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सरकार के संरक्षण में हो रही आदिवासियों के वनोपज की लूट

रायपुर (बस्तर)। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में प्रकृति ने आदिवासियों को इतनी संपदा दी है, जिसका उचित मूल्य ही अगर सरकार देती है तो आदिवासियों का आर्थिक आधार मजबूत हो जाएगा। जिसमें न तो लागत है और न ही प्रकृतिक के साथ कोई छेड़छाड़। कड़ी मेहनत कर जंगल से वनोपजों का संग्रहण कर अपना जीवन यापन करने वाले आदिवासियों से आवागमन का साधन नहीं होने के चलते सेठ-व्यापारी औने-पौने दाम में लूट रहे हैं।

आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का आर्थिक आधार जंगल में मिलने वाले वनोपज पर निर्धारित रहती है, लेकिन मौजूदा सरकारें उनके वनोपज का सही दाम तक नहीं देती हैं। स्थिति आज ऐसी है कि आदिवासियों को अपने वनोपज के बदले चावल, नमक, साबुन लेना पड़ता है। सरकारी वन समितियां तो बनी हैं, लेकिन समितियां एक या दो किलो कोई भी वनोपज ख़रीदती नहीं हैं। अपने दैनिक जीवन-यापन के लिए आदिवासी वनोपज को बिचौलिए-धन्ना व्यपारियों के पास वनोपज के बदले दैनिक समान ले लेते हैं।

वनोपज नीति का अभाव
देश में वन संपदा आदिवासी क्षेत्रों में ही सीमित रह गई है। इन वनों में ही वन्य जीव और वन शेष हैं, जबकि सरकार नए वन क्षेत्र विकसित करने के लिए कैंपा नामक योजना भी संचालित करती है। इस कैंपा फंड का दुरुपयोग करने की बात भी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है कि कई राज्य सरकारें इस मद से नए वनों का विस्तार कार्यक्रम में ध्यान नहीं दे रहे हैं। वहीं इस मद को अन्य कार्यों में लगा रहे हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराज़गी जाहिर की। वनोपज और आदिवासी एक सिक्के के दो पहलू हैं। परंतु खेद का विषय है कि आदिवासियों को वनोपज की वास्तविक मूल्य बाजार प्रसंस्करण उपलब्ध नहीं हो रही है, जिसका लाभ बिचौलिए उठा रहे हैं।

वनोपज के लाभ के लिए पंचायत राज अधिनियम का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम 1996 (पेसा) कानून में प्रयास किया गया, परन्तु राज्य सरकारें ईमानदारी से अमल नहीं कर रही हैं। इसके कारण वनोपज औने-पौने दाम पर बिचौलिए खरीद कर आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं। पेसा कानून में वनोपज का मूल्य निर्धारण करने का प्रावधान है, परंतु धरातल पर ऐसा कहीं नहीं हो रहा है, क्योंकि राज्य सरकार जिला वनोपज सहकारी समितियों का गठन कर राजनीतिक दलों के समर्थकों को पदाधिकारियों को बिठा दिया जाता है।

इन्हें पेसा कानून की जानकारी ही नहीं होती है। स्वाभाविक तथ्य है कि संचालन सिफर रह जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि जिला यूनियन समिति को उस जिले की सभी ग्राम सभाओं से राय मशविरा कर संग्रहण, प्रसंस्करण, मूल्य निर्धारण करना चाहिए ताकि आदिवासियों को गांव में ही रोजगार की व्यवस्था के साथ मूल्य का लाभ मिल सके जो कि हो नहीं रहा है।

प्रसंस्करण उद्योगों की अपार संभावनाए
पेसा कानून की मुख्य अवधारणा मावा नाटे मावा राज है। यह फलीभूत नहीं हो रही है। कारण पेसा कानून के प्रावधानों का अमल प्रशासन द्वारा नहीं किया जाना है। अनुसूचित क्षेत्रों में वनोपज तथा परंपरागत कृषि उत्पाद से संबंधित प्रसंस्करण उद्योगों की अपार संभावनाएं हैं, जबकि इन क्षेत्रों की संभावनाओं पर अब तक ईमानदारी से अध्ययन और कार्ययोजना तैयार नहीं हुई।

अभी तक सिर्फ जिला यूनियनों के द्वारा तेंदू पत्ता खरीद की जाती है, लेकिन अन्य बहुतायत वनोपज कोसा, चार, हर्रा, बेहड़ा, महुआ, टोरा, साल बीज, साल गोंद, इमारती लकड़ी, वनोषधि और अन्य उत्पादों के साथ ही परंपरागत कृषि उत्पाद रागी, मड़िया, कोदो, कुटकी, झिरा, धान की देशी नस्ल जो कि कई बीमारियों में हाई प्रोटीनेटेड और अन्य गुणात्मक धान्य हैं, के बारे में कोई अध्ययन व कार्ययोजना नहीं है। इनका परंपरागत उपयोग आदिवासी हजारों साल से आज भी करते आ रहे हैं।

वनोपज की आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान है। जैसे कि बस्तर संभाग से ही एक साल में कोसा का 30 से 40 करोड़ का व्यापार बिचौलियों द्वारा किया जाता है, जबकि कोसा उत्पाद के लिए प्रशासन द्वारा लघु प्रशिक्षण प्रदान कर प्रत्येक गांव में आदिवासियों को देकर कोसा कीड़ो का वितरण करने की व्यवस्था की जाए तो यह 40 करोड़ का व्यवसाय 400 करोड़ की संभावना है। वह भी कोई ज्यादा लागत के तथा पर्यावरण को बिना क्षति के ऐसे ही बहुत सारे वनोपज पर अपार संभावनाएं हैं।

सरकार इन क्षेत्रों में पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले उद्योग की स्थापना पर जोर दे रही है। ऐसे उद्योगों के लिए अनुसूचित क्षेत्र में जमीन उपलब्ध नहीं है, तथा प्रशिक्षित उम्मीदवारों की कमी है। ऐसे में आदिवासियों को ऐसे उद्योगों से लाभ कम ही होता है, जिसके कारण सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। राज्य सरकारों को अनुसूचित क्षेत्र की वास्तविक विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए वहां के निवासियों के अनुरूप ही उद्योगों का विकास करना चाहिए।

सड़के नहीं इसीलिए परिवहन के साधन नहीं
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में ज्यादातर आवगमन के साधन नहीं होते हैं, क्योकि इन क्षेत्रों में सरकार अब तक सड़कें नहीं पहुंचा पाई है। कहीं-कहीं सड़कें हैं भी तो परिवहन के साधन नहीं हैं। आदिवासी ग्रामीण वनोपज बेचने के लिए पैदल सफर करते हैं। छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के पंडरिया ब्लॉक की बात करें तो सराहापथरा, तेलियापानी, लेदरा पंचायत के आदिवासी ग्रामीण कुइकुकदूर 30 किमी पैदल सफर कर वनोपज बेचने आते हैं।

कांदावानी, बिरहुलडीही पंचायत के अन्तर्गर्त 18 गांव आते हैं जो 20 किमी सफर कर नेऊर वनोपज बेचने आते हैं। व्यापारी वनोपज महुवा के बदले चावल या कनकी देते हैं, जैसे एक किलो महुवा का एक किलो चवाल। वहीं देखा जाए तो सरकार ने महुवा पर 22 रुपये प्रति किलो समर्थन मूल्य निर्धारित कर रखा है। दूसरी तरफ चावल दो रुपये किलो में मिलता है। मतलब ग्रामीण 44 किलो चावल खरीद सकता है। यही नहीं शासन की महत्वपूर्ण योजना सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाला चावल लेने के लिए भी आदिवासी अपना बहुमूल्य वनोपज लैंप्स प्रबंधकों को देकर चावल लेने को मजबूर हैं।

तेलियापानी ग्राम की आदिवासी महिला दशमी बाई कहती हैं कि सरकार द्वारा बनाया गया वन समिति में वो अपने जंगल से संग्रहण किया हुआ वनोपज नहीं बेचती हैं, क्योंकि सरकार खरीदने के बाद तत्काल पैसा नही देती है। सरकार चेक के माध्यम से पैसा देती है, जिसके लिए मीलों दूर सफर कर बैंक के चक्कर काटना पड़ता है। उन्हें दैनिक जरूरतों के लिए तत्काल पैसों की जरूरत होती है। दैनिक जीवन-यापन के लिए वह व्यपारियों को वनोपज बेच देती हैं या वनोपज के बदले दैनिक उपयोग के सामान अदला-बदली करा लेती हैं।

सरकार ने दो तरह के वनोपज संग्रहण अथवा खरीदने पर मूल्य निर्धारित किया है। पहला राष्ट्रीकृत जिसे सिर्फ सरकार ही खरीद सकती है, जिसके अन्तर्गत कुल्लुगोंद अथवा तेंदु पत्ता आता है। वहीं गैरराष्ट्रीकृत, जिसे सरकार अथवा व्यापारी दोनों खरीद सकते हैं जो लघु वनोपज अन्तर्गत आते हैं। इसमें चार, टोरा, इमली, साल बीज, लाख इत्यादि आते हैं। आदिवासी जिनका संग्रहण करते हैं। जो उनकी प्राकृतिक संपदा है और जिसके वो मालिक हैं।

उत्तर बस्तर कांकेर के आदिवासी ग्रामीण नोहर मांडवी कहते हैं कि मेरे पास पुश्तैनी चार महुवा पेड़, तीन इमली पेड़ हैं। इसके अलावा और भी प्राकृतिक वन श्रोत हैं। अगर इसके उचित दाम सरकार देती है तो उनके परिवार का आर्थिक आधार मजबूत होगा, लेकिन अभी वह बिचौलिए व्यापारियों को कम दाम में बेच देते हैं।

(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

This post was last modified on January 24, 2020 3:51 pm

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