Thursday, December 9, 2021

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ममताः मोदी से लड़ने के बहाने कांग्रेस को निपटाने का इरादा

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प्रधानमंत्री मोदी के काल में लोकतंत्र पर हो रहे हमले का विरोध करने वाले पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति से हैरत में हैं कि दीदी भारतीय जनता पार्टी को कमजोर करने के बदले कांग्रेस को कमजोर करने में लगी हैं। मोदी के साथ उनका अदृश्य गठबंधन खुले में नहीं आया है। राजनीतिक अभिनय में पारंगत ममता और मोदी इसे फिलहाल बाहर आने भी नहीं देंगे। इस मामले में ममता दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से दो कदम आगे हैं। केजरीवाल पूजा-पाठ और बाकी तमाशों के जरिए हिंदुत्ववादियों से अपना गठबंधन जाहिर कर रहे हैं। लेकिन ममता इसे जल्द उजागर नहीं होने देंगी। इसमें समय लगेगा। यह खेल 2024 तक चलेगा और दीदी मोदी के खिलाफ राष्ट्रीय विकल्प का नेतृत्व करने के कांग्रेस के रास्ते में बाधक बनती रहेंगी। वह भारतीय जनता पार्टी की इस नैरेटिव को मजबूत करती रहेंगी कि कांग्रेस में विकल्प देने की क्षमता नहीं है और मोदी का विकल्प नहीं है। इस खेल को समझने के लिए हमें उनके बयानों पर नहीं, उनकी कॉरपोरेट समर्थक आर्थिक नीतियों पर गौर करने की जरूरत है। 

उच्च तकनीक और गोदी मीडिया के इस दौर में समझौते के लिए ममता को मोदी-शाह के साथ मिल-बैठ कर रणनीति बनाने की जरूरत नहीं है। कुछ हिस्सा बिचौलियों के जरिए पूरा करना है और बाकी मीडिया के जरिए छिपे-अन छिपे संदेशों से । वह मोदी या अमित शाह के साथ सीधा समझौता कर उनके चंगुल में आसानी से फंसेंगी भी नहीं। उन्हें अपना जनाधार भी बचाना है। वह नकली युद्ध करती दिखेंगी। मोदी-शाह की तरफ से इस नकली युद्ध लड़ने की जिम्मेदारी राज्यपाल जगदीप धनकर को सौंपी गई है क्योंकि उत्तर प्रदेश के चुनावों के कारण दोनों नेता बंगाल के मोर्चे के लिए समय निकाल नहीं पाएंगे। ममता भी उन्हें छूट देंगी और ओवैसी की तरह लोगों को कांग्रेस से दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश और बाकी राज्यों में जाएंगी।  

दिल्ली आने के पहले ममता ने कांग्रेस का घर तोड़ने की अपनी कोशिशों के जरिए एक साफ संदेश मोदी-शाह को दे रखा था। आसाम, मेघालय, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश से लेकर गोवा में कांग्रेस को तोड़ने के बाद वह दिल्ली आईं और प्रधानमंत्री मोदी से मिलने जाने के पहले उन्होंने कांग्रेस के कुछ पिटे नेताओं को तृणमूल कांग्रेस में शामिल किया। पवन वर्मा अपवाद हैं। वह जदयू के रास्ते आए हैं। दीदी मोदी को बंगाल ग्लोबल बिजनेस सम्मिट का निमंत्रण दे आईं। प्रधानमंत्री ने इसे स्वीकार भी कर लिया। दो साल पहले हुए सम्मिट में उन्होंने मोदी को नहीं बुलाया था और उनके मंत्रियों को निमंत्रण भेज दिया था। फिर उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात नहीं की और इस बारे में पूछे जाने पर तीखा जवाब दिया और कह दिया कि सोनिया गांधी से मिलना कोई संवैधानिक जरूरत नहीं है। कांग्रेस को तोड़ने का काम करने के बाद वह सोनिया गांधी के साथ किस मुंह से मिल सकती हैं ? 

मोदी के साथ ममता के हाथ मिलाने के कारण एकदम साफ हैं। पिछले सात सालों में मोदी ने देश के संघीय ढांचे को बुरी तरह कमजोर कर रखा है। केंद्रीकरण की ऐसी स्थिति है कि अगर राजनीतिक मजबूरी नहीं हो तो कोई भी राज्य केंद्र के साथ बेहतर संबंध ही रखना चाहेगा क्योंकि अब केंद्र के अनुदान पहले की तरह संस्थागत तरीकों से आसानी से नहीं मिल सकते हैं। देश की हर संवैधानिक संस्था का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जा रहा है। ऐसे में केंद्र से पंगा लेने का काम कांग्रेस या वाम मोर्चे की सरकारें ही कर सकती हैं। 

दूसरी कठिनाई भी छोटी नहीं है। उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे भतीजे अभिषेक बनर्जी और अन्य सहयोगियों को केंद्रीय एजेंसियों की जाँच से बचाना है। चुनाव के दौरान बेहद सक्रिय एजेंसियां आज यूं ही खामोश नहीं दिखाई दे रही हैं। 

पश्चिम बंगाल के चुनावों के विश्लेषण में कई गलतियां की गई हैं। लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि बंगाल में सीधे मुकाबले की नैरेटिव बनाने का नुकसान सबसे ज्यादा किसे हुआ? इसका सीधा नुकसान वाम मोर्चा और कांग्रेस को हुआ। दोनों का सफाया हुआ। बंगाल का राजनीतिक मैदान भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ने बांट लिया। इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए दीदी ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मदद ली। मोदी को बंगाल में पराजित होते देखने के लिए लालायित लोकतंत्र-समर्थकों के सामने भी इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वे इस नैरेटिव को स्वीकार करें। यह भी ध्यान देना चाहिए कि नंदीग्राम-सिंगूर में हुई वाम मोर्चा की गलती का फायदा उठा कर सत्ता में आई ममता ने पहला काम वाम शक्तियों के सफाए का किया। उन्होंने आरएसएस की शाखाओं के फैलने में मदद की और बंगाल  की राजनीति को ऐसी जगह पहुंचा दी जहां से भाजपा कभी भी राज्य को अपने कब्जे में ले सकती है। त्रिपुरा में जगह लेने की ममता की  कोशिशों से भी पता चलता है कि उनके मुख्य निशाने पर वाम शक्तियां हैं। 

यह दिलचस्प है कि मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत अभियान को सफल बनाने में लगे  प्रशांत किशोर ने मेघालय में कांग्रेस विधायक दल को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई है। कांग्रेस से पलायन करने वाले विधायकों का नेतृत्व करने वाले मुकुल संगमा ने यह जाहिर किया है कि किस तरह विकल्प की तलाश में किशोर ने उनकी मदद की है। 

लेकिन ममता को विपक्ष का विकल्प बनाने के पीछे की कारपोरेट राजनीति पर गौर करना जरूरी है। वाम से लड़ने वाली ममता ने अपनी निम्न-मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि का इस्तेमाल उसी तरह किया है जिस तरह मोदी अपनी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करते रहे हैं। देखना यह चाहिए कि ममता की नीतियां क्या रही हैं ? रेल मंत्रालय के निजीकरण की शुरुआत उनके मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने की थी। दीदी ने अपना वित्त मंत्री फेडरेशन आफ इंडियन चैम्बर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के सालों तक सेक्रेटरी जनरल रहे प्रो. अमित मित्रा को बनाया। यह जानना भी जरूरी है कि मोदी-शाह के चहेते अडानी और अंबानी दीदी के आशीर्वाद से बंगाल में अपने व्यापार का तेजी से विस्तार कर रहे हैं। हल्दिया पोर्ट के निजीकरण में इस पोर्ट के कारोबार का बड़ा हिस्सा अडानी को मिलने वाला है। इसी तरह अंबानी टेलीकॉम सेक्टर का बड़ा विस्तार करने में लगा है। 

लेकिन कांग्रेस को निपटाने के लिए जिन लोगों को ममता जुटा रही हैं उनकी छवि भी देखने लायक है। प्रधानमंत्री मोदी के वाराणसी में उन्होंने कमलापति त्रिपाठी के परिवार को चुना है जो अपनी जातिवादी राजनीति के लिए मशहूर रहा है। इसी तरह बिहार में कीर्ति आजाद उनके साथ आए हैं। यह सबके सामने है कि उन्होंने कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचाया है। बाकी जगह भी उन्होंने ऐसे ही नेताओं को अपने खेमे में लाया है। इससे कांग्रेस को सांगठनिक रूप से कोई नुकसान वह नहीं पहुंचा सकती हैं और न ही मोदी का कोई विकल्प खड़ा कर सकती हैं। लेकिन कारपोरेट मीडिया की मदद से वह यह भ्रम जरूर फैला सकती हैं कि कांग्रेस राष्ट्रीय विकल्प नहीं है। भाजपा के साथ अदृश्य गठबंधन में मदद के लिए उनके पास मुकुल राय और बाबुल सुप्रियो जैसे नेता आ ही गए हैं। वे मोदी-शाह के भक्त रहे हैं। 

सवाल उठता है कि विपक्ष के खेमे में रह कर कांग्रेस को निपटाने में लगी ममता का जवाब कांग्रेस कैसे देगी? यह काम सिर्फ अधीर रंजन राय से नहीं हो सकता है। वाम मोर्चा को भी उम्रदराज नेताओें के बदले नौजवानों को मैदान में उतरना होगा। दीदी को बंगाल में ही चुनौती देने की जरूरत है। 

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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