मायावती पर राहुल गांधी की टिप्पणी के मायने और कांग्रेस की भावी राजनीतिक रणनीति 

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कल जब दिल्ली में भाजपा अपने लगभग तीन दशकों के सूखे को खत्म कर भाजपा की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री की ताजपोशी कर रही थी, और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री एक बार फिर से रिकॉर्ड बजट के साथ भाजपा के लिए जीत की हैट्रिक लगाने की रणनीति के तौर पर प्रस्तुत कर रहे थे, समानांतर स्तर पर प्रदेश में एक और परिघटना घट रही थी। 

कल राहुल गांधी अपनी लोकसभा रायबरेली में थे, जहां पर पार्टी ने दलित छात्र संवाद कार्यक्रम आयोजित किया हुआ था। तमाम बातों के अलावा, राहुल गांधी ने एक बात ऐसी कह दी, जिसने राज्य की सियासत के तार छेड़ दिए हैं। 

दलित छात्रों के बीच राहुल गांधी ने एक प्रश्न उछाला, “बहनजी आजकल ठीक से चुनाव क्यों नहीं लड़ रही हैं? हम चाहते थे कि बहनजी बीजेपी के विरोध में हमारे साथ मिलकर चुनाव लड़ें। मगर मायावती जी किसी न किसी वजह से हमारे साथ नहीं लड़ी। लेकिन हमें तो काफी दुःख हुआ, क्योंकि यदि तीनों पार्टियाँ एक हो जातीं तो बीजेपी कभी जीत नहीं पाती।” 

राहुल के इस प्रश्न और जवाब पर छात्रों की ओर से खूब तालियाँ बजाई जाती हैं। यह वह अबूझ प्रश्न है, जिसका जवाब संभवतः कांशीराम के बसपा को दिल में बसाए उत्तर भारत के हर दलित समुदाय के व्यक्ति के मन में गूँज रहा है, लेकिन उसे सूझ नहीं रहा। 

राहुल गांधी ने असल में दलित समुदाय के मन में कौंध रहे सवाल को सार्वजनिक मंच दे दिया। अब यह सवाल तीर की तरह जाकर बसपा सुप्रीमो को लगना तय था। इसके जवाब में मायावती जी की ओर से अपने सोशल मीडिया हँडल से तीन-तीन पोस्ट कर राहुल पर जवाबी हमला किया गया है।

मायावती के अनुसार, कांग्रेस ने दिल्ली में बीजेपी की बी टीम के तौर पर चुनाव लड़ा, जिसके कारण बीजेपी दिल्ली में सत्ता में आ पाई। इसके अलावा उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस पार्टी जिन राज्यों में मजबूत है या उसकी सरकारें हैं वहाँ पर बीएसपी व उनके अनुयाइयों के साथ उसका रवैया द्वेष व जातिवादी है, लेकिन यूपी जैसे राज्य में जहाँ कांग्रेस कमजोर है वहाँ बीएसपी से गठबंधन करने जैसे बरग़लाने वाली बातें करना इस पार्टी का दोहरा चरित्र नहीं तो और क्या है? 

इतना ही नहीं मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस जैसी जातिवादी पार्टियों के साथ बसपा ने जब भी गठबंधन बनाया है, हर बार हमारा वोट तो उनको ट्रान्सफर हो जाता है लेकिन उनका वोट बसपा को नहीं मिलता। ऐसे में बीएसपी को हमेशा घाटे में ही रहना पड़ता है। 

मायावती के ये तीनों आरोप उनके समर्थक वर्ग के गले अब कितना उतरता है ये तो समय ही बतायेगा, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। 2014, 2019 और 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम इसकी गवाही देते हैं। 2014 में बसपा ने स्वतंत्र चुनाव लड़ा, 2019 में सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा, जिसमें सपा के खाते में फिर से 5 सीट आई, लेकिन बसपा 10 सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही थी। लेकिन चुनाव के फौरन बाद ही बसपा सुप्रीमो ने यह दावा करते हुए गठबंधन से खुद को अलग कर दिया कि सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुआ। 

मतलब जीरो सीट से 10 सीट मिलने के बावजूद पार्टी का आकलन था कि सपा का वोट उसे ट्रांसफर नहीं हुआ। क्या यह हकीकत नहीं थी कि 2019 में और भी भारी बहुमत से बीजेपी की सरकार बनने के बाद गठबंधन तोड़ना बसपा सुप्रीमो का राजनीतिक अवसरवाद था, जिसे 2024 के लोकसभा ने एक बार फिर से साबित कर दिया। 2024 लोकसभा चुनाव में बसपा के खाते में एक बार फिर से एक भी सीट हासिल न हो सकी। आज हालत यह है कि बसपा के पास कहने को देश में मात्र एक विधायक है, और उसके बारे में भी यही माना जाता है कि उसे यह जीत अपने दम पर हासिल हुई।  

जबकि जिस सपा के ऊपर आरोप लगाकर मायावती ने गठबंधन से किनारा किया था, 2024 लोकसभा में वह पार्टी प्रदेश की नंबर वन पार्टी ही नहीं देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। 2014 और 2019 लोकसभा में 5-5 लोकसभा सीट जीतने वाली समाजवादी पार्टी को इस बार 37 सीटें हासिल हुईं, और गठबंधन की साझीदार पार्टी कांग्रेस भी 2019 की तुलना में 5 सीटें अधिक जीत 6 सीटें हासिल करने में सफल रही। 

यह तथ्य है कि उत्तर प्रदेश में बसपा को गठबंधन में शामिल करने के लिए कांग्रेस ने आखिरी क्षण तक जोर लगाया था। इसके पीछे भी कांग्रेस नेतृत्व की नई वैचारिकी काम कर रही थी, जिसे उसने 2014 में केंद्र की सत्ता गंवाने और लगातार दो दफा बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद सोचना शुरू किया था।     

इससे पहले देश में कांग्रेस एकमात्र एक ऐसी राजनीतिक पार्टी थी जिसका इतिहास आजादी से पूर्व और आजादी के बाद भी सबसे प्रभावी था। लेकिन 80 के दशक तक आते-आते यह साफ़ हो चला था कि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बेस को खोती जा रही है, और उसका राजनीतिक ग्राफ तेजी से गिरता जा रहा था। विशेषकर 2014 के चुनावों में मिली करारी शिकस्त से यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका था कि कांग्रेस न सिर्फ शोषितों, दलितों, अल्पसंख्यक तबकों और मध्य वर्ग के व्यापक तबके में अपना प्रभाव खो चुकी है, बल्कि कॉर्पोरेट ने भी अब उससे बेहतर विकल्प खोज लिया है।

2019 में भी 2014 की तरह ही स्थिति थी, क्योंकि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी रणनीति में कोई बदलाव नहीं लाया था। 80 के दशक वाला कांग्रेस नेतृत्व वैसे भी सत्ता की चाशनी की रौ में आया था, वह या तो बीजेपी में जा रहा था, या पार्टी के भीतर रहकर उसे ही खा रहा था। राहुल गांधी ने इस वैचारिक जड़ता को तोड़ने के लिए एक यात्रा की शुरुआत की, जो पार्टी की दिशा-दशा बदलने से ज्यादा उन्हें देश को समझने और अपनी दुविधा को खत्म करने के काम आई। 

इसी का नतीजा था कि 2024 के आम चुनावों में भले ही सत्ता समीकरण में कोई बड़ा उलटफेर संभव न हो सका, लेकिन अबकी बार 400 पार की हुंकार लगाने वाली बीजेपी 240 पर आकर सिमट गई, और उसे दो बैसाखियों के बल पर इस बार देश की कमान संभालने के लिए मजबूर होना पड़ा है। 99 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस आज खुद को कुछ हद तक राष्ट्रीय राजनीतिक मानचित्र में स्थापित करने में सफल हो सकी है।

इस बदलाव में उसके साथ एक हद तक दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय जुटा है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष, मल्लिकार्जुन खड़गे उसे अब अंजाम तक पहुंचाना चाहते हैं, और कांग्रेस को 1980 के पूर्व वाली स्थिति में लाने में जुटे हुए हैं। रायबरेली में राहुल का यह बयान उसी दिशा की ओर बढ़ाया गया एक कदम है।

 राहुल का यह दावा कि यदि मायावती गठबंधन में शामिल हो जातीं तो बीजेपी केंद्र में सरकार नहीं बना पाती, का ठोस आधार है। 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 16 सीटें ऐसी पाई गई हैं, जहां यदि बसपा इंडिया गठबंधन में शामिल होती, तो इन पर बसपा या सहयोगी दल जीतकर भाजपा को हासिल 33 सीटों की जगह 17 सीट पर समेट सकते थे। 

ये सीटें हैं, अकबरपुर, अलीगढ़, अमरोहा, बांसगांव, भदोही, बिजनौर, देवरिया, फर्रुखाबाद, फतेहपुर सीकरी, हरदोई, मेरठ, मिर्जापुर, मिसरिख, फूलपुर, शाहजहाँपुर और उन्नाव। इन सभी 16 लोकसभा सीटों पर एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच वोटों का जितना अंतर है, उससे कई गुना वोट अकेले बसपा के खाते में गये। बसपा 80 में से एक भी सीट जीत पाने में नाकामयाब रही, लेकिन वह अपनी सभी 10 सीट भी इस प्रकिया में गंवा गई।

इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा और समाजवादी पार्टी के वोट प्रतिशत में कोई खास अंतर नहीं आया है, लेकिन परिणामों में बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिलता है। 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी 41% वोट हासिल कर अपने दम पर 255 सीट जीतने में कामयाब रही, जबकि सपा 32% वोट पाकर भी 111 सीट पर सिमट गई थी। 

वहीं 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी एक बार फिर 41% से कुछ अधिक वोट पाती है, लेकिन 80 सीटों में उसे 33 सीटों पर ही जीत हासिल हो सकी, और वह 29 सीटें गंवा दी। जबकि समाजवादी पार्टी भी 2022 के अपने प्रदर्शन को ही दुहराती है और उसे 33% से कुछ ज्यादा वोट हासिल होते हैं, लेकिन उसकी सीटों की संख्या में 5 की जगह 37 सीटों की अभूतपूर्व वृदि देखने को मिलती है। यह कमाल इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि उत्तर प्रदेश में इस बार उसे कांग्रेस का साथ मिला, जिसे 9% से अधिक वोट हासिल हुए और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ-साथ उसे दलित समाज से भी वोट हासिल हुए। 

मायावती इस तथ्य से वाकिफ हैं, और भाजपा भी इस खतरे को भांप रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मायावती देर-सवेर अपनी डूबती राजनीतिक पारी को बचाने के लिए कोई साहसिक फैसला लेती हैं, या सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों का डर भविष्य में भी उनके लिए बड़ा हव्वा बना रहता है। उत्तर प्रदेश के बहुसंख्यक दलित, अल्पसंख्यक और अति पिछड़ा तबका किस कदर आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मार को पिछले कई वर्षों से सह रहा है, इसकी मिसाल आजाद भारत में शायद ही कोई और हो।      

(रविंद्र पटवाल जनचौक संपादकीय टीम के सदस्य हैं)

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