मारुति और दुनिया के मजदूर एक हो 

आज 18 जुलाई है। आज के दिन मज़दूरों के हितैषी अवनीश कुमार देव की हत्या की गई।

व्यक्तिगत रूप से 2012 के बाद मेरे लिए एक दुख, पीड़ा, गुस्से भरा मनहूस दिन!! संयोग से 2018 में इसी दिन मेरे मजदूर पिता दयाधर चंदोला का बरेली में बीमारी से देहांत हो जाता है।

वैसे तो कोई भी इसे बीमारी, बुढ़ापे से हुई मौत कहेगा लेकिन व्यापक अर्थ में देखा जाए तो यह 1991 में जारी नई आर्थिक नीतियों का फल थी जिसके कारण मुझे 2009 से 2025 तक राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी में एक पशु चिकित्सा अधिकारी होते हुए  सोलह साल तक मात्र इक्कीस हजार प्रति माह मिलते थे, जबकि डेढ़ लाख रुपये मिलने चाहिए थे। क्योंकि मेरा पद क्लास दो का 5400 ग्रेड पे वाला था जो कि हमारे संस्थान में एक असिस्टेंट प्रोफेसर का ग्रेड पे था जिन्हें 95000 प्रतिमाह मिलते थे। 

तब से लगातार आज तक यह मेरे लिए दोहरे गम का बायस बना है। 

खैर, वापस चलें।

आज के दिन शाम को मारुति के मानेसर प्लांट में हिंसा होती है, जिसमें अवनीश कुमार देव की हत्या हो जाती है, तोड़फोड़ की जाती है और फैक्ट्री में आग लगा दी जाती है। मजदूरों पर हत्या और आगजनी का आरोप लगता है।  500 परमानेंट और दो हजार ठेका मजदूरों को निकाल दिया जाता है। सारी यूनियन बॉडी को जेल में डाल दिया जाता है।

जैसा कि “द फैक्ट्री” डॉक्यूमेंट्री फिल्म में भी है, मारुति मजदूर कभी भी अपने ही हितैषी एचआर मैनेजर अवनीश कुमार देव की हत्या नहीं कर सकते थे क्योंकि वह तो स्वयं ही उनकी यूनियन का रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए चंडीगढ़ गए थे। और जब वह बीमार पड़े तो जेसा कि मारुति के मैनेजर का अदालत में बयान है मजदूर खुद उनसे मिलने अस्पताल गए थे। 

तो उस दिन सुबह से ही माहौल तनाव से भरा था। 150 पहलवाननुमा अंजान चेहरे गार्ड के रूप में ड्यूटी पर थे। इसी कारण तनाव था, दहशत थी।

मारुति के प्लांट में शोषण इस कदर था कि उन्हें भोजन के लिए 400 मीटर दूर जाना पड़ता था और मात्र 20 मिनट मिलते थे। इन्हीं में उन्हें लाइन में लगकर भोजन लेना पड़ता था, फिर वापस 400 मीटर आना पड़ता था। अश्लीलता की सीमा देखिए कि मारुति मजदूर 7:30 मिनट के चाय के ब्रेक में एक हाथ में गरम-गरम चाय और बिस्किट थामे हैं और दूसरे हाथ से लिंग पड़े हुए पेशाब कर रहे हैं।

जापान में तो काम के अधिकता से आत्महत्या करने के लिए एक बाकायदा एक जापानी शब्द का ही ईजाद हो गया है। इसके बारे में राहुल राय की डॉक्यूमेंट्री फिल्म “द फैक्ट्री” देखनी बेहद जरूरी है जो कि 2 घंटे की है। मैंने इसको कई बार देखा है लेकिन अब यह शायद यूट्यूब से हटा ली गई है।

इसके अलावा भी 2000 से जारी मारुति के मजदूरों के विभिन्न आंदोलनों के बारे में पीयूडीआर ने आधा दर्जन भर रिपोर्ट की है। पुस्तिकाएं हिन्दी अंग्रेजी में प्रकाशित की हैं ।

इसके अलावा भी नंदिता हक्सर और अंजलि देशपांडे की पुस्तक भी हैं।यह पुस्तक हिंदी और अंग्रेजी में ₹1000 की है। हिंदी वाली का मूल्य 350 रुपए और अंग्रेजी वाली का 650 रुपए है। अंग्रेजी वाली पुस्तक में करीब 15 से 20 पेज इस बात को समर्पित हैं कि किस प्रकार एक तानाशाह प्रधानमंत्री का सुपर तानाशाह बेटा संजय गांधी तमाम सरकारी संस्थाओं को इस काम में लगा देता है कि वह मारुति के उसके प्रोजेक्ट / सनक को पूरा करें।

शुरू में यह पूर्णतया पब्लिक सेक्टर कंपनी थी जो कि बाद में धीरे-धीरे होते हुए 2006 में प्राइवेट बना दी गई।

मुझे याद है हमारी फैक्ट्री जब नेवली वाडिया आया करते थे तब होली के दिनों में हम उनके चेहरे पर हर साल गुलाल लगाया करते थे वह मोहम्मद दिला अली जिन्ना के दामाद थे और वाडिया जी का कहना था कि भले ही फैक्ट्री में बिजली पानी न हो कॉलोनी में जरूर होनी चाहिए। हमारे स्कूल में छोड़ने जाने के लिए फ्री में स्कूल सुविधा थी। हमारे घर में 30 किलो अंगीठी वाला कोयला फ्री में दिया जाता था। फ्री में घर के फर्नीचर दरवाजा की मरम्मत होती थी।

यहां तक कि साल भर में एक पार्टी भी होती थी जिसमें मजदूरों को कंपनी के खर्च पर त्योहार हेतु संसाधन मिलते थे।

लेकिन ध्यान रहे कि यह नई आर्थिक नीतियों से पहले का युग है। हमारे युग में जब हम छोटे थे ऐसा माहौल था।

खुशी ही खुशी बिना मोबाइल, टीवी वाली खुशी।

एक मजदूर का बेटा होने के नाते मेरा यह निजी अनुभव है कि फैक्ट्री के 90% मजदूर लगन से काम करते थे और फैक्ट्री को अपनी निजी संपत्ति की तरह ही मानते थे।

आज भी यह भाव आप लोग सब फैक्ट्री में देख लीजिए।

तो हिंसा, हत्या का आरोप!! मजदूरों पर। गुंडे मवाली नहीं। हिंदुस्तान के निर्माता हैं ये। आपके मोबाइल, घर, जूते, सड़कें सब दुनिया भर के मजदूरों की देन है।

अफसोस, आप लोग मजदूरों से नफ़रत करते हैं। अरे मिडिल क्लास प्रफेसरों, डॉक्टरों शर्म करो तो।

वापस पुराने दौर में।

 पिता ऑपरेटर फोरमैन से तरक्की करते हुए प्रोडक्शन ऑफीसर तक पहुंचे थे। जबकि वह मात्र हाई स्कूल पास थे।

जब तक किसी भी प्रक्रिया, घटना को ऐतिहासिक रूप से नहीं देखेंगे इसका सत्य रूप से बोध नहीं होगा। 

खैर एक बार फिर मारुति की ओर लौट चलें ।

कंपनी ने नहीं बल्कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के वकील केटीएस तुलसी को 9 लाख रूपये प्रति पेशी पर दिए और उनके टाइपिस्ट को एक लाख रुपए दिए। कुल 9 करोड़ रुपए इस पर खर्च हुए और एक थर्ड क्लास चार्ज शीट तैयार की गई ।

उदाहरण के लिए जिन मजदूरों ने पहली मंजिल में आग लगाई उनके नाम वर्णमाला के अक्षर ” ए” से शुरू होकर “के” तक थे।

ग्राउंड फ्लोर में हिंसा करने वाले मजदूरों के नाम “एल” से लेकर “जेड” तक थे। वाह वाह क्या बात है।

चार्ज में दूसरी कमी यह थी कि जैसा कि “द फैक्ट्री” फिल्म में दिखाया गया है। जेल में एक मजदूर के एक बूढ़े बाप का बयान है कि फैक्ट्री में आग लगी तो सब चीज जल गई, लेकिन एक माचिस नहीं जली यह कैसे हो सकता है।

साथियों ये अनंत कथा फिर कभी।

अभी के लिए इति।

(डॉ उमेश चंदोला का लेख)

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