एक विशेष अदालत ने ने शनिवार को एल्गार परिषद-भीमा कोरेगांव मामले के चार आरोपियों – तेलुगु कवि-कार्यकर्ता पी वरवर राव, वकील-कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और कार्यकर्ता वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा – की ज़मानत रद्द करने की एनआईए की अर्ज़ी खारिज कर दी। इन पर इस साल की शुरुआत में मुंबई प्रेस क्लब में एक कार्यक्रम में शामिल होने का आरोप था।अदालत ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि जिस सभा में वे शामिल हुए थे, उसका मकसद सीपीआई (माओवादी) विचारधारा का प्रचार करना या “अर्बन नक्सल” आंदोलन को आगे बढ़ाना था।
स्पेशल जज चकोर एस. बाविस्कर ने शनिवार को चार अलग-अलग आदेशों में कहा कि 19 जनवरी की सभा के सीसीटीवी फुटेज में आरोपी और सह-आरोपी तो मौजूद दिखे, लेकिन उसमें कोई ऑडियो नहीं था, जिससे यह पता लगाना नामुमकिन था कि उन्होंने क्या बातचीत की। साथ ही, सभा के “माहौल, मिज़ाज और कुल मिलाकर स्थिति” और आरोपियों की बॉडी लैंग्वेज को देखते हुए, यह नतीजा निकालना मुश्किल था कि उन्होंने उन गंभीर मुद्दों पर चर्चा की जिनका आरोप लगाया गया था।
एनआईए का आरोप था कि इन चार लोगों ने सीपीआई (माओवादी) विचारधारा का प्रचार करने और “अर्बन नक्सल” आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए एक सभा में सक्रिय रूप से भाग लिया था। प्रेस क्लब की जांच रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर, एजेंसी ने तर्क दिया कि इस भागीदारी से सह-आरोपियों के साथ बातचीत न करने की ज़मानत शर्तों का उल्लंघन हुआ है, और उसने उनकी तुरंत गिरफ्तारी और ज़मानत रद्द करने की मांग की।
खुली अदालत में आरोपियों, उनके वकीलों और एनआईए के सरकारी वकील के सामने पूरा फुटेज दिखाए जाने के बाद, जज ने गौर किया कि वहां कई अन्य लोग भी मौजूद थे और कोई ऑडियो नहीं था। जज ने कहा, “इसलिए, यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि आरोपियों ने क्या बातचीत की।” उन्होंने आगे कहा कि अभियोजन पक्ष को अपने आरोप को “किसी तरह के स्वीकार्य सबूत” के साथ साबित करना होगा।
जज ने एनआईए के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि चारों का एक साथ मौजूद होना ही ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने सभा का आयोजन किया था या इसके लिए पहले या बाद में एक-दूसरे से संपर्क किया था। हो सकता है कि उन्होंने स्वाभाविक रूप से अपने मामले या सह-आरोपियों की परिस्थितियों पर चर्चा की हो, लेकिन सिर्फ़ इससे ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन साबित नहीं होता।
कोर्ट ने आरोपियों को भी चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें ज़मानत की शर्तों के बारे में पता था, इसलिए मुश्किलों और ज़मानत रद्द होने की अर्ज़ी से बचने के लिए, वहाँ दूसरे आरोपियों को देखकर उन्हें खुद को उस जगह से अलग कर लेना चाहिए था। ज़मानत पर रिहा लोगों को शर्तों का उल्लंघन न करने का ध्यान रखना चाहिए।
अदालत ने इस चेतावनी के साथ उनकी ज़मानत रद्द करने की एनआईए की अर्जी को खारिज कर दिया गया।
एनआईए ने सबसे पहले मई में राव और भारद्वाज की ज़मानत रद्द करने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, और जून में गोंसाल्वेस और फरेरा के खिलाफ भी ऐसी ही अर्ज़ियाँ दाखिल की थीं।
राव को अगस्त 2022 में मेडिकल आधार पर सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली थी; भारद्वाज को दिसंबर 2021 में बॉम्बे हाई कोर्ट से ज़मानत मिली थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। गोंसाल्वेस और फरेरा, जिन्हें अगस्त 2018 में गिरफ्तार किया गया था और लगभग पाँच साल जेल में रहना पड़ा था, उन्हें जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट से रेगुलर ज़मानत मिली। सभी पर कुछ शर्तें लागू थीं, जिनमें सह-आरोपियों या ऐसी ही गतिविधियों में शामिल लोगों के संपर्क में आने पर रोक शामिल थी।
यह मामला 1 जनवरी 2018 को पुणे ज़िले में भीमा कोरेगाँव युद्ध स्मारक के पास हुई हिंसा से जुड़ा है, जो उस लड़ाई की 200वीं बरसी के दौरान हुई थी। जाँचकर्ताओं का आरोप है कि 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवार वाडा में एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों ने हिंसा को बढ़ावा दिया और इसे प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) से जोड़ा।बाद में एनआईए ने पुणे पुलिस से जांच अपने हाथ में ले ली।
(जनचौक ब्यूरो)