लौटे हुए पांच दिन हो चुके हैं मगर ऑस्ट्रेलिया दौरे के मीम बनाकर मखौल उड़ाना आज भी चल रहा है। वहां का मीडिया आज भी विशेष रूप से बुक करके लाये चार्टर्ड हवाई जहाजों में ढोकर लाये कोई 25-30 हजार भारतीयों के बीच नाच गाने के कार्यक्रमों के लिए बनाए गए मिनी स्टेडियम में हुए मोदी जी के रॉक-शो के मजे ले रहा है।
ऑस्ट्रेलिया की स्थानीय मीडिया और विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि पहले तबके अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ का नारा लगवाने वाले मोदी ने इस बार ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय चुनावों में वहां के अलोकप्रिय होते जा रहे प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की पार्टी के पक्ष में भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने के लिए इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। यह एक गंभीर आरोप है। यहाँ का न सही किन्तु वहां का मीडिया इस दौरे में हुए द्विपक्षीय समझौतों की असलियत पर भी सवाल उठा रहा है।
ऐसी तस्वीरें भी छापी जा रही हैं जिनमें भारत के प्रधानमंत्री का चेहरा टेलीप्रोम्प्टर – जिस पर लिखे को पढ़ कर बोला जाता है – से ढंका हुआ है। वहां के पत्रकार लिख और पूछ रहे हैं कि मोदी पत्रकारों का सामना करने से क्यों बचते हैं। बात हो रही होती है विदेशी मीडिया से संवाद की और भारत के पूर्वी मामलों के विदेश सचिव रुद्रेन्द्र टंडन बात बनाते हुए, कथा सुनाते हैं भारत की ग्रामीण आबादी से सीधे कनेक्ट होने की मोदी की क्षमता की।
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में मोदी कथित रूप से 25-30 साल से सहेज कर रखा अपना मफलर दिखाते हुए भावुक हो उठते हैं और अपनी आदत के अनुरूप दून की हांकते हुए दावा ठोंकते हैं कि यह उन्हें तबकी उनकी न्यूजीलैंड यात्रा में किसी ने भेंट किया था। हालांकि वह भेंट करने वाला कौन था यह उसी तरह का रहस्य है जैसा उनकी डिग्री, उनके 17 साल तक वड़नगर के तब तक न बने रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने और उसके बाद के 35 साल तक भीख मांगकर जीवन गुजारने की स्वयं सुनाई गयी मनोहर कहानियों के मामले में बना हुआ है।
इंडोनेशिया में उनका 2 और 6 बराबर 8 और 1 और 7 बराबर 8 का गणितीय चुटकुला मुख्य हेडलाइन बनता है तो मेलबर्न में वे 1+1 बराबर 11 का चमत्कार दिखाते हुए पाए जाते हैं। अपनी इन अति महत्वपूर्ण बताई जाने वाली विदेश यात्राओं में वे सेशेल्स के बोटैनिकल गार्डन में कथित रूप से दुनिया के सबसे उम्रदराज – जो वो नहीं था – कछुए को घासपात खिलाते तो मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में ऑस्ट्रेलिया के आधिकारिक कंगारू मैस्कॉट ‘रूबी’ से हाथ मिलाकर बातचीत करते हुए पाए जाते हैं।
मोदी की विदेश यात्राओं की इस तरह की, कुछ इससे अधिक भी रोचक और मनोरंजक कहानियां और भी हैं। इनके और अधिक वृतांत सुनाने की बजाय कुल जमा सार यह है कि विश्व राजनीति में एक जमाने में 118 गुटनिरपेक्ष देशों का नेता रहा भारत आज जितनी हास्यास्पद स्थिति में पहुँच गया है, वैसा इससे पहले कभी नहीं रहा। एक समय था जब संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का उप-सचिव या दिल्ली के विदेश मंत्रालय का तीसरे नम्बर का प्रवक्ता भी कुछ बोलता था तो दुनिया के देश उसे सुनते और गुनते थे।
आज स्थिति यह आ गयी है कि उसी देश के प्रधानमंत्री के बारे में न जाने कैसा कैसा लिखा जा रहा है।
इग्लैंड का एक प्रमुख अखबार द गार्जियन अपनी प्रमुख खबर का शीर्षक देता है कि “उन्हें कोई भी पुरस्कार / मेडल दीजिये, वे भागते चले आयेंगे।“ यह दावा निराधार भी नहीं है। वही अखबार उदाहरण देते हुए उन कथित सम्मानों की सूची भी छापता है जो बताने को तो उस देश के सर्वोच्च सम्मान बताये गए, मगर थे ऐसे जिनका नाम देने वाले देश सहित किसी ने भी दिए जाने से पहले कभी नहीं सुना था।
वे सिर्फ इन्हीं के लिए अवतरित हुए थे, इन्हें दिए जाने के बाद विलुप्त हो गए : न तो इन्हें देने के पहले वे किसी को दिए गए थे न इनके बाद किसी और के नसीब में आये। इस श्रृंखला में द गार्जियन ने इजरायल के ‘मेडल ऑफ द नेसेट’ और 2019 के ‘फिलिप कोटलर’ पुरस्कार का जिक्र करता है। मोदी के इज़राइल दौरे से कुछ दिन पहले, इज़राइली संसद ने जल्दबाज़ी में ‘मेडल ऑफ़ द नेसेट’ बनाया और मोदी के वहाँ पहुँचते ही उन्हें यह मेडल दिया गया।
इसे देश के सबसे बड़े सम्मानों में से एक बताया गया जिसे पाने वाले वे अब तक के अकेले व्यक्ति हैं। इसी तरह का अवार्ड ‘फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड’ था जिसका दावा है कि वह हर वर्ष किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष को दिया जाएगा मगर जो अब तक केवल और मात्र भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही मिला है। उनके अलावा न उससे पहले न उसके बाद के 7 वर्षों में दुनिया के किसी भी अन्य नेता या व्यक्ति को दिया गया ।
अभी मोदी सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी से ‘गार्जियन ऑफ़ द ब्लू होराइज़न’ अवॉर्ड ट्रॉफी और सर्टिफिकेट के साथ स्वीकार करते हुए खुशी ज़ाहिर करते हुए नजर आये थे। सेशेल्स अफ्रीका का सबसे छोटा और सबसे कम आबादी वाला देश है। इस अवॉर्ड में एक नहीं अनेक बातें अजीबोगरीब निकलीं। जो प्रमाणपत्र दिया गया उसमें देने वाले देश सेशेल्स के नाम की दोनों – सेशेल्स और रिपब्लिक – की स्पेलिंग तक गलत थीं । रिपब्लिक में बी दो बार था तो सेशेल्स में ई दो बार लिखा मिला।
मालूमात जुटाने पर पता चला कि बाकी कई पुरस्कारों के साथ यह अवॉर्ड भी मोदी के आने से सिर्फ़ तीन दिन पहले ही बनाया गया था और वे इसे पाने वाले पहले और एकमात्र व्यक्ति थे। मुद्दे के और गरमाने पर जब इसे सॉफ्टवेयर से जांचा गया, तो यह बात सामने आई कि इसे ए आई – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – से बनाया गया था।
एक इत्ते बड़े देश के प्रधानमंत्री की यह ट्रॉफी लालसा, अवार्ड आतुरता और सम्मान कौतुकता खुद उनको कितना गदगद और अभिभूत करती है इसकी तो वे ही जानें मगर देश को बहुत शर्मिन्दा करने वाली है। इसका लगातार, बारम्बार घटना फिसलन की जिस दिशा की तरफ इशारा करती है, वह अच्छी नहीं है। खासतौर से तब जब यह व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति हो और निजी भर न होकर पद से जुड़ी हो।
बुरी बातों की आदतों का आदत में आ जाना अच्छी बात नहीं होती, उनकी लत पड़ जाना तो और भी ज्यादा खराब बात है। व्यक्तियों में हो तब भी बुरी बात है और कहीं प्रमुख पदों, उस पर भी प्रधानमंत्री जैसे पद पर विराजे व्यक्ति में हों तो कुछ ज्यादा ही परेशान करने वाली स्थिति हो जाती है। इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री इसके शिकार हो गए लगते हैं।
लगता है उन्हें अपने देश में हो रही अपनी छीछालेदर और अपनी नीतियों के परिणामस्वरुप चौतरफा गिरावट, अपनी अस्थिर विदेश नीति के चलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में पहले से ही हो रखी दुर्दशा से संतुष्टि नहीं हो पा रही, इसलिए खुद दुनिया भर में घूम घूमकर अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। ऊपर सिर्फ दो चार उदाहरण दिए हैं वरना विश्व भ्रमण की हाल में पूरी की अपनी किश्त में वे जिन जिन देशों में गए उन उन देशों के अखबारों और मीडिया में ठीक उन वजहों से सुर्ख़ियों तथा चर्चाओं में रहे जिनकी वजह से नहीं होना चाहिए था।
यह अगर व्यक्ति नरेंद्र मोदी का मामला होता तो एकबारगी चुप रहा भी जा सकता था, मगर यह भारत के प्रधानमंत्री के आचरण का सवाल है इसलिए इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
पहला सवाल तो इन विदेश यात्राओं का ही है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है – अभी दो महीने भी मुश्किल से पूरे हुए हैं जब 10 मई को स्वयं मोदी ने हैदराबाद की आमसभा में मितव्ययिता के भरेपूरे पैकेज को रखा था। अपने इस भाषण में उन्होंने भारत वासियों को हिदायत दी थी कि दुनिया भर में व्याप रहे तनाव और उसके आर्थिक दुष्प्रभावों को देखते हुए वे विदेश यात्राएं बंद कर दें। इस भाषण की गूँज अनुगूंज शांत होने के पहले ही वे खुद विदेश यात्राओं पर निकल लिए थे।
मई महीने में वे संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली गए। जून महीने की भीषण गर्मी उन्होंने फ्रांस, स्लोवाकिया, सेशेल्स गणराज्य की यात्राओं में काटी और अभी जुलाई में इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड होकर आये। इस तरह विदेश यात्राएं न करने के अपने आव्हान के बाद वे कुल जमा 11 देशों को नाप चुके हैं। इस के साथ उन्होंने अपने अब तक के कार्यकाल में 82 देशों की 100 विदेश यात्राओं और कुल मिलाकर 415 दिन भारत से बाहर रहने का ऐसा रिकॉर्ड बना लिया है जो भारत तो छोड़िये, दुनिया के किसी भी राष्ट्रप्रमुख के लिए भी न भूतो न भविष्यत् है।
इन सबसे देश को क्या हासिल हुआ यह तो शायद खुद यात्रावीर को भी नहीं पता होगा। पहले जब भी कोई प्रधानमंत्री विदेश यात्रा से लौटता था तो संसद और उसकी मार्फ़त देश को बताता था कि यात्रा का मक़सद क्या था, उसका हासिल क्या है, दुनिया के हालात क्या हैं और उनके बारे में भारत का नजरिया क्या है। जबसे मोदी प्रधानमन्त्री बने हैं तब से यह प्रथा समाप्त हो चुकी है। देसी मीडिया को पूरी तरह भाट और चारण में बदल दिए जाने के बाद तो सार्वजनिक समीक्षा और चर्चा पर ही विराम लगाया जा चुका है।
नतीजा भयावह और चिन्ताजनक दोनों है। इतने सारे विदेश दौरों के बाद अगर यह स्थिति है कि आप अपने व्यापारिक रिश्ते भी अपनी मर्जी से तय नहीं कर सकते, अपनी सीमाओं की सुरक्षा के बारे में भी बिना अमरीका से पूछे कुछ नहीं कर सकते, ट्रम्प की घुड़कियों और नेतान्याहू के ‘140 करोड़ भारतीय मेरे साथ हैं’ के दावे का खंडन नहीं कर सकते, अपने परम्परागत दोस्त देश ईरान द्वारा अपने सबसे बड़े नेता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के न्यौते को समुचित सम्मान नहीं दे सकते और अमरीका के डर के मारे दो अदने से प्रतिनिधियों को ही भेज पाते हैं … तो इससे अच्छा तो यही था कि घर से बाहर ही न निकलते।
शाखा मृग नहीं जानते कि दुनिया बहुत बड़ी है और कई हजार वर्षों के हादसों और तजुर्बों के बाद संबंधों और कूटनीति, आचरण और बर्ताब की जिस तहजीब तक पहुंची है उसके अपने नियम विधान होते हैं। इन्हें चुटकुलों और फादरलैंड – मदरलैंड के आत्म-अपमानी जुमलों से बायपास नहीं किया जा सकता। दूसरे देशों के तत्कालीन राजनेताओं के चुनाव प्रचार में बैंड बाजा बनाने वाले बाराती बनकर नहीं साधा जा सकता।
किसी देश की प्रतिष्ठा विश्व राजनीति के प्रति उसके नैतिक और सैद्धान्तिक रवैये, उसके नेतृत्व की परिपक्वता और अंततः उस देश की अपनी आंतरिक स्थिति और शक्ति के आधार पर तय होती है।
जिस देश की राजधानी में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का एक व्यक्ति आमरण अनशन पर बैठा हो, हर तरह की आजादी निर्ममता से कुचली जा रही हो, क़ानून के राज और सभ्य समाज की धारणाओं के पीछे भेड़ियों को छू कर दिया गया हो, जहां दबंगई और लूट नियम बनती जा रही हो – उस देश का प्रधानमंत्री दुनिया भर में जाकर लोकतंत्र और मानवता का सन्देश देकर अपने को धोखा दे सकता है, विश्व जनमत को गुमराह नहीं कर सकता। आत्ममुग्धता से सच्चाई नहीं बदली जा सकती।
सच्चाई यह है कि दुनिया के जितने भी संकेतक हैं उनके तथ्य सुकून और आश्वस्ति नहीं चिंता पैदा करने वाले आंकड़ों में बदलते जा रहे हैं। साढ़े आठ हजार करोड़ के हवाई जहाज में बैठकर विदेश घूमने पर हजार करोड़ रूपये फूंकने से यह तथ्य नहीं छुपाया जा सकता कि बन्दा दुनिया के सबसे भूखे देशों में से एक का प्रधानमंत्री है। 2025 के वैश्विक भूख सूचकांक में, 123 देशों में से 102 वें स्थान पर है।
बावजूद इसके कि कथित रूप से 80-85 करोड़ भारतीयों की हर माह 5 किलो अनाज दिया जा रहा है, 2025 के वैश्विक भूख सूचकांक में 25.8 के स्कोर के साथ, भारत में भूख का स्तर चिंताजनक और अत्यंत गंभीर है। विश्व खुशी –हैप्पीनेस – इंडेक्स में वह 147 देशों में से 116वें स्थान पर है। सतत विकास लक्ष्य सूचकांक में 94वें स्थान पर है। आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में उसकी जगह 132वें स्थान पर है। वैश्विक शांति सूचकांक में 163 देशों की सूची में उसे 127वां स्थान प्राप्त हुआ है।
मानव विकास सूचकांक 2025 भारत को 130वें स्थान पर बताता है। अभी हाल में जारी हुई सबसे प्रदूषित और असुरक्षित पर्यावरण वाले देशों की सूची में उसकी गिनती नीचे से दूसरी है : 176 देशों में 175वे नम्बर पर है। कहने को भले उसे चौथी, पांचवी अर्थव्यवस्था कह लीजिये मगर असल तथ्य यह है, वर्ल्ड बैंक से सबसे ज़्यादा कर्ज (लगभग 24.4 बिलियन डॉलर) लेने के मामले में भारत पहले स्थान पर है। ऐसे में दुनिया भर की सैर ‘घर में नहीं हैं दाने और अम्मा चलानी भुनाने’ के सिवा और कुछ नहीं है।
एक जमाने में लेनिन ने कहा था कि किसी देश की विदेश नीति अंतत: उसकी अन्दरूनी नीतियों का अक्स होती है। इन दिनों वह उसके साथ अंदरूनी संकट से ध्यान बंटाने का झुनझुना भी बन गयी है। इधर आर्थिक नीति का शीराजा बिखर रहा है, इंसानों को ठगने के बाद अब भगवानों की लगी पड़ी है।
ऐसे में बगुला भगतों को सैकड़ों करोड़ रुपया फूंककर सैर सपाटे के नाम पर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में इकट्ठा की गयी भीड़ को दिखाकर जो मरीचिका तैयार की जा रही है वह ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। सवाल उठने लगे हैं और वे जब जब उठे हैं तब तब उनने अपने जवाब खुद ढूंढें हैं। रोगों के निदान तक नहीं रुके हैं समाधान तक पहुंचे हैं।
(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)
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