Mon. Nov 18th, 2019

संकटग्रस्त पूंजीवाद फटने को तैयार

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संकटग्रस्त पूंजीवाद अब दुनिया के कुछ हिस्सों में फटने को तैयार है, और भारत जैसे देश में खुद को तैयार कर रहा है, जहां पूरी दुनिया में असंतोष की लहर व्याप्त है वहीं लातिन अमरीका असंतोष के ज्वालामुखी के मुहाने पर धधक रहा है। बोलीविया, हैती, होंदुरास से लेकर इक्वेडोर ने कई बार भ्रष्टाचार, चुनावी धांधली और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में हो रही बेतहाशा वृद्धि को लेकर भीषण और कई बार हिंसक प्रदर्शन का सामना किया है। चिली, जिसे इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहद शांत और समृद्ध इलाका माना जाता रहा है, वहां दसियों लाख लोग सड़कों पर आ गए और न सिर्फ इनमें 20 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, बल्कि राष्ट्रपति पिनेरा को आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी और अपने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करना पड़ा, लेकिन लोग पिनेरा की बर्खास्तगी पर अड़े हुए हैं।

सोशल मीडिया के इस युग में इन लातिन अमरीकी देशों में इसकी लोकप्रियता सबसे अधिक है। जलते हुए सरकारी भवनों और गाड़ियों के साथ पुलिस पर भीड़ द्वारा हो रहे प्रतिरोध और पीछे ढकेल देने की तसवीरें वायरल हो रही हैं। इस बारे में तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि इस महाद्वीप में हो रहे तीखे जन-असंतोष के स्वर के पीछे वेनेजुएला और क्यूबा का हाथ है। ऐसा वे अपने देश में कथित समाजवादी व्यवस्था के ढहने, अमरीकी प्रतिबंधों के चलते होने वाले असंतोष से ध्यान बंटाने के लिए एक्वाडोर और चिली की दक्षिणपंथी सरकारों के खिलाफ कर रहे हैं। इस सन्दर्भ में वेनुएजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो ने पब्लिक में बोलते सुनी गई टिप्पणी को काफी तवज्जो दी जा रही है। इसमें उन्होंने कहा है, ‘जैसी योजना थी ठीक वैसा ही हो रहा है। सभी लातिन अमरीकी देशों और कैरबियन देशों में सामाजिक आंदोलनों, प्रगतिशील और क्रांतिकारी आंदोलन उभार पर हैं।’ लेकिन कई लोगों का यह भी मानना है कि मादुरो का अपने देश की जनता और दुनिया पर खुद के प्रति प्रभाव दिखाने का पुराना इतिहास रहा है।

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वेनेजुएला खुद गहरे आर्थिक और मानवीय संकट से गुजर रहा है, जिसे अमरीका सहित दर्जनों देशों से राष्ट्रपति के रूप में मान्यता प्राप्त जुआन गादीयो से खतरा है। उसी तरह क्यूबा भी ट्रंप प्रशासन द्वारा जारी आर्थिक प्रतिबंधों के चलते गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। इक्वेडोर में जब अक्टूबर की शुरुआत में दंगे अपनी चरम सीमा पर थे तो वहां के मंत्रालय से कहा गया कि एयरपोर्ट से जिन 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, उसमें से अधिकतर वेनेजुएला से थे, जिनके पास इन आंदोलनों के बारे में सूचनाएं पाई गईं। उसी तरह चिली के अखबार ला तेर्सरा के अनुसार पुलिस ने दर्जनों वेनेजुएला और क्यूबा के लोगों को अक्टूबर के मध्य में सैंटियागो के हिंसक आंदोलनों के बीच पाया है।

षड्यंत्र की इस थ्योरी को कई राजनीतिक विश्लेषक ख़ारिज कर रहे हैं। उनके अनुसार जिस प्रकार का गुस्सा और विरोध 25 अक्टूबर को चिली की जनता ने सड़कों पर प्रदर्शित किया, वह अभूतपूर्व था। 1.80 करोड़ की चिली की आबादी में से 10 लाख से अधिक सड़कों पर थे, इसलिए यह कहना बेहद गलत होगा कि ये सभी लोग किसी षड्यंत्र के चलते इतनी भारी संख्या में सड़कों पर आ गए। इसके पीछे के कारण कहीं गहरे और ढांचागत बदलाव में निहित हैं, और षड्यंत्र की थ्योरी से सिर्फ इन देशों के शासक वर्ग और एलीट को एक बार फिर से बचने का मौका मिलता है।

गौर करने वाली बात है कि इस सदी की शुरुआत में लातिन अमरीका की अर्थव्यवस्था में उछाल देखने को मिली थी, जिसके चलते लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं में जबर्दस्त बदलाव देखने को मिला था। आज विकास पूरी तरह अवरुद्ध है। साथ ही लातिन अमरीकी दुनिया में सबसे अधिक सोशल मीडिया से जुड़े हैं और वे जानते हैं कि हांगकांग, बेरुत से लेकर बार्सिलोना में इस तरह विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लगी है तो यहां क्यों नहीं?

आज वहां पहले के तकरीबन 3.9% की विकास दर की तुलना में मात्र 0.2% की विकास दर है, जो दुनिया में सबसे कम है। एक समय था जब चीन से लातिन अमरीका का व्यापार बुलंदियों पर था और विश्व बैंक के अनुसार इस समृद्धि 2003 से 2013 के बीच एक बड़े मध्य वर्ग को जन्म दिया, जिसने करीब 10 करोड़ लोगों को मध्य वर्ग की श्रेणी में ला खड़ा किया था। कई लोग कार, बड़े टीवी सेट और वाशिंग मशीन खरीद सकते थे, और उन्हें अपने अच्छे भविष्य को लेकर एक आश्वस्ति थी।

चीजें हमेशा वैसे नहीं होतीं, जैसा हम सोचते हैं। आर्थिक नाकाबंदी के चलते वेनेजुएला की हालत पिछले पांच वर्षों में बेहद ख़राब हुई है। ब्राजील अपने सबसे बड़े और गहरे आर्थिक मंदी की दौर से गुजरा है और अर्जेंटीना में मुद्रा और कर्ज का संकट उत्पन्न हुआ है। पेरू, मेक्सिको और कोलंबिया जैसे अपेक्षाकृत सुदृढ़ अर्थव्यवस्था भी बेहद खराब प्रदर्शन कर रही है। तकरीबन पूरे लातिन अमरीका की हालत बस अफ्रीका के सब-सहारा क्षेत्र से ही थोड़ा बेहतर कही जा सकती है।

ऐसे में चिली सरकार द्वारा सार्वजनिक परिवहन के किराए में 30 पेसो की बढ़ोत्तरी जो तकरीबन चार अमरीकी सेंट के बराबर है। इक्वेडोर में डीजल और पेट्रोल में सरकारी सब्सिडी हटाने से दोगुने से अधिक की वृद्धि ने आग में घी का काम किया। हालांकि दोनों देशों ने अपने इस निर्णय को वापस ले लिया है, लेकिन लोगों का कई मुद्दों पर बढ़ते गुस्से को इस कदम से ठंडा नहीं किया जा सकता।

लोग अपनी बर्बादी को कई वर्षों से देख रहे हैं। उन्हें साफ़-साफ़ नजर आ रहा है कि जहां एक और वे दरिद्र होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग तेजी से अमीर होते जा रहे हैं, और देश भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबा है। हाल ही में बोलीविया में हुए राष्ट्रपति चुनाव में बेहद अलोकप्रिय एवो मोरेल्स को चौथी बार सफलता हासिल हुई, वहां आर्थिक संकट की प्रष्ठभूमि में चुनावी धांधलेबाजी ने तूफान खड़ा कर दिया है।

लातिन अमरीकी मध्य वर्ग के अंदर गहरे में इस गैर-बराबरी के बढ़ते जाने को लेकर गुस्सा हैं। वे जिस बात को पहले उपेक्षित कर देते थे, कि महंगी गाड़ियां, डिजाइनर हैण्ड बैग और मियामी की छुट्टियों का आनन्द मनाने वाले चंद लोग चुभ रहे हैं। इसके पीछे सोशल मीडिया में बढ़ती दिलचस्पी ने उन्हें काफी संवेदनशील बना दिया है। कल तक वे लोग भी उन्हीं की तरह के सपने देखते थे, लेकिन आज जब वे लगातार अपनी ख़राब आर्थिक स्थिति को देखते हैं, तो उन्हें कहीं से नहीं लगता कि वे अपने पुराने दिनों को भी बरक़रार रख पाएंगे।

हाल के वर्षों में पेरू ग्वाटेमाला और ब्राजील की पूर्ववर्ती सरकारों को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस्तीफे देने पड़े हैं और जेल की हवा खानी पड़ी है। इन सबके लातिन अमरीकी देशों में जनता का वर्तमान शासन और सरकारों की विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। हाल ही में वंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी के एक पब्लिक ओपिनियन पोल में पाया गया कि सिर्फ 57% लातिन देशों के लोग अब लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास करते हैं, जो 2014 से पहले तक 70% तक थी। इसका मतलब यह हरगिज नहीं कि लोग 70 के दशक के तानाशाही शासन को इसके विकल्प के रूप में देख रहे हैं, बल्कि उन्हें मजबूत नेतृत्व की दरकार है, जैसा कि मैक्सिको और ब्राजील के हाल के चुनावों में उन्होंने क्रमशः अन्द्रेस मनूएल और जेर बोल्सोनारो को राष्ट्रपति के रूप में चुना, लेकिन वे अपने लुभावने नारों के विपरीत निराश कर रहे हैं।

भारत के लिए सबक:

भारत अपने आजादी के 72वें वर्ष में है। अपने शुरुआती दौर में इसने लोकतान्त्रिक और समाजवादी मूल्यों के रूप में एक बेहतरीन शुरुआत की थी। समग्र विकास को ध्यान में रखकर सरकारों ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के रूप में शुरुआत की और अपना पूरा ध्यान पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक उद्योगों, हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति और बैंकों के सरकारीकरण से की। इसके प्रारंभिक परिणाम बेहद सकारात्मक रहे और पहले तीन दशकों में गैर-बराबरी में कमी आई, लेकिन विकास दर की धीमी रफ़्तार को हिन्दू ग्रोथ ऑफ़ रेट का नाम देकर उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाने लगी।

चुनावी सफलताओं को ध्यान में रखने और सरकारी नियंत्रण के चलते जब अर्थव्यवस्था में जकड़न बढ़ने लगी और विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का कर्ज बढ़ने लगा। साथ ही निजी क्षेत्र के पास भी इतनी पूंजी इकट्ठा हो गई कि वह उपभोक्ता बाजार से आगे बढ़ आधारभूत क्षेत्रों पर अपनी नजरें गड़ाने लगा तो इसे नौकरशाही जकड़न से मुक्त करने की कवायद भी शुरू होने लगी। यह वही समय था जब सोवियत संघ बिखर रहा था, और दूसरी तरफ पड़ोसी देश चीन में दो व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से संचालन और उसकी सफलता के कसीदे पढ़े जा रहे थे। चीन के भारत से 10 साल पहले ही उदारीकरण की राह पर सरपट दौड़ते हुए विकास की रफ़्तार पकड़ ली थी, और भारत को भी लगने लगा कि उसके पास यही रास्ता श्रेयस्कर है।

90 के दशक से उदारीकरण की जो प्रक्रिया आरंभ हुई, वह नई सहश्राब्दी में जाकर परवान चढ़ती दिखी। भारी मात्रा में स्टार्टअप की शुरुआत होने लगी। एक नये मध्य वर्ग का उदय होने लगा और उसका विस्तार संभव हो सका। हालांकि इस नए विकास को सघन पूंजी वाला लेकिन रोजगारविहीन विकास का नाम दिया गया, लेकिन आईटी इंडस्ट्री जैसे सर्विस सेक्टर में भारत ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की, और देखते ही देखते एक नए इंडिया का निर्माण धूमधाम से शुरू भी हो गया। दिल्ली, मुंबई, बंगलोर, हैदराबाद, पुणे और चेन्नई जैसे महानगरों के आस पास सेटेलाइट शहरों का निर्माण होने लगा। लाखों कारों, अपार्टमेंट की बिक्री होनी शुरू हो गई।

एकबारगी को तो लगा कि भारत अगले 20-25 वर्षों में अपने विकासशील देशों की छवि को मनमोहनामिक्स के जरिए आसानी से अब-तब छूने वाला है, लेकिन यह ख़ुशी जल्द ही काफूर होने वाली साबित हुई। यूपीए-2 के शासन काल में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले और कोयले घोटाले में जो कमी रह गई थी उसे नीरा राडिया टेप प्रकरण ने बुलंदियों तक पहुंचा दिया. लेकिन आर्थिक सड़ांध की परतें तो मोदी के बीजेपी राज में खुलकर सामने आने लगीं, जहां एक ओर तो पनामा और पैराडाइस घोटालों पर मोदी ने फाइल ही दबा दी, वहीं एक के बाद एक बैंकों के लाखों करोड़ के घोटाले और उनके एनपीए होने की खबरों से बाजार गर्म होने लगा। नोटबंदी और जीएसटी ने इसमें आग में घी डालने का काम किया।

ये सभी कदम जहां यह दिखाते हैं कि मोदी चाहे गलत कदम उठा रहे हों, लेकिन वह बोल्ड और बिंदास हैं के उलट एक सोची समझी रणनीति के तहत लिए गए, जिसमें चंद लोगों के निहित स्वार्थ बुरी तरह उलझे हुए थे।

आज भारत में बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि है। सार्वजनिक क्षेत्रों की नीलामी हो रही है। विकास दर के गुब्बारे को फर्जी तरीके से पहले कार्यकाल में बढ़ा-चढ़ा कर फुलाया गया, लेकिन उसकी हवा तेजी से निकल रही है। रोज-ब-रोज सरकार खुद अपने बजट में दिए आकलन में सुधार कर रही है और दुनिया की रेटिंग एजेंसी इसे घटा रही है।

भारत के पास यूरोप और लातिन अमरीका की तरह दोहरी तलवार है, जिससे वह इसका सामना कर रही है। एक तरफ उसके पास समृद्ध यूरोप और अमरीका के आर्थिक रूप से बढ़ रही असमानता से निपटने के लिए इस्लामोफोबिया है, जिसमें उसके पास अस्त्र के रूप में कश्मीर, मुसलमान, पाकिस्तान, राम मंदिर, एनआरसी और देश भक्ति का संदेश है। वहीं उसके पास लातिन अमरीका की तुलना में एक विशाल देश है, जिसमें अभी भी भारी मात्रा में एक ऐसा मध्य वर्ग है जिसे अभी भी विश्वास है कि उसके अच्छे दिन बस आस पास ही हैं। इसके इस विशाल देश में इतनी क्षेत्रीय विषमताएं हैं कि अगर एक जगह बरसात होती है तो दूसरी जगह सूखा या बर्फ पिघल रही होती है।

इन दोनों ही उपायों और बड़ी-बड़ी लफ्फाजियों का देर सवेर अंत होना दिखता है। एक तरफ पीएमसी बैंक घोटाले ने 14 लाख मध्य वर्ग की संख्या को बुरी तरह आहत किया है, वे हफ़्तों से सड़कों पर हैं। वहीं दूसरी ओर कश्मीर में धारा 370 के खात्मे के छाती कूटने के दावों के बावजूद हरियाणा और महराष्ट्र के चुनाव नतीजे इस गुलाबी ठंड में भी पसीने चुआने के लिए मजबूर करते हैं।

हरियाणा में तो किसी तरह जोड़ तोड़ कर सरकार बन गई है, लेकिन देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई में अपने ही सबसे पुराने गठबंधन वाले दक्षिणपंथी दल शिवसेना से गहरे आघात प्रतिघात के लिए साम, दाम, दंड और भेद के वे तमाम अस्त्र निकाल लिए गए हैं, जिसका इस्तेमाल अभी तक विपक्ष और देश की जनता के विभिन्न हिस्सों के लिए किया जाता रहा है।

पूंजीवाद की 90 के दशक की अजेय हंसी आज उसी का मुहं चिढ़ा रही है। ट्रंप की यह उद्घोषणा कि समाजवाद मर चुका है, उसके ही दरवाजे पर दस्तक दे रही है। भारत जैसे मुल्क में जहां लगता है कि परंपरागत वाम ने अपने आक्रामक तेवर छोड़ संसदीय मार्ग में उलझन भरी सीढ़ियों में कहीं न कहीं खुद को गुम कर लिया है, लेकिन मार्क्स की भविष्यवाणी कहीं न कहीं आज ज्यादा गहरे में उतर रही है कि अपने लिए अधिक से अधिक लाभ के लिए पूंजी खुद को भस्मासुर के रूप में अवतरित करती है। उसने सर्वहारा के साथ-साथ इस बार एक विशाल सचेतन मध्य वर्ग को भी जन्म दिया था, जिसे वह अब मार-मार कर सर्वहारा की श्रेणी में खड़ा कर रही है। इस वर्ग के पास न सिर्फ बेहतर चेतना शक्ति है, बल्कि इसके पास सूचना क्रांति का वह हथियार भी है जिसे शासक वर्ग ने भले ही अपने हित में अभी तक इस्तेमाल करने में सफलता पाई हो, लेकिन देर सवेर यह उसके ही खात्मे का कारण बनेगी।

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