सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइस : कश्मीर घाटी के अराजनीतिकरण का बॉलीवुड का एक और प्रयास 

सिनेमा में जब कश्मीर को दिखाना होता है तो, बॉलीवुड या तो संघर्ष का गलत चित्रण करता है या फिर घाटी की खूबसूरती का रूमानीकरण करता है।

कश्मीरी लोग भारतीय चिंताओं या फिर भारतीय मसीहापन के प्रतीक होते हैं – जैसे हिंसक कश्मीरी पुरुष, जिसे मिटा देना जरूरी है –  या फिर कमजोर कश्मीरी औरतें जिन्हें बचाया जाना जरूरी है। 

दानिश रेंज़ू की नई फिल्म ‘सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइस’ इसी चश्मे से कश्मीरी कहानियों का खोखली कला के जरिए अराजनीतिकरण और खंडन करती है।

ऐमज़ान प्राइम पर दिखाई जा रही सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइस एक युवा कश्मीरी औरत ज़ेबा (सबा आजाद) की कहानी बताती है जो पारंपरिक परवरिश और पितृसत्ता को हराकर कश्मीर की “बुलबुल” बनती हैं।

फिल्म की शुरुआत होती है शोधकर्ता रूमी (तारुक रैना) से, जो 1950 में कश्मीर में हर घर में जाने जानी वाली गायिका ज़ेबा अख्तर के नूर बेगम बनने के सफर की भुला दी गई कहानी का दस्तावेज़ीकरण करना चाहता है।     

जैसा कि होता है, ज़ेबा को एक रूढ़िवादी परिवार से बताया जाता है। उनके पिता एक दर्जी (बशीर लोन) हैं और मृदुभाषी कश्मीरी पुरुष हैं और अपनी बेटी का साथ देते हैं। उनकी मां (शीबा चड्ढा) रूढ़िवादी और पारंपरिक महिला दर्शाई गई हैं जो अपनी बेटी के लिए रिश्ता देख रही हैं। 

ऐसे परिवार के लिए, अपनी बेटी को पेशेवर गायिका के तौर पर देखने की बात भी कल्पना से परे है। लेकिन अपने पिता के समर्थन से ज़ेबा नूर का उपनाम रखती है ताकि रूढ़िवादी समाज में गायक के रूप में पहचानी न जाए। और इस तरह उसे उड़ने के लिए जैसे पंख मिल जाते हैं। 

जब एक सम्मानित संगीत शिक्षक (शिशिर शर्मा) ज़ेबा की आवाज एक विवाह समारोह में सुनता है तो वह उसे गुप्त रूप से प्रशिक्षित करता है। वह उसे रेडियो कश्मीर की प्रतियोगिता में भेजता है जहां वह लंदन से लौटे एक शायर आजाद (जैन खान दुर्रानी) से मिलती है।

जब बाद में ज़ेबा\नूर को सार्वजनिक रूप से गाने पर शर्मसार किया जाता है तो आजाद उसके मुक्तिदाता के रूप में आगे आकर उससे शादी करता है। 

आजाद उसे ‘इंकलाब’ के नाम से पुकारता है।  

एक औरत को उसकी आजादी मिलती है और वह एक बड़ी शख्सियत बनती है। कश्मीर में नारीवादी जीत की एक मर्मस्पर्शी कहानी! 

लेकिन समस्या यहाँ है। 

जो कश्मीर को और इसके इतिहास को जानते हैं। नूर के उत्थान को एक सशक्त औरत की  संगीतमय कहानी के रूप  में पेश कर कश्मीरी राजनीति से अलग करने की चुपचाप कोशिश करती फिल्म उन्हें विचलित करती है। 

ज़ेबा/नूर बेगम वास्तव में कश्मीरी गायिका राज बेगम की कहानी है जो पचास के दशक में स्टार बनी थीं। ओपनिंग क्रेडिट्स से पहले फिल्म कहती है कि यह “उनके गीतों” से प्रेरित है। 

लेकिन उनके लिए जो कहानी की पुनर्रचना की गई है (फिल्मकार को ऐसा करने का अधिकार है),  बनावटी और चालाकी से भरी है। 

राज बेगम कौन थीं?

राज बेगम 1927 में बटामालू और झेलम नदी के बीच फंसे श्रीनगर के मगरमल बाग इलाके में पैदा हुई थीं। 

कश्मीर में डोगरा शासन था और वह कठिन समय था। कश्मीरी महिलाओं के लिए गायन सम्मानजनक नहीं माना जाता था। 

श्रीनगर के मैसूमा में रहने वाली हाफ़िज़ह जैसी तवायफें अमीरों के लिए गाती थीं पर समाज उन्हें अश्लील मानता था। 

ऐसी दुनिया में, श्रमिक वर्ग से आने वाली एक लड़की का सार्वजनिक रूप से गाना बहादुरी का कार्य था। फिल्म में बेगम के सफर को कश्मीर में पितृसत्ता और सामाजिक रूढ़िवादिता के खिलाफ संघर्ष के रूप में दिखाया गया है।

बेगम ने शादियों में गाने से शुरुआत की फिर एक दिन किसी ने उनकी आवाज पहचान ली। उस समय तवायफों का दौर खत्म हो रहा था, महिला गायकों के लिए नई जगह बन रही थी, इन हालत से बेगम को फायदा मिला। 

उनकी प्रतिभा के साथ साथ, उस समय ऐसी बातें हो रही थीं, जिनसे उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिली। 

1944 में शेख अब्दुल्लाह के नया कश्मीर घोषणापत्र ने भूमि सुधार, महिलाओं की शिक्षा, समान वेतन और मताधिकार के वायदे किए। प्रधानमंत्री के रूप में अब्दुल्लाह दमनकारी भी थे और कश्मीरियों ने भारत में शामिल होने के उनके समर्थन को स्वीकार करने से मना किया था। 

इसलिए उन्होंने गीतों और शायरी का इस्तेमाल लोगों को साथ लाने और कश्मीर के लिए एक पहचान बनाने के लिए ध्यान भटकाने की नीति के रूप में किया। 

जब रेडियो कश्मीर ने गायकों की ऑडिशनिंग शुरू की, बेगम आईं और जल्द ही उनकी आवाज घाटी में “बदलाव” के प्रतीक के रूप में गूंजने लगी।

लेकिन जल्द ही हालात बदले। 

1953 में, अब्दुल्लाह को सत्ताच्युत किया गया और कश्मीर ने दमन के दूसरे दौर में प्रवेश किया। मिर्जा अफजल बेग द्वारा गठित प्लीबिसाइट फ्रन्ट ने कश्मीर के भविष्य को लेकर रायशुमारी की मांग की लेकिन इसके सदस्यों को जेल में बंद किया गया, यातनाएं दी गईं और चुप कराया गया। 

यह राजनीतिक अभियान लगातार मुश्किलों में फँसता गया। 

इस बीच, बेगम का सितारा बुलंद हो गया। 

जैसा कि बॉलीवुड की रीत है, दानिश रेंज़ू की सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइस कश्मीरी कला का अराजनीतिकरण करने वाली भारतीय फिल्मों की परंपरा की एक और कड़ी ही है। 

फिल्म दिखाती है कि बेगम ने एक शायर से शादी की, जिसने उन्हें बचाया था और उनके करिअर में मदद की थी, लेकिन वास्तव में, बेगम ने कश्मीर में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से शादी की, जो सांस्कृतिक विभाग का प्रमुख था। 

उनका नाम कादिर गंदेरबली था और उनका विभाग ही कश्मीर में भारतीय राष्ट्रीयता और अखंडता का लाउड्स्पीकर बना था।

बेगम के कलात्मक करिअर को आगे बढ़ाने के अलावा, गंदेरबली भारत विरोधी दिखने वालों या यूएन जनमत संग्रह की मांग करने वालों को यातनाएं देने के लिए कुख्यात थे। 

बेगम की  गंदेरबली से शादी – जो एक तरह से सत्ता का ही एक अंग था – ने उन्हें सत्ता के उस ढांचे से बांध दिया जो न सिर्फ कश्मीर में मानव अधिकार उल्लंघन करता था बल्कि उसे ढंकने के लिए कला का इस्तेमाल भी करता था। 

उनकी शानदार प्रतिभा के बावजूद, वह कश्मीर में आर्टवाशिंग का एक जरिया थीं। 

यहाँ भी सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइस झूठ के जाल से भाग नहीं सकती। 

फिल्म में जिस शायर को बेगम की मदद करते दिखाया गया है, वह किरदार एक ऐसे अभिनेता ने किया है जिस पर हकीकत में शारीरिक शोषण के आरोप हैं। 

फ़िल्मकारों का कश्मीरियों के उत्पीड़न में गंदेरबली की भूमिका हटाकर बेगम के मुक्तिदाता का रोल ऐसे अभिनेता से करवाना जिस पर शारीरिक शोषण का आरोप हो,  सड़ांध दर्शाता है। 

कश्मीर का भारतीयकरण 

स्थानीय लोगों की कीमत पर एक वैयक्तिक नारीवादी जीत की कहानी बताने की कोशिश पुरानी उपनिवेशी रणनीति है। 

भारत में यह अंग्रेज, अफगानिस्तान में अमरीका और कश्मीर में भारत इस्तेमाल कर चुका है। 

लेकिन निर्देशक रेंज़ू बाहरी नहीं हैं। वह कश्मीरी हैं।

कहानी को सच्चाई की जमीन पर तैयार करने के बजाय, वह जो संस्करण पेश करते हैं वह भारतीय आँख या फिर कश्मीरी एलिट, वह विशेषाधिकार सम्पन्न लोग जो कश्मीर को केवल सौन्दर्यबोध से , पोस्टकार्ड के रूप में देखते हैं, के लिए बना है। 

यह एक गहरे सवाल को जन्म देता है : कश्मीरियों की कहानियों के लिए किस पर भरोसा किया जा सकता है?

दशकों से, भारतीय सिनेमा ने कश्मीर को रोमांस, पहाड़ियों, हिंसा अथवा रूढ़िबद्ध धारणाओं तक सीमित किया है, लोगों की बात नहीं की। 

कश्मीरियों को शायद ही अपनी पहचान और इतिहास के साथ दिखाया गया हो। उनका अस्तित्व लंबे, पीड़ादायक इतिहास, सैन्यीकरण और संघर्ष से बना है। 

लेकिन कश्मीरी संस्कृति के प्रतिनिधित्व के सवाल पर भी फिल्म सही तरीके से दिखाने में विफल रही है। 

एक दृश्य में जहां आजाद अपनी एक रिश्तेदार को बताता है कि कैसे बेगम महिलाओं के लिए संगीत की जगह बदल रही हैं, वह झील की तरफ देखते हुए कहती हैं : श्रीनगर की हवा ही कुछ और है – आजाद हवा।”

वह आगे कहती हैं कि वह जानती थीं कि महिलायें ही कश्मीर को बदलेंगी। 

इस एक संवाद में श्रीनगर के भारतीयकरण और आजादी का अर्थ बदलने के प्रयास स्पष्ट है। 

कुछ दृश्यों के बाद, रेडियो पर जब उनका परिचय दिया जा रहा है, उन्हें “आजादी की आवाज, घाटी की आवाज” बताया जाता है। 

आजादी के लिए कश्मीर की पुकार को नरम, अराजनीतिक, लगभग सौम्य जैसी किसी चीज में बदल दिया गया है। 

लेकिन कश्मीरियों के लिए आजादी कभी कोई खोखला नारा नहीं रही। 

इसी तरह, एक और दृश्य में, रात के भोजन में रिस्ते व्यंजन परोसा जाता है। 

बेगम भारतीय शोधकर्ता रूमी को उच्चारण सिखा रही है लेकिन वह खुद ठीक से नहीं बोल पाती और शब्द का भारतीय संस्करण पेश करती है। 

कहीं और, जहां लल्ल द्यद, नन्द ऋषि आदि  सूफी हस्तियों का जिक्र है, कलाकार सही तरीके से नाम नहीं बोलते। 

दिखने में यह मामूली सी लापरवाह भूलें प्रोडक्शन का खोखलापन दिखाती हैं। 

कश्मीर के बॉलीवुडकरण, जिसमें गायिका एक साफ-सुथरी किवंदती – संदर्भ के बिना आवाज – है,  उसके आसपास के किरदार केवल सौन्दर्यबोध के प्रतीक हैं। 

उनका डिस्क्लेमर कि फिल्म काल्पनिक है, नहीं चल सकता क्योंकि यह प्रचार कार्य है जिस पर भारत सरकार और सूचना विभाग की मुहर है, जिनका ओपनिंग क्रेडिट्स में आभार व्यक्त किया गया है।  

पिछले कुछ वर्षों से, खासकर 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से, एकीकृत करने की परियोजनाएं और सांस्कृतिक विलोपन के प्रयास  सतत हैं। 

वैसे इसमें भी कुछ नया नहीं है। 

इतिहासकारों ने बताया है कि कैसे ऐक्सेशन के बाद शेख अब्दुल्लाह और बक्शी गुलाम मोहमाद जैसे नेताओं ने सिनेमा का प्रचार – भारत में शामिल होने को सेंटीमेंटलाइज़ करने, खासकर मुस्लिम बहुसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए, के लिए इस्तेमाल किया। 

बॉलीवुड इसे जारी रखे हुए है, कभी कश्मीर को जन्नत के रूप में दिखाकर रूमानीकरण के जरिए और कभी इसे हिंसा स्थली के रूप में दिखाकर सनसनीकरण के जरिए।

अनुच्छेद 370 हटाने के बाद, राज्य के “कागज पर एकीकरण” का कश्मीरी महिलाओं की आजादी के रूप में भी विपणन किया गया था जबकि वास्तविक कश्मीरी महिलाओं की आवाज़ें बातचीत से हटा दी गईं। यह भी अपने आप में घिनौनी विडंबना है कि जब भारत समूचे कश्मीर का गला घोंट रहा है ऐसे में फिल्मकार ऐसी फिल्म बनाते और प्रदर्शित करते हैं जो “भुला दी गई” कश्मीरी आवाज की कहानी बताने का तरीका खोज रहे एक युवा भारतीय के बारे में है। 

‘सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइस’ बेगम के जीवन का गलत चित्रण ही नहीं है, बल्कि यह कश्मीर को सुरीली आवाजों और सांस्कृतिक उपलब्धियों की जमीन के रूप में बेचने का प्रयास है जबकि इससे वह राजनीतिक जमीन ही अलग कर दी गई है जहां से वह आवाज़ें उठती हैं। 

और जब फिल्म एक ऐसे प्रमुख अभिनेता को लेती है जिस पर प्रताड़ना के आरोप हैं और फिल्म को महिला सशक्तिकरण की कहानी करार देती है तो विडंबना की अनदेखी करना और भी मुश्किल हो जाता है। 

(नोट: गफिरा कादिर की इस फिल्म समीक्षा को लेकर दक्षिणपंथी ट्रोल कश्मीरी फिल्म पत्रकार की ट्रोलिंग कर रहे हैं, निशाना बना रहे हैं और धमका रहे हैं। नेटवर्क ऑफ वुमन इन मीडिया, इंडिया (एनडब्ल्यूएमआई) ने कादिर के साथ एकजुटता जताते हुए उन्हें प्रताड़ित किए जाने की निंदा की है। एनडब्ल्यूएमआई ने इसे पत्रकार की आवाज दबाने के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी के मूल्यों पर हमला करार दिया है। मिडल ईस्ट आई से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत)

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