Sat. Apr 4th, 2020

मोदीराज बीजेपी का “स्वर्ण काल” नहीं “गुप्त काल” है

1 min read

संसदीय लोकतंत्र में संख्या बल का बहुत महत्व होता है। लोकसभा और विधान सभा में बहुमत वाले दल की ही सरकार बनती है। संसदीय लोकतंत्र में चुनावी जीत और फिर सरकार गठन किसी भी राजनीतिक दल के विकास का चरम बिंदु है। एक हद तक यह माना जा सकता है चुनावी जीत किसी भी पार्टी के विचारों की भी जीत है। इस दृष्टि से इस समय संघ-बीजेपी चुनावी राजनीति में सब पर भारी हैं। केंद्र में बीजेपी दूसरी बार सत्तारूढ़ है। लोकसभा और राज्यसभा में बीजेपी का बहुमत है तो कई राज्यों में उसकी सरकार है। यह सब कमाल मोदी-शाह की जोड़ी ने किया है।
लेकिन अभी चंद दिनों पहले ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। बीजेपी ने चुनाव जीतने के लिए हर छल-छद्म का सहारा लिया। बीजेपी नेताओं और उसके समर्थक पत्रकार-बुद्धिजीवी सार्वजनिक मंचों से केजरीवाल को “मुफ्तवंशी” कहते रहे। बीजेपी ने अपने प्रचार अभियान में केजरीवाल सरकार के पांच साल को “मुफ्त काल” बताया। और आम आदमी पार्टी को हरा कर दिल्ली को “मुफ्त काल” से मुक्त करने का आह्वान किया।
संघ-बीजेपी नेता यहीं तक नहीं रूके, उनका कहना है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली की जनता को मुफ्तखोरी की आदत डाल रहे हैं। केजरीवाल की यह नीति दिल्ली और देश के लिए ठीक नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद जी न्यूज के तिहाड़ रिटर्न एंकर सुधीर चौधरी तो इतने दुखी हुए कि उन्होंने अपने शो में दिल्ली की जनता की लानत-मलानत करते हुए आलसी तक कह डाला।
लेकिन इस स्टोरी का विषय अरविंद केजरीवाल और उनकी नीति नहीं है। हमारी स्टोरी का विषय केजरीवाल का “मुफ्त काल” नहीं बल्कि बीजेपी का “स्वर्ण काल” है। बीजेपी आज अपने राजनीतिक उत्थान के जिस मुहाने पर खड़ी है उससे विपक्षी पार्टियों को रश्क होना लाज़िमी है। लेकिन बीजेपी के अदना कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेता तक पार्टी के इस प्रदर्शन से खुश नहीं बल्कि अवसाद में हैं। क्योंकि पार्टी और सरकार में “बनिया-वैश्य” समुदाय के नेता-कार्यकर्ता ही खुश हैं। पार्टी कार्यकर्ता आपसी बातचीत में इसे बीजेपी का “स्वर्ण काल” नहीं “गुप्त काल” कहते हैं।
प्राचीन भारतीय इतिहास को वैदिक काल, मौर्य काल और गुप्त काल जैसे कालखंड में विभाजित किया गया है। संयोग से भारतीय इतिहास के “गुप्त काल” को “स्वर्ण काल” भी कहा जाता है। राजनीतिक लिहाज से देखें तो बीजेपी के लिए यह गोल्डन पीरियड है। केंद्र की सरकार से लेकर कई राज्यों में बीजेपी की सरकार है।
21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में स्थापित भारतीय जनसंघ एक पुराना राजनैतिक दल था जिससे 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। जनसंघ के पहले अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। इस पार्टी का चुनाव चिह्न दीपक था। इसने 1952 के संसदीय चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी जिसमें डाक्टर मुखर्जी स्वयं भी शामिल थे। जनसंघ को 1952 में 3.1 प्रतिशत वोट के साथ 3 सीट, 1957 में 5.9 प्रतिशत वोट 4 सीट, 1962 में 6.4 प्रतिशत वोट और 14 सीट, 1967 में 9.4 प्रतिशत वोट 35 सीट और 1971 में 7.37 प्रतिशत वोट 22 सीट हासिल हुई थी। जनसंघ को लोकसभा चुनावों में उत्तरोत्तर सफलता मिलती रही। लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनाव में पार्टी के खाते में मात्र तीन सीटें ही आईं। भारतीय जनता पार्टी 1998 से 2004 तक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार की सबसे बड़ी पार्टी रही थी। 2014 के आम चुनाव में इसने अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया।
ऐसे में हमने बीजेपी की लगातार होती जीत और उसके कारणों की पड़ताल करने के लिए बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क किया और बीजेपी दफ्तर गए। दीन दयाल उपाध्याय रोड पर स्थित बीजेपी का नया दफ्तर ही उसके वैभव को बताने के लिए काफी है। लेकिन जब हमने पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं-पदाधिकारियों और पार्टी कार्यकर्ताओं से बीजेपी की जीत पर बात करना शुरू किया तो कुछ दूसरी ही कहानी सुनने को मिली। इस बातचीत के क्रम में हमने बीजेपी और आनुषंगिक संगठनों के पदाधिकारियों से भी बातचीत की।
हमने बीजेपी के साथ ही भारतीय जनता युवा मोर्चा और किसान मोर्चा के पदाधिकारियों से संपर्क किया। युवा मोर्चा के एक कार्यकर्ता से सरकार और पार्टी के फंक्शनिंग पर सवाल किया तो चौंकाने वाले जवाब मिले। पहले तो वह सब कुछ ठीक होने की बात करता रहा। लेकिन जरा सा कुरेदने पर उसका आक्रोश फट पड़ा। उसने कहा कि साहब ! अब हम लोगों का कुछ नहीं हो सकता। पार्टी के ठाकुर-पंडित नेताओं को मोदी-शाह ने किनारे लगा दिया है। आडवाणी, जोशी और सुमित्रा महाजन जैसे पुराने दिग्गजों को उम्र के नाम पर किनारे कर दिया गया तो राजनाथ और गडकरी को अपने जाति की कीमत चुकानी पड़ रही है। आप रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की हालत देख कर अंदाजा लगा सकते हैं कि पार्टी में ब्राह्मणों और ठाकुरों की क्या हालत है। मोदी-शाह की जोड़ी ने राजनाथ सिंह जैसे ताकतवर नेता के पर कतर दिए हैं तो हम जैसे कार्यकर्ताओं को क्या मिलेगा ? यह आप अच्छी तरह समझ सकते हैं।
देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों में व्यक्तिवाद औऱ जातिवाद की बात होती रही है। बीजेपी पर जाति नहीं धर्म के आधार पर राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। वह हिंदुत्व के नारे को जोर-शोर से उछालती रही है। वह व्यापक हिंदू समाज को एक ओर सशक्त करने की बात करती रही है। तो क्या बीजेपी इस समय हिंदुत्व को छोड़कर जातीय राजनीति की राह पर चल चुकी है ?
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि,“यह हिंदुत्व नहीं कॉरपोरेट की सरकार है। अब आप बताइए कॉरपोरेट किसका है? देश का कॉरपोरेट बनियों का है। बिरला, अंबानी, डालमिया, मोदी आदि सारे पूंजीपति वैश्य वर्ग के हैं। वैश्य-बनिया लंबे समय से बीजेपी को नोट और वोट देते रहे हैं।अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि सिर्फ बीजेपी ही नहीं सारे दलों को चंदा देते रहे। लेकिन इसके बदले में उनकों मिला क्या? यह तो संयोग है कि इस समय बीजेपी में वैश्य वर्ग के कुछ नेता महत्वपूर्ण पदों पर हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वह कहते हैं कि यह सब अनायास नहीं है। आप ही बताइए! वोट उनका नोट उनका औऱ राज करें ब्राह्मण। ऐसा कैसे चल सकता है।”
मोदी के नेतृत्व में केंद्र में बीजेपी की दूसरी बार सरकार बनी है। और शासन से लेकर पार्टी के हर कार्यक्रम पर मोदी की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकता है। पार्टी और विपक्ष की नजर में यह मोदी काल है। लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता तक दबी जुबान से इसे ‘गुप्त काल’ कहते हैं। बीजेपी और उसके मातृ संगठन आरएसएस के ढांचे में ब्राह्मण सबसे ऊपर हैं। 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन केशव बलिराम हेडगेवार ने किया। जो महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण थे। उनके बाद संघ के छह सर-संघचालक हुए। जिसमें 1993-2000 तक प्रो. राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ही गैर ब्राह्मण थे। संघ के मौजूदा सर-संघचालक मोहन भागवत भी चितपावन ब्राह्मण हैं। संघ-बीजेपी का नेतृत्व शुरू से ही ब्राह्मणों और सवर्णों के कब्जे में रहा। संघ की राजनीतिक शाखा जनसंघ और बाद में बीजेपी भी सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी मानी जाती रही है।
संघ नेता अपने निजी जीवन में जोड़ी पर विश्वास नहीं करते हैं। राष्ट्र सेवा की राह के वे अकेले यात्री हैं। लेकिन बीजेपी अपने स्थापना काल से ही राजनीतिक जोड़ी के लिए विख्यात रही है। अटल-आडवाणी की जोड़ी ने बीजेपी को पहली बार केंद्र की सत्ता में पहुंचाया तो मोदी-शाह की जोड़ी ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। अटल-आडवाणी की जोड़ी ने जहां गठबंधन के बल पर केंद्र में सरकार बनाई थी वहीं पर मोदी-शाह की जोड़ी ने सरकार बनाने के लिए न केवल जरूरी बहुमत जुटाया बल्कि विपक्ष को भी आधार विहीन बना दिया।
संघ पर भले ही आज तक चितपावन ब्राह्मणों का कब्जा बरकरार है। लेकिन बीजेपी की पहचान शुरू में बनियों की पार्टी के रूप में रही है। बीजेपी के कोर वोट बनिया औऱ पंजाबी शरणार्थी रहे हैं। अस्सी के दशक तक बीजेपी की पहचान बनियों की पार्टी के तौर पर रही।
राम मंदिर आंदोलन के बाद बीजेपी का राजनीतिक आधार बढ़ा। हिंदी भाषी राज्यों में बीजेपी की सरकार बनी। मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद बड़ी तेजी से सवर्ण बीजेपी की तरफ आकर्षित हुए। इसका एक कारण यह था कि कांग्रेस ने सीधे तौर पर न तो आरक्षण का समर्थन किया औऱ न ही विरोध। जिसके कारण कांग्रेस से सवर्ण और दलित वोट खिसक गए। सवर्ण जहां बीजेपी के साथ चले गए वहीं पर दलित बसपा तो मुसलमान क्षेत्रीय दलों के साथ हो लिए। अचानक आधार बढ़ने के कारण बीजेपी के आंतरिक ढांचे में काफी बदलाव हुए। और नब्बे का दशक समाप्त होते-होते बीजेपी सवर्णों और ब्राह्मणों की पार्टी कही जाने लगी।
लेकिन 2014 के चुनाव के पहले बीजेपी में आमूलचूल परिवर्तन होने शुरू हो गए। गुजरात के पिछड़े वर्ग से संबंधित नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। मोदी चुनाव में भारी बहुमत से जीते। इसके बाद एक-एक करके बीजेपी औऱ सरकार के प्रमुख पदों पर वैश्य समुदाय के लोगों का कब्जा होता गया। बीजेपी के एक पुराने कार्यकर्ता कहते हैं कि प्रधानमंत्री गुजरात के जिस घांची समुदाय से तालुक रखते हैं वह बनिया वर्ग में आता है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह जैन बनिया हैं तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी राजस्थान के वैश्य समुदाय से हैं। इसी तरह कैबिनेट के महत्वपूर्ण सहयोगी पीयूष गोयल भी हरियाणा के वैश्य हैं।
पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि मोदी ने बड़ी चालाकी से पार्टी में ब्राह्मण नेतृत्व को किनारे करके बनियों को आगे कर दिया। झारखंड में रघुबर दास को तो हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी की। जबकि सच्चाई यह है कि खट्टर और रघुबर दोनों का कोई आधार नहीं है। मोदी-शाह की जोड़ी रघुबर दास को लेकर इतना भावुक रही कि पार्टी के वरिष्ठ नेता सरयू राय को टिकट तक नहीं दिया गया। और सरयू राय ने रघुबर दास के खिलाफ चुनाव लड़कर उनकी औकात बता दी। अब बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कह रहा है कि सरयू राय के मामले में हमें गुमराह किया गया। लेकिन सरयू राय का मामला यह बताता है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कैसे फैसला करता है, उसका एक उदाहरण है।
सिर्फ सरकार ही नहीं संगठन में भी वैश्य वर्ग के नेता महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं। उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ भले ही राज्य के मुखिया हैं लेकिन वास्तविक सत्ता सुनील बंसल के हाथों में हैं। जो राजस्थान के बनिया और मोदी-शाह के करीबी हैं। उत्तर प्रदेश में संगठन से लेकर सरकार और नौकरशाही तक बंसल के इशारे पर नाचती है। क्योंकि बंसल पर मोदी-शाह की कृपा दृष्टि है। संघ के आनुषंगिक संगठनों पर भी वैश्य समुदाय के लोगों का कब्जा है। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार भी इसी वर्ग के हैं तो संघ-बीजेपी के अधिकांश महत्वपूर्ण पदों पर बनिया समुदाय के नेताओं का ही वर्चस्व है।

Donate to Janchowk
प्रिय पाठक, जनचौक चलता रहे और आपको इसी तरह से खबरें मिलती रहें। इसके लिए आप से आर्थिक मदद की दरकार है। नीचे दी गयी प्रक्रिया के जरिये 100, 200 और 500 से लेकर इच्छा मुताबिक कोई भी राशि देकर इस काम को आप कर सकते हैं-संपादक।

Donate Now

Scan PayTm and Google Pay: +919818660266

Leave a Reply