आदिवासियों के सामाजिक-धार्मिक प्रतीक चिन्हों का राजनीतिक उपयोग नामंजूर: आदिवासी समाज

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रांची में आदिवासी सरना धर्म संरक्षण समिति के साथ विभिन्न सरना समितियों, आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक बैठक हुई। इस बैठक में प्रमुखता से प्रकृति पूजक आदिवासी सरना समाज पर किये जा रहे हमले और सरना झंडा, सरना धर्म से जुड़े प्रतीकों/ चिन्हों का दुरुपयोग करने को लेकर एक वृहद चर्चा की गई। सभी समितियों-आदिवासी संगठनों और आदिवासी बुद्धिजीवियों-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जोर देकर सरना धर्म और आदिवासी समाज को वैचारिक रूप से मजबूत करने और इसके लिए आदिवासी सरना जन समुदाय को एकजुट करने पर जोर दिया।

इस अवसर पर उपस्थित जन समुदाय को संबोधित करते हुए आदिवासी चिंतक व आदिवासी बुद्धिजीवि लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि प्रकृति पूजक आदिवासी सरना धर्मावलंबियों को अंदर और बाहर दोनों तरफ से किये जा रहे हमले को पहचानना होगा। आज यह समाज चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है। आदिवासियों के जंगल, जमीन और उनके सम्मान पर सदियों से चोट पहुंचाया जा है।

मुंडा ने कहा कि हमारी प्रकृति में आस्था, विश्वास, पहचान और धर्म सब पर चोट किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों के समय में भी वर्ष 1871 से लेकर 1951 जनगणना प्रपत्र में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड का कालम था। लेकिन भारत को आजाद होने और भारतीय संविधान बनने के बाद धर्म कोड का कालम जनगणना प्रपत्र से 1961 में हटा दिया गया। यह इस देश के आदिवासी समुदाय पर भारत सरकार का सबसे बड़ा हमला था।

सरना सदान मूलवासी मंच के अध्यक्ष सूरज टोप्पो ने कहा कि आज सरना धर्म, इसके झंडे और इसके प्रतीकों/चिन्हों को बचाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक कार्यक्रमों और विभिन्न जगहों पर सरना झंडा, कलशा और रंपा-चंपा जैसे धार्मिक प्रतीक चिह्नों का दुरुपयोग किया जा रहा है। टोप्पो ने कहा कि राजनीतिक कार्यक्रमों, राजनेताओं – अधिकारियों के स्वागत सम्मान में आदिवासी महिलाओं को हमारा पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति गलत है। आदिवासी महिलाओं को अपने परब त्यौहारों और अपने लोगों के बीच ही पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति करनी चाहिए।

कांके रोड सरना समिति के अध्यक्ष डब्लू मुंडा ने कहा कि आदिवासी सरना समुदाय की धार्मिक सामाजिक भावनाओं से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बैठक में निम्नलिखित प्रस्तावों को आदिवासी समुदाय के बीच लागू करने के लिए जागरुकता अभियान चलाने पर सहमति बनी।

जिसमें-

● सामुदायिक/सार्वजनिक जगहों पर किसी भी तरह की धार्मिक-सांस्कृतिक और जमीन की अतिक्रमण पर रोक लगाया जाएगा।

● प्रकृति पूजक सरना धर्मावलंबी आदिवासी समुदाय के धार्मिक झंडे और इसके चिन्हों /प्रतीकों जैसे रंपा-चंपा, कलशा का प्रयोग किसी भी राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों और अवांछित जगहों जैसे किसी भी राजनेताओं- अधिकारियों के सम्मान और स्वागत में नहीं किया जाएगा।

● प्रकृति पूजक सरना आदिवासियों की धार्मिक सामाजिक समुदाय के कायों के लिए चिन्हित जमीन जो किसी गांव-टोले की जमीनों, पहाड़, टोंगरी, नदी, जंगलों में वर्षों से स्थापित है। इससे सुरक्षित किया जाएगा।

● प्रकृति पूजा सरना आदिवासियों की धार्मिक सरना झंडे का प्रयोग गैर आदिवासियों द्वारा नहीं किया जाए।

● प्रकृति पूजक सरना आदिवासियों के विभिन्न गांव टोलों में सरना झंडे का दुरुपयोग और ग़लत इस्तेमाल किये जाने के खिलाफ जन जागरण अभियान चलाया जाएगा।

कार्यक्रम में विभिन्न आदिवासी संगठनों के आदिवासी समन्वय समित, सरना सदान मूलवासी मंच, कांके रोड सरना समिति, केन्द्रीय सरना समिति (बबलू मुण्डा), केन्द्रीय सरना समिति (फूलचन्द तिर्की), प्रदेश राज़ी पडहा प्रार्थना सभा, रांची महानगर सरना प्रार्थना सभा, वीर बिरसा मुंडा स्मारक समिति, 22 पड़हा ग्रामसभा लेम, केन्द्रीय पड़हा समिति सुतितांम्बे, बिरसा सेना एवं आदिवासी युवा शक्ति आदि आदिवासी जन संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से लक्ष्मीनारायण मुंडा, सूरज टोप्पो, जगलाल पहान, बबलू मुण्डा, फुलचन्द तिर्की, रवि तिग्गा, बल्कू उराँव, सोनू खलखो, डब्लू मुंडा, अशोक मुण्डा, अमित मुण्डा, मिथिलेश कुमार, चंम्पा कुजूर, तानसेन गाड़ी, दिनकर कच्छप, दरिद्र चंद्र पहान, साधुलाल मुंडा, मोहन तिर्की, साधुलाल मुंडा, बिक्की करमाली, मोहन तिर्की, मिथलेश कुमार, सुरेश मिर्धा, जगेश्वर मुंडा, अशोक पहान, राकेश मुण्डा, राजेश पाहन, योगेन्द्र उरांव, राजेश पाहन, सुनील होरो, एतवा मुंडा, लक्ष्मण मुंडा, हरिलाल मुंडा, रोपना मुंडा, लक्ष्मण मुंडा, शशि मुंडा, संजय मुंडा आदि लोग उपस्थित थे।

(झारखंड से विशद कुमार की रिपोर्ट)

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