थे। उसी समूह में से एक बुजुर्ग ने कहा कि “यह सरकार का सबसे बड़ा विश्वासघाती कदम है।”

पैरामिलिट्री फोर्स के पुलिसकर्मियों ने हम लोगों को वहां से हटाने की कोशिश की लेकिन वह शख्स चाह रहा था कि उसको सुना जाए। उसने सुरक्षाबल के जवान की तरफ अपनी अंगुली दिखाते हुए बिल्कुल चिल्लाने के अंदाज में कहा कि “तुम लोगों ने हमें दिन में बंद कर दिया है। तुम रात में बंद कर देते हो।” जवान ने कहा कि इस जगह पर कर्फ्यू लगा हुआ है और उन्हें तुरंत वापस अपने घरों में जाना चाहिए। लेकिन बुजुर्ग उसकी बात को अनसुनी करते हुए चुनौती देने के अंदाज में बिल्कुल वहीं खड़ा रहा।

उस बिंदु पर हमें वहां से जाने का आदेश दिया गया। लेकिन अभी मैं वहां से जाती तभी एक युवक अपने छोटे से बच्चे को बांहों में लिए वहां पहुंचा और उसकी तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहने लगा कि यह भारत के खिलाफ लड़ाई लड़ने की खातिर गन उठाने के लिए तैयार है।

उसने कहा कि “यह मेरा इकलौता बेटा है। यह अभी बहुत छोटा है, लेकिन मैं इसे गन उठाने के लिए तैयार करूंगा।” वह इतना नाराज था कि इस बात का भी परवाह नहीं कर रहा था कि वह यह सब कुछ एक पुलिस की मौजूदगी में कह रहा है जो उसके बिल्कुल पास खड़ा है।

रिजवान मलिक।

मुस्लिम बहुल आबादी वाली कश्मीर की घाटी में मेरी बहुत सारे लोगों से मुलाकात हुई जिन्होंने बताया कि सुरक्षा बलों की खौफ के बीच अब वे बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं रहना चाहते हैं। यहां घुसपैठ पिछले 30 सालों से हो रही है लेकिन यहां के बाशिंदों का कहना है कि दिल्ली के तानाशाहपूर्ण आदेश ने ऐसे लोगों को बिल्कुल किनारे लगा दिया है जिन्होंने कभी भी अलगाववाद का समर्थन नहीं किया।

उनका कहना है कि यह कश्मीर और भारत दोनों के लिए बेहद बुरा होगा।

मैं जहां भी गयी वहां इसी तरह की बात हो रही थी। भय मिश्रित क्रोध था जिसमें उनकी चिंताएं भी शामिल थीं। लेकिन उसके साथ ही केंद्र सरकार की पहल का पुरजोर विरोध करने का संकल्प भी दिख रहा था।

गन लिए हजारों की तादाद में सैनिक खाली सड़कों पर पैट्रोल कर रहे हैं। जिन पर जगह-जगह बैरिकेड लगे हुए हैं। इसके साथ ही लोगों को उनके घरों में कैद कर दिया गया है।

अभी जबकि एक सप्ताह हो गए हैं सूबे के दो पूर्व मुख्यमंत्री हिरासत में हैं जबकि तीसरा जो इस समय सांसद है, उसे घर में नजरबंद कर दिया गया है। इसके अलावा व्यापारी, एक्टिविस्ट और प्रोफेसर समेत सैकड़ों की संख्या में लोगों को हिरासत में लेकर उन्हें एक अस्थाई जेल में रखा गया है।

रिजवान मलिक कहते हैं कि कश्मीर “अब जेल की तरह महसूस करता है। एक बड़ी और खुली हवा वाली जेल।”

गृहमंत्री अमित शाह द्वारा सोमवार को कश्मीर के लिए प्लान की घोषणा करने के 48 घंटे के भीतर वह दिल्ली से उड़ान भर कर श्रीनगर पहुंचा।

मलिक दिल्ली से श्रीनगर इसलिए गया क्योंकि दो दिनों तक वह अपने माता-पिता तक फोन के जरिये नहीं पहुंच सका था।

उसने बताया कि आखिरी बार उसकी अपने माता-पिता से रविवार की रात को बात हुई थी। यानी कुछ घंटे पहले जब सरकार ने इंटरनेट समेत संचार के सभी साधनों को बंद करने का फैसला लिया। वहां सूचना के मामले में बिल्कुल ब्लैकआउट की स्थिति है। और चूंकि वह अपने किसी मित्र या फिर रिश्तेदार से भी संपर्क नहीं कर सकता था इसलिए उसने तत्काल श्रीनगर लौटने का फैसला किया।

सुरक्षाकर्मी।

श्रीनगर स्थित अपने माता-पिता के घर पर उसने मुझसे बताया कि “यह मेरे जीवन में पहली बार है जब किसी से संपर्क करने का मेरे पास कोई रास्ता नहीं है। हमने इसके पहले ऐसी हालत कभी नहीं देखी थी।”

राज्य के लोगों से बगैर संपर्क किए भारत द्वारा कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने के फैसले से मलिक बेहद नाराज है।

वह उन लोगों में शामिल नहीं है जो अलगाववाद में विश्वास करते हैं या फिर कभी बाहर गए हों और विरोध प्रदर्शन में सैनिकों पर पत्थरबाजी किए हों। वह 25 साल का एक महत्वाकांक्षी युवक है जो दिल्ली में एकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रहा है। उसने बताया कि बहुत पहले से वह भारत के आइडिया में विश्वास करता है क्योंकि उसके सामने भारत की आर्थिक सफलता की कहानी बेची गयी थी।

वह कहता है कि “अगर भारत चाहता है कि हम इस बात पर विश्वास करें कि वह एक लोकतंत्र है तो वे खुद को मूर्ख बना रहे हैं। कश्मीर का बहुत सालों से भारत के साथ असहज रिश्ता रहा है (लेकिन) हमारा विशेष दर्जा दोनों के बीच पुल का काम करता था। इसको खत्म करने के साथ ही उन्होंने हमारी पहचान छीन ली है। यह किसी भी कश्मीरी के लिए स्वीकार्य नहीं है।”

मलिक इस बात की भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं कि जैसे ही पाबंदी हटेगी और प्रदर्शनकारी सड़कों पर प्रदर्शन करने में सक्षम होंगे तो हर कश्मीरी उसमें शामिल होगा। उसने बताया कि” ऐसा कहा जाता था कि हर परिवार में एक भाई अलगाववादियों के साथ है और दूसरा मुख्यधारा (भारत) के साथ। लेकिन अब भारत सरकार ने दोनों को एक कर दिया है।”

उसकी 20 साल की बहन रुख्सार राशिद जो कश्मीर यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर की स्टूडेंट है, ने बताया कि जब उसने टीवी पर गृहमंत्री का भाषण सुना तो उसके हाथ कांपने लगे और उसके बगल में बैठी उसकी मां ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया।

राशिद ने बताया कि वह कह रही थीं कि इससे अच्छी तो मौत थी। “मुझे रात में झटके आते हैं जिसके चलते लगातार जगी रहती हूं। बाटमालू इलाके में रहने वाले मेरे दादा-दादी कहते हैं कि यह अफगानिस्तान में बदल जाएगा।”

पिछले सप्ताह सालाना अमरनाथ हिंदू तीर्थयात्रा को अचानक रोक दिया गया। अधिकारियों ने इसके पीछे आतंकी खतरे का हवाला दिया था। उसके बाद होटल और घरों समेत डल लेक से तमाम पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को वापस लौटने के निर्देश दे दिए गए।

तब कश्मीर में सभी इस बात का अंदाजा लगा रहे थे कि कुछ होने वाला है लेकिन जिन दर्जनों लोगों से मेरी बात हुई उसमें से कोई भी इस बात की अपेक्षा नहीं किया था कि दिल्ली इतनी दूर तक चली जाएगी और एकतरफा तरीके से संविधान के एक हिस्से को खत्म कर दिया जाएगा।

संचार के ब्लैकआउट होने का मतलब है विश्वसनीय सूचना का आना बंद हो जाना। एक दूसरे के मुंह से खबरें भी आनी रुक जाती हैं। पाबंदी के बावजूद हम रोजाना श्रीनगर या फिर किसी दूसरे इलाके में प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की खबरें सुनते हैं। हमने सुना कि एक प्रदर्शनकारी उस समय नदी में कूदकर डूब गया जब सुरक्षाकर्मियों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। अस्पताल में बहुत सारे लोग घायल होने के बाद भर्ती हैं।

लेकिन भारत सरकार यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है।

बुधवार को टीवी चैनलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल को शोपियां की एक गली में नागरिकों के एक समूह के साथ लंच करते हुए दिखाया। जिसे भारतीय प्रेस में आतंकियों के सबसे सघन ठिकानों में एक बताया। इसके जरिये यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि सरकार के फैसले को कितना लोकप्रिय समर्थन हासिल है। यहां तक कि सबसे मुश्किल इलाके में भी शांति और सहयोग का वातावरण है।

मुस्कान लतीफ-साभार-बीबीसी।

लेकिन कश्मीरी इसे स्टंट करार देते हैं। रिजवान मलिक ने पूछा कि “अगर लोग खुश हैं तो फिर उन्होंने कर्फ्यू क्यों लगा रखा है। संचार पूरी तरह से क्यों ठप है।”

यह सवाल श्रीनगर के हर हिस्से में दोहराया जा रहा है- घर, गली और संवेदनशील पुराने इलाकों तक में जिसे स्थानीय लोग डाउनटाउन कहते हैं। यहां तक कि दक्षिण में स्थित पुलवामा में भी यही माहौल है।

रास्ते चलते लोग मुझसे बात करने की कोशिश कर रहे थे। उनमें से एक जाहिर हुसैन ने कहा कि “इस समय कश्मीर पूरी तरह से गिरफ्त में है। जैसे ही ये हटेगा बवंडर शुरू हो जाएगा। ” डार पेशे से वकील हैं और पुलवामा में रहते हैं उन्होंने कहा कि “एक बार जैसे ही राजनीतिक और अलगाववादी नेताओं को हिरासत से या फिर उनके घरों से छोड़ा जाता है। उसके बाद विरोध प्रदर्शनों का आह्वान होगा जिसमें लोग बड़ी तादाद में भागीदारी करेंगे।”

यहां ज्यादातर लोगों का कहना है कि वो फैसले के वापस लेने से कम पर कतई सहमत नहीं होंगे। लेकिन पीएम मोदी की सरकार फैसलों को वापस लेने के लिए नहीं जानी जाती है। और यही बात घाटी में डर और आशंका को और बढ़ा देती है। जिसमें यह बात शामिल जाती है कि प्रदर्शन करने पर सरकार कड़ाई से निपटेगी।

हाईस्कूल के एक छात्र मुस्कान लतीफ ने मौजूदा परिस्थिति को तूफान के आने के पहले की शांति करार दिया।

“यह समुद्र के शांत रहने जैसा है लेकिन सुनामी किनारे को हिट करने के लिए तैयार है।”

(आबिद भट्ट की यह रिपोर्ट बीबीसी में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी।)

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