‘लापता’ मंत्रिमंडल और पकोड़े का ‘ब्रह्म ज्ञान’

रात का घोर सन्नाटा था। राजा विक्रम ने श्मशान के पेड़ से उस लाश को उतारकर अपने कंधे पर लाद लिया। जैसे ही विक्रम आगे बढ़ा, लाश के भीतर बैठे बेताल की कर्कश हंसी गूंज उठी।

`हा हा हा हा हा…’ उसकी भयानक हंसी ने रात के सन्नाटे को और भी भयानक बना दिया। पेड़ों पर सोए हुए पक्षी अचानक जाग उठे और फड़फड़ा कर डर से शोर मचाने लगे। राजा ने उसकी तरफ कहर भरी नजरों से देखा।

बेताल बोला उठा, `राजन! तेरा साहस सराहनीय है, लेकिन तेरी राजनीति समझ से परे है। चल, राह लंबी है तो तुझे `कलियुग’ की एक कथा सुनाता हूं। ध्यान से सुन! लेकिन तू बोल तो मैं चला जाऊंगा।’

`एक देश था, जंबूदीप में। जहां `संसद’ नाम का एक पवित्र मंदिर था। नियम था कि जब मंदिर के द्वार खुलेंगे तो देश के बड़े-बड़े `प्रधान’ और `मंत्री’ वहां बैठकर जनता के दुखों का निवारण करेंगे। लेकिन राजन, दृश्य अद्भुत था!’ `संसद का सत्र चल रहा था, मगर गृह प्रधान पंजाब की गलियों में धूल उड़ा रहे थे।

प्रधान सेवक असम और बंगाल की गलियों में रैलियां कर रहे थे। परराष्ट्र प्रधान दूरध्वनि यंत्र पर अटके थे, एक प्रधान जिन पर देश की रक्षा का भार था नवाबों के शहर में खोए थे और परिवहन प्रधान अपने नए महल के `गृहप्रवेश’ में व्यस्त थे। हद तो तब हुई, जब तैल-प्राकृतिक-गैस प्रधान ने कह दिया कि उनके पास संसद जाने लायक `चेहरा’ ही नहीं बचा!’

`उधर, विपक्ष का एक `राजकुमार’ जब संसद की खाली कुर्सियों से थक गया तो वह मुख्य द्वार पर बैठकर पकोड़े खाने लगा। बस फिर क्या था! पूरे देश के ‘प्रधान सेवक’ भक्त पकोड़े खाने के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और इसे `राष्ट्रीय अपराध’ घोषित कर दिया।’

बेताल रुका और विक्रम की आंखों में झांकते हुए पूछा,

`अब बता राजन! मेरा प्रश्न यह है जब `प्रधान’ ने खुद पकोड़े तलने को `परम रोजगार’ बताया था तो उसे खाने वाले का विरोध करना क्या मूर्खता की पराकाष्ठा नहीं है?’

`और क्या विपक्ष को खाली कुर्सियों से सिर पटककर सवाल पूछना चाहिए?’

`सबसे बड़ा रहस्य यह कि ये लोग 2014 से पहले ही `रचनात्मक’ थे या उसके बाद किसी विशेष शोध का परिणाम हैं?’

`राजन तू तो बड़ा ज्ञानी है, न्याय प्रिय…जल्दी बोल राजन…अगर उत्तर जानते हुए भी तू नहीं बोला तो तेरा सिर फट जाएगा’

राजा विक्रम बोले, `हे बेताल! उत्तर स्पष्ट है। राजनीति में जब `सिंहासन’ जिम्मेदारी से भागकर `चुनावी रैलियों और बड़-बोलेपन’ की शरण लेता है तो संसद केवल एक खाली इमारत रह जाती है।’

`अब रही बात पकोड़े की तो जब ज्ञान दिया गया है कि पकोड़ा तलना `रोजगार’ है, उसे खाना `देशभक्ति’ होनी चाहिए! लेकिन यहां विरोध पकोड़े का नहीं, बल्कि पकोड़ेरूपी `दरपण’ का है। पकोड़ा खाना दरअसल सत्ता के उस वादे की याद दिलाता है, जिसे वे अब भूलना चाहते हैं। और जहां तक उनके `रचनात्मक’ होने का सवाल है, यह `सत्ता का नशा’ है जो 2014 के बाद’ अहम् ब्रह्मास्मि’ हो गया है।’

बेताल बोला, `सही कहा राजन! लेकिन तूने मौन तोड़ा, इसलिए मैं चला!’

इतना कहते हुए बेताल राजा के कंधे से उड़ता चला गया और ठहाका मारते हुए वापस पेड़ पर लटक गया।

– नहमोनम

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