अब ‘सरकार बहादुर’ तय करेगी शोध का आंतरिक सिद्धांत!

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अब आपके शोध पर भी नजर रखी जायेगी! आईआईएम-अहमदाबाद में मार्च, 2020 में हुए एक सेमिनार में भारत के चुनाव आधारित लोकतंत्र पर लिखे तीन निबंधों पर आधारित डिजर्टेशन को संस्थान की निदेशक एरोल डी सूजा ने पीएचडी उपाधि के लिए मान्य किया था। इस शोध में भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को ‘एथिनिकली कान्सिट्यूटेड’- जाति आधारित पार्टी बताया गया है और, भाजपा को ‘एक हिंदू झुकाव वाली उच्च जाति की पार्टी’। इस मसले पर राज्य सभा सांसद सुब्रह्मण्यन स्वामी ने प्रधानमंत्री को खत लिखकर उपरोक्त मसले को उठाया। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री उच्च जाति के नेता नहीं हैं।

उनका कहना है कि ब्रिटिश इतिहासकार ‘प्रचारित’ कर रहे हैं कि भारत कभी भी ‘एक देश’ नहीं था और इसका समाज कभी भी एकबद्ध नहीं था। इसके बाद अप्रैल, 2020 को शिक्षा मंत्रालय ने संस्थान को खत लिखकर उस थिसिस की कॉपी मांगी। इसके जवाब में निदेशक ने लिखा कि मंत्रालय थिसिस के संदर्भ में विवेचक नहीं है। इस संदर्भ में यदि कोई आपत्ति है तो वह संस्थान की थिसिस एडवाईजरी एण्ड इक्जॉमिनेशन कमेटी में तय होगा। इस थिसिस को एक सेलेक्ट अकादमी कम्युनिटी के सामने वाइवा के लिए पेश किया जा चुका है।

इस संदर्भ में अब मंत्रालय का उस संस्थान में कानूनी और प्रशासनिक अधिकार द्वारा हस्तक्षेप करने का रास्ता कितना खुला और संकरा है, देखने की बात है। संस्थान इस हस्तक्षेप से बचने के लिए अपनी स्वायत्तता का हवाला दे रहा है। यह निश्चित ही महज एक तकनीकी मसला है। क्या मंत्रालय उन शैक्षणिक संस्थानों में हो रहे शोध में हस्तक्षेप कर सकता है, जो तकनीकी तौर पर उसके अधिकार क्षेत्र में आता है? यह बेहद गंभीर मसला है।

मसलन, भौतिक शास्त्र का अध्ययन यदि इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है तब क्या इस अधार पर इस पर रोक लगाया जा सकता है कि यह वेदांत की संकल्पना के अनुरूप नहीं है, और वेदांत को भारत के मूल दर्शन का पर्याय मान लिया जाये; जैसा कि बहुत से लोगों ने दावा किया भी है। भारत की जाति व्यवस्था और राजनीतिक पार्टी के नेतृत्वकारी सामाजिक आधारों के बारे में दर्जन भर किताबें हैं, जो जातियों की गोलबंदी और नेतृत्वकारी समूहों पर विस्तार से लिखते हुए पार्टियों के बदलते चरित्र को दिखाती हैं, जबकि भारत की लगभग सभी पार्टियां सभी जातियों, समूहों और धर्मों के नेतृत्व का दावा करती रहती हैं।

शोध, व्याख्याएं, लेख, चिंतन और दार्शनिकता समाज की उस गतिशीलता और गोलबंदी को सामने लाती हैं, जिनके भीतर ये पार्टियां काम करती हैं और अपने राजनीतिक कार्यक्रमों के जरिये उन्हें गोलबंद करते हुए अपना आधार मजबूत करती हैं। दोनों ही जगह विचारधारा और अवधारणाएं काम कर रही होती हैं। एक, संरचना और वैचारिक गतिशीलता को सामने ला रहा होता है तो दूसरा, संरचना और वैचारिकी को राजनीतिक कार्यक्रम के हितों में ढाल रहा होता है।

यदि दूसरा, चिंतन, अध्ययन, विश्लेषण, विचार और दार्शनिकता को भी इन हितों में ढालने लगे, तब हम एक बार उसी दौर में लौट चलेंगे, जहां वेद का सिर्फ पाठ होगा और पाठ करने वाला ही सुनेगा, अन्य यदि सुनने की भी जुर्रत करेगा तो उसके कान में पिघला हुआ सीसा डाल देने का प्रावधान होगा। ऐसे में, क्या हम एक बार कबीर और अन्य दलित और उत्पीड़ित जाति समूहों से आने वाले संतों की तरह वाचिक परम्परा की ओर लौटेंगे? हम इस बात को इतनी दूर तक खींचकर इसलिए लाए कि इसके पीछे की एकाधिकारी चिंतन, विचारधारा और दर्शन की प्रणाली दिख सके। (इस सदंर्भ में इंडियन एक्सपे्रस में रीतिका चोपड़ा की रिपोर्ट देखें।)

  • जयंत कुमार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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