आर्थिक विकासः इतने बंटे हुए क्यों हैं अहसास!

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े को लेकर छिड़े विवाद ने आखिरकार बहस को उस जगह लाकर खड़ा किया है, जहां लोग यह पूछने लगे हैं कि अगर तेज गति से आर्थिक वृद्धि दर्ज हो रही है, तो वह आम जिंदगी में महसूस क्यों नहीं हो रही है? आंकड़ों की साख का सवाल तो पुराना है, मगर ताजा बहस के क्रम में आम तजुर्बे के खिलाफ आए आंकड़ों पर सरल, लेकिन कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं।

जहां तक सरकारी आंकड़ों की साख का मुद्दा है, तो यह प्रश्न तब से अनुत्तरित है कि नोटबंदी के बाद जब आम अर्थव्यवस्था बाधित थी, तो सरकारी आंकड़ों में दिखी उच्च आर्थिक वृद्धि दर कहां से आई? या कोरोना काल में (खासकर सेकंड फेज में) जब महामारी के विकराल रूप ने लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से झकझोर रखा था, तब मौतों के सरकारी आंकड़ों में वह सूरत क्यों नहीं झलक रही थी?

फिलहाल, ये बातें इसलिए प्रासंगिक हो उठी हैं क्योंकि अप्रैल-जून 2026 की अवधि का बड़ा हिस्सा वह है, जब ईरान युद्ध के असर से रसोई गैस की किल्लत, पेट्रोलियम की महंगाई, आम मूल्य वृद्धि, फर्टिलाइजर्स के संभावित अभाव आदि के कारण जहां घरों का बजट बिगड़ रहा था, वहीं देश की माली हालत ऐसी थी कि प्रधानमंत्री को लोगों से सोना ना खरीदने, खाद्य तेलों का उपभोग घटाने, विदेश यात्रा ना करने आदि की अपील करनी पड़ी थी। अब अगर सरकारी आंकड़ों से बताया गया है कि उस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था ने उच्च वृद्धि दर हासिल की, तो ये सवाल उठना लाजिमी है कि सरकारी आंकड़े ईमानदार गणना के जरिए वास्तविक स्रोतों से प्राप्त किए गए हैं या किसी बाजीगरी से उन्हें हासिल किया गया है?

इसी पृष्ठभूमि के कारण जब पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी गणना की नई और पुरानी सीरिज में आए फर्क और उनसे ही सामने आए आंकड़ों की तुलना करके जीडीपी वृद्धि दर संबंधी सरकारी दावे पर सवाल उठाया, तो उनकी बात पर ध्यान दिया गया। बेशक, सरकार समर्थकों का यह तर्क दमदार है कि दो अलग-अलग सीरिज के आंकड़ों के बीच तुलना नहीं की जानी चाहिए, मगर अन्य दायरों में इस मुद्दे को महज एक तकनीकी सवाल के रूप में नहीं देखा गया है। बल्कि लगे हाथ लोगों ने इस प्रश्न पर भी ध्यान दिया है कि आखिर जीडीपी गणना में ऐसा क्या परिवर्तन लाया गया कि 2025-26 की पहली तिमाही में दोनों सीरिज के आंकड़ों के बीच छह लाख करोड़ रुपये का फर्क पड़ गया? पुरानी सीरिज में अगर गणना 86 लाख करोड़ रुपये की हुई थी, तो उसमें ऐसा क्या गलत जोड़ा गया था, जिसे हटाने पर नई सीरिज में ये आंकड़ा 80 लाख करोड़ रुपये ही रह गया?

संभव है कि आगे चल कर सरकार जब गणना की विधि एवं स्रोतों के बारे में विस्तृत विवरण दे, तो ऐसे प्रश्नों के उत्तर सामने आ जाएं। लेकिन फिर यह सवाल उठेगा कि क्या पुरानी सीरिज में वर्षों तक गलत गणना के जरिए सरकार उच्च वृद्धि दर का दावा करती रही? और चूंकि ऐसे सवाल पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं, तो आखिरकार इस चर्चा से यह हकीकत जरूर उजागर होगी कि आंकड़ों से जानबूझ कर खेलना कितना हानिकारक होता है।

बहरहाल, अब इस बहस को आगे ले जाने की जरूरत है। इस दौरान उठे इस प्रश्न को चर्चा के केंद्र में लाने की आवश्यकता है कि विकास या आर्थिक वृद्धि की ऊंची दर आम जिंदगी में महसूस क्यों नहीं हो रही है? इसी क्रम में यह मुद्दा उठेगा कि यह किसे महसूस नहीं रही है- सबको, कुछ लोगों को, या समाज के बहुसंख्यक हिस्से को? गौरतलब है कि जीडीपी आंकड़े को लेकर चली बहस में मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए ऐसा कहने वाले लोग भी सामने आए हैं कि उन्हें विकास महसूस हुआ है। इस सिलसिले में महंगी कारों की बढ़ी बिक्री, कॉरपोरेट सेक्टर के बढ़े मुनाफे और वित्तीय संपत्तियों में निवेश से बढ़ी आमदनी का अक्सर जिक्र हुआ है। और ये ऐसे पहलू हैं, जिनसे इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन एक दूसरी कहानी भी हमारे सामने है। उदाहरण के लिए इस खबर पर गौर कीजिएः

गैर-सरकारी संस्था- सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनोमी (CMIE) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक,

  • जुलाई में देश की औसत मजदूरी दर में 1.5 प्रतिशत की गिरावट आई। यह पिछले 12 महीनों में लगातार पांचवीं मासिक गिरावट है।
  • देरी से आए मानसून ने खरीफ बुवाई को प्रभावित किया, जिससे उपभोक्ता भावना कमजोर हुई।
  • जुलाई में समाप्त तीन महीनों में असली (महंगाई समायोजित) ग्रामीण मजदूरी में 5.7 फीसदी की भारी गिरावट आई, जबकि इसी दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 2.7 प्रतिशत बढ़ा। नतीजतन, असली ग्रामीण मजदूरी 8.9 फीसदी घटी, जबकि शहरी क्षेत्रों में भी यह गिरावट 1.9 फीसदी की रही।
  • अप्रैल से जुलाई के बीच औसत ग्रामीण मजदूरी 21,250 रुपये से घटकर 19,922 रुपये प्रति माह हो गई, जबकि शहरी मजदूरी 32,078 रुपये से बढ़कर 32,225 रुपये हुई। ग्रामीण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 2.9 प्रतिशत बढ़ा, जबकि शहरी उपभोक्ता मुद्रास्फीति में यह बढ़ोतरी 2.4 फीसदी रही।
  • अतः जुलाई में (साल-दर-साल आधार पर) शहरी वेतन वृद्धि दर घटकर 10.5 प्रतिशत और ग्रामीण वेतन वृद्धि दर घटकर मात्र 5.1 प्रतिशत रह गई।
  • CMIE के अनुसार इस असमान बदलाव के कारण शहरी और ग्रामीण मजदूरी के बीच का अंतर बढ़ गया है। ग्रामीण मजदूरी अब शहरी मजदूरी का सिर्फ 62 प्रतिशत रह गई है, जबकि पहले यह 66 प्रतिशत थी।

इन आंकड़ों को ध्यान में रखें, तो यह समझा जा सकता है कि आखिर समाज के वो कौन-से तबके हैं, जिन्हें ऊंची विकास दर अपनी जिंदगी में महसूस नहीं होती। बल्कि उन्हें लगातार अपनी जिंदगी मुहाल होती मालूम पड़ती है।

इस सिलसिले में अमेरिका से प्रकाशित प्रतिष्ठित सोशलिस्ट पत्रिका- मंथली रिव्यू- के ताजा अंक के संपादकीय में शामिल इस उल्लेख पर ध्यान देना उपयोगी होगा-

“1845 में ब्रिटिश मजदूर वर्ग की स्थिति पर दो कालजयी पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं: बेंजामिन डिजरेली (जो दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे और ब्रिटिश सामंत वर्ग का नुमाइंदा थे) का उपन्यास सिबिलः ऑर द टू नेशंस और फ्रेडरिक एंगेल्स की द कंडीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड। आज इन दोनों को याद करना प्रासंगिक है। डिजरेली के सिबिल को उच्च कोटि की साहित्यिक कृति के रूप में याद नहीं रखा जाता, क्योंकि उन कसौटियों पर इसके दावे काफी कमजोर थे। मगर उसे एक ऐसे उपन्यास के रूप में याद किया जाता है, जिसने अभिजात-वर्गीय टोरी (रूढ़िवादी) दृष्टिकोण से मजदूर वर्ग की दयनीय स्थिति का वर्णन करने का प्रयास किया था। यह दृष्टिकोण बुर्जुआ (तब उभरते पूंजीपति) वर्ग का आलोचक था और गरीबों के प्रति संरक्षक भाव से सहानुभूति जताता था। समय के साथ इसकी सबसे यादगार पंक्तियां- जो स्टीफन मॉर्ले (एक चार्टिस्ट पत्रकार) और चार्ल्स एग्रेमोंट (अभिजात परिवार से आया युवक जो उपन्यास का नायक है) के बीच की बातचीत की हैं, जो अलग ही छाप छोड़ती हैं:

उस समय बन रहे समाज की स्थिति के बारे में मॉर्ले ने कहाः

“दो राष्ट्र, जिनके बीच ना तो कोई संवाद है और ना ही कोई सहानुभूति; जो एक-दूसरे की आदतों, विचारों, और भावनाओं से उतने ही अनजान हैं, मानों वे अलग-अलग क्षेत्रों के निवासी हों, या अलग-अलग ग्रहों के बाशिंदे हों; जो अलग-अलग पालन-पोषण से बड़े हुए हों, जिन्हें अलग-अलग भोजन खिलाया जाता हो, जो अलग-अलग तौर-तरीकों से संचालित होते हों, और जिन पर एक जैसे कानून लागू नहीं होते।”

यानी उपन्यास सिबिल के पात्र ने कहा कि औद्योगिक क्रांति के साथ उभर रहे ब्रिटिश समाज में शोषक पूंजीपतियों एवं शोषित श्रमिकों के दो अलग राष्ट्र निर्मित हो गए हैं। डिजरेली यह विवरण देकर ठहर गए। लेकिन फ्रेडरिक एंगेल्स ने औद्योगिक मजदूरों के बीच रह कर अध्ययन किया, शोषण से वस्तुगत चरित्र को समझा, और समाधान ढूंढने की ओर बढ़े।

बहरहाल, वर्तमान भारत में जब विकास के महसूस होने और ना होने की चर्चा हो रही है, तो सहज ही सिबिल के पात्र ने एक समाज में जिन दो राष्ट्रों की चर्चा की, वह उपमा प्रासंगिक हो जाती है। ये अवस्था क्यों आई और इसका समाधान क्या है, इस विचार-विमर्श को दायरा तो बहुत बड़ा होगा, मगर संक्षेप में कुछ बातों का उल्लेख जरूर किया जा सकता है।

मुंबई स्थित संस्था- द रिसर्च यूनिट फॉर पॉलिटिकल इकॉनोमी ने आजादी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा और देश अपनाई गई नीतियों का एक लंबा विश्लेषण हाल में प्रस्तुत किया है। इसमें खासकर 2008 की वैश्विक मंदी के बाद की स्थिति का जो जिक्र है, वह आज के हालात को समझने में खासा मददगार है। इसके मुताबिक,

  • 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट के केंद्र में मौजूद वित्तीय संपत्तियों से भारतीय अर्थव्यवस्था का बहुत कम प्रत्यक्ष जुड़ाव था। इसके बावजूद, साम्राज्यवाद-शासित वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था का व्यापक एकीकरण हो रहा था। अतः उस वित्तीय संकट ने व्यापार, वित्त और विश्वास- के जरिए एक गहरा झटका दिया। उसके बाद साम्राज्यवादी देशों ने भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों पर एक समन्वित राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन (Fiscal and Monetary Stimulus) लागू करने का दबाव बनाया, जिसने विकास दर की तेजी को बहाल किया। लेकिन जैसे ही साम्राज्यवादी देशों में संपत्तियों की कीमतें फिर से बढ़ीं- यानी वहां तात्कालिक संकट दूर हुआ, उन देशों ने विकासशील दुनिया के देशों की श्रम शक्ति, प्राथमिक वस्तुओं (प्राइमरी गुड्स) और उत्पादक संपत्तियों की कीमतों को नीचे लाने और प्रोत्साहन को वापस लेने का दबाव बनाना शुरू कर दिया।
  • कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार इस राजकोषीय संकुचन वाली नीति पर आगे बढ़ी, जिससे 2011 के बाद आर्थिक वृद्धि दर और निजी कॉरपोरेट निवेश दरों में गिरावट आई, जो फिर कभी पूरी तरह नहीं उबर सकी। तब भारत के बड़े पूंजीपतियों ने इस विचार को आगे बढ़ाया कि नव-उदारवादी सुधारों को तीव्र ढंग से लागू कर वृद्धि दर को फिर से जीवित किया जा सकता है। ऐसा कर पाने में तत्कालीन सरकार की अनिच्छा या अक्षमता के कारण वे उसके खिलाफ आक्रामक हो गए और “नीतिगत अपंगता” (policy paralysis) का आरोप उस पर मढ़ने लगे।
  • 2013 तक, भारत के बड़े कॉरपोरेट घरानों ने नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करना शुरू कर दिया था, जिसका उद्देश्य नव-उदारवादी उपायों के जरिए वृद्धि दर को पुनर्जीवित करना था। उन्होंने उदारीकरण और निजीकरण, भूमि अधिग्रहण के लिए मंजूरी, राजकोषीय धन को कल्याणकारी योजनाओं से हटा कर कॉरपोरेट क्षेत्र की ओर मोड़ने, और श्रमिकों के अधिक व्यवस्थित शोषण को संभव बनाने का फॉर्मूला सामने रखा। इस प्रकार बड़े कारोबारियों ने सांप्रदायिक विचारधारा और उस विचारधारा के इर्द-गिर्द बने संगठनों को शासन के एक ऐसे तंत्र के रूप में अपनाया, जो जन प्रतिरोध की संभावना पर काबू रख सके।

यह आम तजुर्बा है कि 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने और भारत को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में जोड़ने के उपायों को तेजी से आगे बढ़ाया है। इनमें से कुछ उपायों- विशेष रूप से किसानों और श्रमिकों को सीधे प्रभावित करने वाले उपायों को- प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है और कुछ मामलों में उन्हें वापस भी लेना पड़ा है।

मगर यह हकीकत हमारे सामने है कि मोदी सरकार ने बड़े पूंजीपति वर्ग के हाथ में धन संकेंद्रण की पहले से जारी प्रक्रिया को और अधिक रफ्तार प्रदान की है। कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, कॉरपोरेट कर्ज माफी, श्रमिक वेतन वृद्धि को सीमित रखने और इन सबके जरिए कॉरपोरेट मुनाफे में भारी बढ़ोतरी को मौजूदा सरकार ने संभव बनाया है।

खुद सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण दस्तावेज में यह कहा जा चुका है कि ‘वित्तीय प्रदर्शन के मामले में, कॉरपोरेट सेक्टर के लिए इतनी अच्छी स्थिति पहले कभी नहीं रही।’ बहरहाल, मुनाफा बढ़ने के बावजूद निजी कॉरपोरेट सेक्टर का अर्थव्यवस्था में निवेश नीचे बना रहा है। हकीकत यह है कि इस मामले में 2011 के बाद आई सुस्ती अभी भी बनी हुई है। कॉरपोरेट घराने निवेश करने के बजाय अपने पास मौजूद नकदी को अपने पास रख रहे हैं, उसका निवेश वित्तीय संपत्तियों में कर रहे हैं, अपना बाजार मूल्य बढ़ाने के लिए शेयर बाईबैक जैसे तरीकों का सहारा ले रहे हैं, या उसे लाभांश (dividends) के रूप में बांट रहे हैं। इसी का नतीजा है कि अर्थव्यवस्था में मांग निचले स्तर पर बनी हुई है। ऐसे में उद्योगों ने इस पूरी अवधि के दौरान कभी अपनी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं किया।

चूंकि उपभोक्ता बाजार नहीं बढ़ रहा है, तो शासक वर्ग अन्य तरीकों से धन एकत्र करने में जुटा रहा है। इसमें किसानों को उनकी संपत्तियों से बेदखल करना भी शामिल है। साथ ही कॉरपोरेट सेक्टर का मुनाफा बढ़ाने के लिए पर्यावरण कानूनों में व्यापक बदलाव किए गए हैं और वन क्षेत्रों में आदिवासियों के विरोध के बावजूद बड़े पैमाने पर खनन परियोजनाओं की मंजूरी दी गई है। इस प्रक्रिया में, वह एक छोर पर अत्यधिक धन और दूसरे छोर पर अत्यधिक गरीबी का जमा होना जारी है।

इस परिस्थिति में अगर एक छोटा-सा तबका आर्थिक वृद्धि एवं विकास की कहानियों को सच मानता है, जबकि बहुसंख्यक आवाम को ऐसा महसूस नहीं होता, तो उस विरोधाभास को आसानी से समझा जा सकता है। आज असल चुनौती बहस को इसी अंतर्विरोध के बिंदु पर लाने की है। आंकड़ों की तकनीकी बहस में उलझ रहने से बात कहीं आगे नहीं बढ़ेगी।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply