रात का घना सन्नाटा था। श्मशान की डरावनी खामोशी को चीरते हुए राजा विक्रम ने एक बार फिर पेड़ से उस लाश को उतारा और अपने कंधे पर लादकर चलने लगे। तभी लाश के भीतर छिपे बेताल ने अपनी आँखें खोलीं और उसकी कर्कश हंसी ने जंगल को और भी भयानक बना दिया।
बेताल बोला, “राजन! तुम थकते नहीं? और मेरी शर्त के मुताबिक तुम बोलते भी नहीं! इस मौन के साथ मुझे ढोना तुम्हारी नियति है या मजबूरी? तुम्हारे इस मौन पर मुझे एक किस्सा याद आया है, उन लोगों का, जिनके शब्द कभी अंगारे थे और आज बर्फ की तरह जम गए हैं। कहानी सुनो, तुम्हारी थकान भी मिटेगी और बुद्धि की परीक्षा भी होगी। पर याद रखना, जवाब जानते हुए भी चुप रहे, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा!”
किस्सा: गिरते रुपये और चढ़ती चुप्पी का
बेताल ने कहना शुरू किया, “राजन, एक महान देश था। वहां के कुछ ‘शूरवीर’ जब विपक्ष में थे, तो रुपये के 60 के स्तर पर पहुंचते ही छाती पीटकर स्यापा करते थे। एक प्रखर नेता कहते थे कि रुपया प्रधानमंत्री की उम्र से होड़ लगा रहा है, वह ‘आईसीयू’ में है। एक विदुषी महिला कहती थीं कि रुपये का गिरना ‘देश की अस्मत’ का गिरना है। एक योग गुरु दावा करते थे कि सरकार बदलते ही रुपया 40 पर आ जाएगा और पेट्रोल 35 रुपये में बिकेगा। यहां तक कुछ बुद्धिमान अभि’नेता’ ‘रुपीड’ जैसे शब्दों से तंज कसने से बाज नहीं आते थे।” कुछ तो यहाँ तक कहते थे कि शुक्र है कि उनके अंडरवियर का नाम डॉलर है रुपया नहीं…
अबकी बेताल फुसफुसाते हुए बोला, ‘अब काल का चक्र घूम गया है, राजन। वही शूरवीर अब सत्ता के सिंहासन पर विराजे हैं। रुपया 60 से फिसलकर 94 के पार चला गया है। लेकिन अब वही विदुषी महिला कहती हैं कि ‘रुपया गिर नहीं रहा, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है’। प्रखर नेता अब रुपये की सेहत पर मौन हैं और योग गुरु को अब पेट्रोल की कीमतों में कोई ‘रोग’ नजर नहीं आता। रुपीड अब सोशल मीडिया पर केवल विज्ञापनों तक सीमित है।”
“तो हे राजन! मेरा प्रश्न यह है कि जो 60 पर ‘देश का अपमान’ था, वह 94 पर ‘मजबूत अर्थव्यवस्था’ कैसे हो गया? क्या यह उनकी बुद्धि का विकास है या शुद्ध दोगलापन? जवाब दो राजन!
विक्रम ठिठके और गंभीर स्वर में बोले, “सुन बेताल! राजनीति में शब्द अक्सर ‘सिद्धांत’ नहीं, बल्कि ‘हथियार’ होते हैं। इस ‘मौन’ के पीछे तीन कड़वे सच छिपे हैं। पहला है अवसरवाद का व्याकरण। यानी जब व्यक्ति विपक्ष में होता है, तो वह आर्थिक आंकड़ों को भावनाओं के चश्मे से देखता है ताकि जनता को उकसा सके। 60 पर रुपया उसे ‘राष्ट्रीय गौरव’ दिखता था क्योंकि उसे कुर्सी चाहिए थी। आज 94 पर वही रुपया उसे ‘ग्लोबल मार्केट’ का हिस्सा दिखता है क्योंकि उसे अपनी कुर्सी बचानी है।
इसे ‘सत्ता का चश्मा’ कहते हैं, जो सच को सुविधा के अनुसार बदल देता है।”
“दूसरा है ‘सुविधाजनक राष्ट्रवाद’ है। बेताल, वे मशहूर हस्तियां और योग गुरु तब शोर मचाते थे क्योंकि तब शोर मचाना ‘सुरक्षित’ और शायद ‘लाभदायक’ भी था। आज चुप्पी साधना उनकी मजबूरी है। आज का तंत्र सवाल पूछने वालों को उनके पुराने ‘डिजिटल पाप’ याद दिला देता है। उनका राष्ट्रप्रेम तब रुपये की वैल्यू में था, आज उनका प्रेम सत्ता की नजदीकी में है।’
‘और तीसरी हकीकत है चरित्र के अवमूल्यन की…रुपये का गिरना एक आर्थिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन रुपये की गिरावट पर ‘बदलती हुई भाषा’ राजनेताओं के चरित्र के गिरने का प्रमाण है। 2013 का शोर ‘राजनैतिक निवेश’ था, और आज की चुप्पी ‘राजनैतिक ढोंग’ है। जब शासक खुद के बनाए पैमानों पर फेल होता है, तो वह ‘मौन’ की चादर ओढ़ लेता है।”
विक्रम ने अंत में कहा, “बेताल, रुपया तो बाजार की मार से गिरता है, लेकिन इन ‘शूरवीरों’ की नैतिकता अपनी ही कही बातों के बोझ तले गिर गई है। यही असली हकीकत है!”
बेताल हंसा और बोला, “अद्भुत राजन! तुमने गिरते रुपये और गिरते हुए तर्कों व खत्म होते जमीर के बीच का सूक्ष्म धागा पकड़ लिया। निःसंदेह तुम बुद्धिमान हो ।पर क्योंकि तुमने अपनी चुप्पी तोड़ दी, इसलिए मैं फिर से चला!”
बेताल अट्टहास करता हुआ पेड़ की ओर उड़ गया, और विक्रम तलवार खींचकर उसके पीछे फिर चल पड़े।
– नहमोनम