इक्कीसवीं शताब्दी में, जब बीसवीं सदी के विचार अपनी ऊर्जा खो चुके हैं, ठहरकर सोचने का साहस अपने-आप में एक असाधारण नैतिक और बौद्धिक पहल बन गया है। जहां बहसें हैं, शोर है, निष्कर्ष पहले से तय हैं, लेकिन विचार का धैर्य कहीं गुम हो गया है। इसी वैचारिक थकान और बौद्धिक जल्दबाज़ी के दौर में राजनीतिक विश्लेषक और भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव की किताब ‘गणराज्य का स्वधर्म’ किसी तात्कालिक विवाद का हिस्सा बनने के बजाय हमसे ठहरकर सोचने का आग्रह करती है।
उत्तर देने से पहले सवालों की जमीन तैयार करती है।
यह किताब इस अर्थ में विशेष है कि वह भारत की समकालीन स्थिति को न तो पश्चिम से उधार ली गई कसौटियों पर कसती है और न ही किसी पारंपरिक विचार को आँख मूँदकर अंतिम सत्य मान लेती है। लेखक का आग्रह है कि भारत को समझने का पैमाना भारत गणराज्य का अपना स्वधर्म होना चाहिए – वह स्वधर्म जो हमारी सभ्यता की स्मृति, राष्ट्रीय आंदोलन के अनुभव और संविधान की आत्मा के ऐतिहासिक संवाद से निर्मित हुआ है।
ऐसे समय में हमें एक बुनियादी सवाल के सामने खड़ा करती है – हम भारत को किस कसौटी पर परख रहे हैं?
राष्ट्रीय आंदोलन इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। वह केवल राजनीतिक आज़ादी का संघर्ष नहीं था, बल्कि समाज-सुधार, आर्थिक पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक आत्ममंथन का साझा प्रयत्न था। उसी मंथन से भारत गणराज्य का नैतिक–राजनीतिक स्वभाव आकार लेता है।
गणराज्य और गणतंत्र: एक जरूरी भेद
किताब का एक केन्द्रीय पहलू यह है कि वह गणराज्य और गणतंत्र के बीच के फर्क को फिर से स्थापित करती है। आमतौर पर लोग इन दोनों शब्दों को समान अर्थ में समझने की भूल करते रहे हैं, लेकिन लेखक बताते हैं कि आज के संकट को समझने के लिए इस अंतर को समझना ज़रूरी है।
योगेंद्र यादव लिखते हैं – “गणराज्य वह व्यवस्था है जहां सम्प्रभुता गण में निवास करती है – गणराज्य के लिए जरूरी है सम्प्रभुता का धारक और उसका धर्म- यानी जन, गण और मन। जन, यानी जनता जनार्दन। गण, यानी केवल जनसमूह नहीं बल्कि एक राजनीतिक समुदाय। और मन या जनमानस, यानी उस राजनीतिक समुदाय का अपना मानस हो, कुछ साझे सरोकार हों, आदर्श हों, भाव हों, मूल्यबोध हों। समान और सार्वभौमिक नागरिकता, आपसी जुड़ाव से पैदा हुई सामुदायिकता और एक साझी समझ गणराज्य होने की अनिवार्य शर्त हैं।”
गण की सम्प्रभुता सुनिश्चित करने के लिए एक व्यवस्था चाहिए-संविधान, कानून, मर्यादा और उसे लागू करने वाले लोग। इसी व्यवस्था का नाम गणतन्त्र है, लेकिन गणराज्य का प्राण जन-गण-मन में बसता है। यदि जनमानस से साझा मूल्य, सामूहिक सरोकार और नागरिक बराबरी का भाव गायब हो जाए तो तंत्र बचा रहकर भी गणराज्य खो सकता है।
अतः गणराज्य और गणतन्त्र में दुराव नहीं है। गणतन्त्र किसी भी गणराज्य का एक अनिवार्य अंग है। गणराज्य राज्यसत्ता का स्वरूप परिभाषित करता है तो गणतन्त्र उसके संवैधानिक और कानूनी तन्त्र को निरूपित करता है।
भारतीय स्वधर्म के तीन आधार स्तंभ
लेखक योगेंद्र यादव जिस स्वधर्म की बात करते हैं, वह न तो धार्मिक संकीर्णता है और न ही किसी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा। वह स्वधर्म को तीन खतरों से अलग करके समझाते हैं – परधर्म (दूसरों की नकल), अधर्म (पाखंड और कदाचार) और विधर्म (धर्म का विकृत रूप पेश कर वर्चस्व की राजनीति करना)। समकालीन भारत के संकट को समझने के लिए यह वर्गीकरण बेहद उपयोगी है, क्योंकि यह हमें यह पहचानने में मदद करता है कि समस्या केवल शासन की नहीं, बल्कि दृष्टि और मूल्यबोध की भी है।
स्वधर्म यहां एक नैतिक–राजनीतिक कसौटी है— जिसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि आज जो हो रहा है, वह भारत के लिए उचित है या नहीं। किसी देश की यात्रा को न तो किसी आयातित विचारधारा से परखा जा सकता है और न ही अपने-अपने आग्रहों के आधार पर। देश की दिशा और दशा को परखने का पैमाना उसका स्वधर्म ही हो सकता है। आज भारत गणराज्य के सामने सबसे बड़ा खतरा इसी विधर्म से है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि “भारतीय गणराज्य का स्वधर्म है – मर्यादा और लोक कल्याण पर आधारित लोकतंत्र। यह पश्चिमी मिजाज की लिबरल डेमोक्रेसी नहीं है। यहां जनता जनार्दन अपनी सम्प्रभुता मतदान के साथ सड़क और आन्दोलनों के मध्यम से भी अभिव्यक्त करती है। भारत गणराज्य ने संघवाद की धारणा और उसके ढांचे को कबूल किये बिना क्षेत्रीय स्वायत्तता और अकेन्द्रित सत्ता के विचार को मान्यता दी है।”
मैत्री, करुणा और विनय के त्रिवेणी संगम से उपजा भारतीय स्वधर्म
योगेंद्र यादव भारतीय गणराज्य के स्वधर्म को तीन सभ्यतागत सूत्रों में तलाशते हैं—मैत्री (सर्वधर्म समभाव), करुणा (समता) और विनय (लोकमर्यादा)। यही तीन मूल्य, भारतीय स्वधर्म की मूल संरचना बनाते हैं। लेखक का मानना है कि इन शब्दावलियों ने भारतीय सभ्यता के स्वधर्म को पहली बार परिभाषित किया।
इन तीनों आदर्शों में कम से कम तीन हज़ार वर्षों की भारतीय विचार-परंपरा का सार निहित है, लेकिन ये मूल्य अपने प्राचीन रूप में संविधान में यथावत् स्थानांतरित नहीं किए गए। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इनकी गहन छानबीन हुई, पुनर्व्याख्या हुई और आधुनिक यूरोप के विचारों से इनका सृजनात्मक संवाद स्थापित हुआ।
फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के उद्घोष को भारतीय मानस ने यांत्रिक रूप से नहीं अपनाया, बल्कि अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक संघर्षों और नैतिक परंपराओं के आलोक में समझा। इसी मंथन से लोकतंत्र, कल्याणकारी राज्य और सर्वधर्म समभाव की एक देसी, लेकिन आधुनिक अवधारणा विकसित हुई।
लेखक के अनुसार, मैत्री – जिसे आधुनिक भाषा में सर्वधर्म समभाव कहा गया – भारतीय सभ्यता की मूल संरचना का केंद्रीय तत्व रही है। भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ कभी केवल ‘रिलिजन’ नहीं रहा; वह नैतिकता, जीवन-दृष्टि और सामाजिक व्यवहार का स्रोत रहा है इसलिए यहां धर्मनिरपेक्षता का आशय धर्म से दूरी बनाना नहीं, बल्कि किसी एक पंथ के वर्चस्व को रोकना रहा है। यही कारण है कि संविधान के हिंदी पथ में प्रयुक्त ‘पंथ निरपेक्षता’ शब्द यूरोपीय ‘सेकुलरिज़्म’ से अधिक सटीक प्रतीत होता है।
भारतीय समाज की चुनौती चर्च और राज्य के टकराव की नहीं रही; हमारी चुनौती रही है—विविध आस्थाओं और समुदायों के बीच समभाव बनाए रखना। लेखक चेताते हैं कि “हमारी समस्या चर्च-राज्य सम्बन्ध की नहीं है। ‘सेकुलरवाद’ बिना वजह हमारी बातचीत में उस यूरोपीय संदर्भ को घसीट लाता है जिसका हमारी समस्या, उसके निदान से कोई लेना-देना नहीं रहा।
हमें किसी पोप, खलीफा या धर्मगुरुओं के राज का खतरा नहीं है इसलिए यूरोपीय काट के अनीश्वरवादी या सभी धार्मिक मामलों के प्रति आंख मूंदने वाले सेकुलर निजाम की हमें कोई जरूरत नहीं है।”
स्वधर्म का दूसरा सूत्र है करुणा, अर्थात समता। यह किताब उस आम धारणा को चुनौती देती है कि समता का विचार भारत में पश्चिमी समाजवादी आंदोलनों के माध्यम से आया। लेखक स्पष्ट करते हैं कि भारतीय समाज में असमानता और अन्याय का इतिहास रहा है -विशेषकर जाति-व्यवस्था के रूप में, जिसने गैर-बराबरी को स्थायी और वैचारिक आधार दिया। इस सच्चाई से मुँह नहीं चुराया जा सकता, लेकिन किसी सामाजिक व्यवस्था का अस्तित्व यह सिद्ध नहीं करता कि वही समाज का नैतिक आदर्श भी हो।
बौद्ध दर्शन, भक्ति और सूफ़ी परंपराएँ तथा स्वतंत्रता आंदोलन – इन सभी ने जाति-आधारित विषमता को एक स्वर में चुनौती दी। इस अर्थ में समता कोई आयातित विचार नहीं, बल्कि भारतीय स्वधर्म की नैतिक अनिवार्यता है -जिसके बिना स्वतंत्रता और लोकतंत्र दोनों अधूरे हैं।
तीसरा सूत्र है विनय— यानी लोकतांत्रिक मर्यादा। लेखक योगेंद्र यादव प्राचीन भारतीय गणराज्यों से लेकर आधुनिक भारत तक लोकतंत्र की एक विशिष्ट भारतीय परंपरा को रेखांकित करते हैं। भारत में लोकतंत्र किसी राजशाही या तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की सफलता से जन्मा। इसलिए यहाँ लोकतंत्र की आत्मा केवल संस्थाओं में नहीं, बल्कि जनता के व्यवहार, असहमति की संस्कृति और जन-आंदोलनों में निहित रही है।
भारतीय लोकतंत्र ने बहुमत के शासन को बहुसंख्यक वर्चस्व में बदलने से लंबे समय तक रोके रखा और विविधता के साथ लोकतंत्र का एक वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत किया। लेकिन जब लोकमत निर्माण की प्रक्रियाओं पर कब्ज़ा होने लगा, तब लोकतंत्र के भीतर से ही उसके क्षरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इमरजेंसी और बीते एक दशक-दोनों ही इस ‘लोकतांत्रिक दिखावे के भीतर लोकतंत्र की हत्या’ के उदाहरण हैं।
इन तीन सूत्रों के बाद लेखक चौथे सूत्र-देशाचार या संघीय भाव – की चर्चा करते हैं। भारत को संविधान ने ‘फेडरेशन’ नहीं, बल्कि ‘यूनियन ऑफ स्टेट्स’ कहा। यह शब्द चयन आकस्मिक नहीं था। भारत न तो पूर्णतः केंद्रीकृत राज्य है और न ही अमेरिकी अर्थों में संघीय। यहाँ एकता समरूपता से नहीं, बल्कि बहुलता की स्वीकृति से बनती है इसलिए भारत की एकता ना तो समरूपता की चाह रखती है, ना ही बहुलता का महिमामण्डन करती है।
भारतीय स्वधर्म का यह संघीय भाव सत्ता के विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वायत्तता और सांस्कृतिक विविधता के सम्मान पर आधारित है। एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति की राजनीति इस स्वधर्म के प्रतिकूल है। किसी भी रूप में वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास – चाहे वह भाषा का हो, धर्म का या सत्ता का – अधर्म की श्रेणी में आता है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि “राज्यसत्ता की इस बुनावट पर औपनिवेशिक राज ने आधुनिक राष्ट्र और राज्य की परत बिछायी। इसने हमारे समाज और राजनीतिक सत्ता के स्वरूप में बुनियादी बदलाव किये। बेशक भारत गणराज्य का औपचारिक स्वरूप एक राष्ट्र-राज्य की आधुनिक परिपाटी के मुताबिक चलता है, लेकिन व्यवहार में भारतीय सभ्यता की गहरी बुनावट ने आधुनिक राष्ट्र, प्रभुत्व सम्पन्न राज्य और लोकतान्त्रिक राजनीति का रूप-रंग बदल दिया है।
एकछत्र केन्द्रीयकृत प्रभुत्वशाली सत्ता हमारी सभ्यता का मिजाज नहीं है इसलिए व्यवहार में आधुनिक राज्य की शक्ति हमेशा मर्यादित रही है। अकेन्द्रित सत्ता, साझा प्रभुत्व और गठबन्धन आधारित शक्ति ही हमारे समाज का स्वधर्म रहा है। सरकार और समाज में सत्ता का बँटवारा हमारा स्वधर्म है। यहाँ सत्ता के स्वायत्त दायरे की जरूरत सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार के बीच नहीं बल्कि उसके बहुत नीचे पंचायत और मुहल्ला सरकार तक है। यहाँ राष्ट्रीय एकता बाकी सब भाषाई और क्षेत्रीय पहचान को खत्म करके नहीं बनती।
यहाँ की तमाम भाषाई संस्कृतियों की पहचान भारत से अलग नहीं है, भारत पर निर्भर भी नहीं है। दरअसल भारत की पहचान इन सब पहचानों को जोड़कर बनती है। देश के बँटवारे की पृष्ठभूमि में बनाये संविधान में संघ के राज्यों को कानूनी शक्तियाँ देने में कोताही की गयी, स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था बनाने में लापरवाही रही।
लेकिन इसमें कोई शक नहीं हो सकता कि भारतीय संघ की बुनियाद में वर्चस्व को नकारने वाला एक अलिखित समझौता है- केन्द्र सरकार, भाषा या साम्प्रदायिक लिहाज से बहुसंख्यक समाज या कोई भी सांस्कृतिक समुदाय अपना वर्चस्व स्थापित नहीं करेगा।
अगर यह हमारा स्वधर्म है तो जाहिर है वर्चस्व स्थापित करने की कोई भी कोशिश अधर्म कहलाएगी। अन्य भारतीय भाषाओं पर हिन्दी का वर्चस्व स्थापित करना, पंचायतों और नगरपालिकाओं को स्वायत्तता ना देना और अस्सी के दशक में राज्य सरकारों को केन्द्र का गुलाम बनाने के प्रयास अधर्म की मिसाल हैं। यहाँ परधर्म है अमेरिकी या सोवियत तर्ज पर एक संघ बनाने की कल्पना, जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है।
लेकिन यहाँ भी असली खतरा विधर्म से है। हमारी सभ्यता के मिजाज के खिलाफ जाकर एक देश, एक भाषा, एक धर्म, एक जाति की समझ के आधार पर राष्ट्रीय एकता को एकरूपता की तरह परिभाषित करना विधर्म की चुनौती है। ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ की समझ हमारे स्वधर्म का विलोम है।”
क्यों ज़रूरी है ‘गणराज्य के स्वधर्म’ की पहचान ?
इक्कीसवीं सदी का ख़तरा पुराने तानाशाहों जैसा नहीं है। यह ख़तरा ज़्यादा परिष्कृत है, ज़्यादा चतुर और इसलिए कहीं अधिक घातक। आज सत्ता जनता-जनार्दन की तालियों के बीच लोकतंत्र को निष्क्रिय करती है। आज लोकतंत्र के खात्मे की कोई औपचारिक घोषणा नहीं होती – कौन मूर्ख ऐसा करेगा? इसके बजाय लोकतंत्र की भाषा बोली जाती है, जनता की जय-जय होती है, और उसी प्रक्रिया में लोकतंत्र की आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर दिया जाता है।
लेखक योगेंद्र यादव लिखते हैं कि स्वतंत्र भारत में गणराज्य के स्वधर्म पर हमले पहले भी हुए, लेकिन पिछले दशक में यह हमला एक सतत राजनीतिक परियोजना का रूप ले चुका है। पहले हिंसा और अन्याय को अपवाद बताकर ढका जाता था; अब उन्हें लोकतंत्र के नाम पर वैध ठहराया जा रहा है। आज भारत उस खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहाँ लोकतंत्र का उपयोग कर लोकतंत्र को ही कमजोर किया जा रहा है – ठीक उसी तरह, जैसा तुर्की, हंगरी या अन्य देशों में देखा गया।
इसलिए जरूरी है इस स्वधर्म को पहचानना कि भारत गणराज्य किसी एक विचारधारा, किसी एक पहचान या किसी एक बहुमत के भरोसे नहीं टिका है। वह मैत्री, करुणा, विनय और बहुलता के उस स्वधर्म पर टिका है, जिसे हमारी सभ्यता ने गढ़ा, राष्ट्रीय आंदोलन ने संवारा और संविधान ने औपचारिक रूप दिया।
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं। वह लोकनीति और जनहित से जुड़े विषयों पर रिसर्च करते हैं)