कर्नाटक पर सुप्रीम फैसला : शिकायत इस्तीफ़े लटकाने की, फैसला ह्विप पर

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कर्नाटक में स्पीकर, बागी विधायक और मुख्यमंत्री एचडीकुमारस्वामी का पक्ष सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 15 बागी विधायक पर ह्विप लागू नहीं होगा। वे सदन में आने या नहीं आने को लेकर स्वतंत्र हैं। उनके इस्तीफ़े पर स्पीकर नियमानुसार फैसला करें।

जब बागी विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे तब उनकी शिकायत यह थी कि उनके इस्तीफ़े पर स्पीकर फैसला नहीं कर रहे हैं। उस शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट ने बीते गुरुवार को आदेश सुनाया था कि स्पीकर उसी रात इस्तीफे पर फैसला लें और अगले दिन शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करें। स्पीकर ने कोई फैसला नहीं लिया और सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उन्हें इस्तीफे की प्रकृति को समझने से लेकर उनकी अयोग्यता के मसले पर विचार करने में वक्त लगेगा।

एक हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट मूल शिकायत का निपटारा नहीं कर सका। इसके बदले उसने एक नये विषय पर फैसला दे डाला है कि बागी विधायकों पर ह्विप लागू होगा या नहीं, जबकि यह मसला विचारार्थ नहीं था। ह्विप पर चर्चा हो और संबद्ध राजनीतिक दल से उनका पक्ष न लिया जाए, यह अनहोनी भी हो गयी।

बागी विधायकों की शिकायत जस की तस बरकरार

एक हफ्ते बाद गुरुवार 17 जुलाई को जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है तब उस मूल शिकायत का उत्तर कहीं नहीं है जिसे लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इस्तीफे पर फैसला करने के लिए सुप्रीम कोर्ट समय-सीमा तय करने के फैसले से खुद ही पीछे हट गया है। ताजा आदेश में कोई समय-सीमा नहीं दी गयी है। इसका मतलब ये है कि बागी विधायकों की शिकायत जस की तस बनी हुई है। इस्तीफे पर नियमानुसार फैसला लेने के लिए स्पीकर को निर्देश देने या नहीं देने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यह तो स्पीकर का अधिकार है और वो फैसला करेंगे ही।

संबद्ध राजनीतिक दलों को सुने बगैर बागी विधायकों को ह्विप से आज़ादी सुप्रीम कोर्ट में मामले पर विचार होने के दौरान मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने विश्वासमत का फैसला लिया। यह नया घटनाक्रम था। 18 जुलाई को फ्लोर टेस्ट है। सभी पार्टियों ने ह्विप जारी किया है। स्वाभाविक रूप से वे सभी बागी विधायक अब भी अपनी-अपनी पार्टियों में बने हुए हैं और इसलिए ह्विप मानने को विवश भी हैं। इसी विवशता से सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आज़ादी दे दी है। मगर, इसके लिए एक बार फिर उस राजनीतिक दल को नोटिस तक जारी नहीं किया गया, उनका पक्ष तक नहीं सुना गया जिसके ह्विप को नहीं मानने की आज़ादी सुप्रीम कोर्ट ने दी है। इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर कानूनविदों का ध्यान देर-सबेर अवश्य जाएगा।

एक हफ्ते पहले स्पीकर को भी नहीं मिला था पक्ष रखने का मौका

सुप्रीम कोर्ट ने एक हफ्ते पहले अपने फैसले में जिस तरह से स्पीकर के अधिकार की अनेदखी की थी, उन्हें उनका पक्ष सुनने से पहले ही एक निर्देश से बांधने की असफल कोशिश की थी ठीक उसी तरह इस बार राजनीतिक दलों कांग्रेस और जेडीएस का पक्ष सुने बगैर ह्विप पर एकतरफा फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हुई या फैसला ही लागू होने योग्य नहीं था!

बीते गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल नहीं हुआ। कोई तो गलत होगा? या तो स्पीकर जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं माना? या फिर खुद सुप्रीम कोर्ट जिनका फैसला लागू नहीं हो पाया? इस गलती पर मौन नहीं रहा जा सकता। अगर स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना की है तो उन पर अवमानना का मुकदमा चलना चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट ने गलत फैसला सुनाया तो उस फैसले पर संशोधन सामने आना चाहिए। अब तक दोनों में से कोई काम नहीं हुआ है।

कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के बागी एमएलए

बागी विधायकों के इस्तीफ़ों को क्यों नहीं ‘सामूहिक’ माना जाए

बागी विधायकों के इस्तीफे को समझना बहुत जरूरी है। इन इस्तीफों की प्रकृति व्यक्तिगत है मगर वास्तव में ये सामूहिक इस्तीफे हैं। ऐसे इस्तीफ़े जिसमें सदन छोड़ने की तत्परता है मगर पार्टी छोड़ने की नहीं। इन इस्तीफ़ों से उन्हीं दलों की सरकार गिर सकती है जिनके वे सदस्य हैं। बाद में यही पूर्व विधायक दोबारा मंत्री भी हो सकते हैं किसी ऐसी सरकार में जो इनके दलों की नहीं है। इन बातों को संसदीय सियासत को समझने वाला सामान्य नागरिक भी समझ सकता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इनकी अनदेखी कैसे कर दी?

सुप्रीम कोर्ट ने अनदेखी की, यह इस बात से पता चलता है कि उन्होंने इस्तीफा स्वीकार नहीं करने की याचिका को अगर स्वीकार किया तो इसका मतलब यह था कि विधायक रहना या नहीं रहना व्यक्तिगत आज़ादी है। कोई जबरदस्ती किसी को विधायक रहने को बाध्य नहीं कर सकता। मौलिक अधिकार की प्रकृति के कारण ही सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को स्वीकार कर पाया। अगर सुप्रीम कोर्ट ने इन इस्तीफ़ों को व्यक्तिगत इस्तीफ़ा नहीं मानकर सामूहिक इस्तीफा और जैसा कि ऊपर चर्चा है इसके मकसद को समझा होता, तो बागी विधायकों की शिकायत विचारार्थ स्वीकार ही नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या असर होगा? इसे समझने के लिए कर्नाटक विधानसभा की स्थिति समझनी होगी। 224 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस-जेडीएस के पास 117-16 = 101 विधायक रह गये हैं। वहीं बीजेपी के पास 105 और 2 निर्दलीय विधायकों का समर्थन है। मतलब साफ है कि 206 सदस्यों वाले सदन में बीजेपी के पास 107 विधायक हैं और बहुमत पलट चुका है।

दलबदल के बदले रूप को कानूनी मान्यता, बागी बम-बम, पार्टियां मजबूर

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से होगा यह कि सभी 16 बागी विधायकों पर अयोग्यता का डर खत्म हो जाएगा जिस डर के कारण वे अपने-अपने दलों में लौट सकते थे और कुमारस्वामी सरकार को बचा सकते थे। अब वे निर्भीक होकर सरकार गिराने की अपनी मंशा को अंजाम देंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बगावत करने वाले विधायकों को अतिरिक्त सुरक्षा दे दी है। वहीं, इससे कांग्रेस और जेडीएस जैसी पार्टियों के लिए ह्विप भी गैरजरूरी हो गया है। एक तरह से दल बदल विधेयक कानून के तहत राजनीतिक दलों को जो अधिकार प्राप्त थे, उसे ही इस फैसले ने कमज़ोर कर दिया है।

कुमारस्वामी सरकार का बचना मुश्किल

एक बड़ा सवाल ये है कि आगे क्या होगा? क्या एचडी कुमारस्वामी सरकार के बचने की कोई संभावना है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह सम्भावना बिल्कुल खत्म-सी हो गयी लगती है। स्पीकर इस्तीफों पर फैसला लेंगे और सम्भव है कि वे अयोग्यता पर भी फैसला लें। स्पीकर अब भी बागी विधायकों को अयोग्य करने का अधिकार रखते हैं। उन्हें अगर ऐसा लगेगा कि ये विधायक दल बदल कानून का उल्लंघन करने की मंशा रखते हैं और इससे बचने के लिए ही विधायकी से इस्तीफा और पार्टी में बने रहने का फैसला कर रहे हैं तो वे उन्हें अयोग्य घोषित कर देंगे।

अयोग्य घोषित करने से सदन की ताकत 224 में कोई फर्क नहीं आएगा, मगर अयोग्य घोषित हुए विधायक वोट नहीं दे पाएंगे। फिर भी कुमारस्वामी की सरकार बचेगी, इसकी उम्मीद नहीं है। इतना जरूर है कि नयी सरकार बनने के लिए आवश्यक बहुमत का गणित बीजेपी की पहुंच से दूर रहेगा। बीजेपी के पास 107 विधायकों का समर्थन है जो 224 के आधे 112 से कम है। वहीं अगर स्पीकर ने अयोग्यता पर फैसले के बाद उन विधायकों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए, जिसकी सम्भावना ज्यादा है तो बीजेपी सरकार बनने की राह में यह बाधा भी खत्म हो जाएगी। यानी कुमारस्वामी सरकार का गिरना और बीजेपी सरकार का बनना अब हर हाल में तय लगता है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और उन्हें आजकल विभिन्न न्यूज चैनलों पर बहस करते हुए देखा जा सकता है।)

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