शहर छोड़ने वाले मजदूरों को पीसने के लिए तैयार है गांव की जातिवादी चक्की

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बिहार के गाँवों से बहुत सारे मज़दूर दो पैसा कमाने के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों में पलायन करते हैं। कोरोना संकट के बाद अब वे मजबूरन घर लौट रहे हैं। मगर क्या गाँव उनको राह़त दे पायेगा? 

इतना तो ज़रूर है कि घर लौटकर प्रवासी मज़दूर और उनके घर वाले अपार ख़ुशी का अनुभव कर करेंगे। मगर यह तब संभव है जबकि वह सही सलामात घर पहुँच जाएँ। हजारों मील का सफ़र पैदल तय करना जान को जोखिम में डालना है। अगर उन्हें ट्रेन मिल भी गयी तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सही टाइम पर अपनी मंज़िल तक पहुँच जाएगी। ट्रेनें लेट हो रही हैं, रास्ता भटक जा रही हैं, लोग गाड़ियों में भूखे मर जा रहे हैं। 

अगर कोई मज़दूर जीवित घर पहुँच भी जाये तो कब तक वह और उसका परिवार गाँव में भूख से लड़ पायेगा यह भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

इस समय मुझे मीठी (नाम काल्पनिक) की याद आ रही है, जो मेरे ही गाँव के एक प्रवासी मज़दूर की फूल सी नन्ही बेटी है। उम्मीद करता हूँ कि उसके पापा सकुशल घर पहुँच गये होंगे। पापा को घर पर देखकर वह गौरैया की तरह फुदक रही होगी। उसकी मुस्कान पापा के सारे कड़वे अनुभव में शक्कर घोल रही होगी।

श्रमिक ट्रेन।

जब कभी मीठी के दोस्त ‘कुरकुरे’ और ‘मोटू-पतलू’ उसे खाने को नहीं देते हैं तो वह फ़ौरन उन्हें धमकी देती है, “मेरे पापा जब कमा के आयेंगे तो बहुत सारा कुरकुरे, मोटू पतलू, फ्रूटी लायेंगे…मैं भी तुम लोगों को नहीं दूंगी।” 

मीठी की माँ भी ख़ुश ज़रूर होंगी। अपने जीवनसाथी के बिना लम्बा समय काटने का एहसास शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता है। मीठी के पापा मेरे हम-उम्र हैं। सालों पहले मैं आला तालीम ह़ासिल करने के लिए शहर आ गया। वह किसी स्टील फैक्ट्री में काम करने के लिए परदेश निकल पड़े। 

मीठी के पापा को देखने के लिए आस-पड़ोस के लोगों का जमावड़ा भी लगा होगा। जब भी कोई बाहर से कमा कर घर लौटता है तो मिठाई बांटना लाज़मी होता है। अभी भी मेरे गाँव के अधिकतर लोग मिठाई अकसर सपनों में ही खाते हैं। ख्वाबों से बाहर उनको मिठाई किसी परदेशी के घर लौटने पर ही मिलती है। यह कहना मुश्किल है कि इस बार मीठी के पापा घर मिठाई ले कर गये होंगे।

मगर गाँव के अपने कड़वे अनुभव भी हैं। मुमकिन है कि गाँव वाले मीठी के पापा को सरहद पर ही रोक दिए हों। उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस भी बुलाई गयी हो। डर इस बात का भी है कि उनको किसी गाँव के स्कूल में ‘क्वारंटाइन’ भी कर दिया गया हो। अगर वे बदकिस्मत निकले तो उन्हें मक्खी, मच्छर, छिपकली, चूहा, सांप, बिच्छू के साथ भी समय काटना पड़ेगा। खाने में उन्हें बेरंग खिचड़ी भी परोसा गया हो। नरक से भी ज्यादा गंदे शौचालय में जाने के लिए उन्हें विवश किया गया हो। 

अगर मान भी लें कि मीठी के पापा को इन सब अज़ीयतों से न गुज़रना पड़ा हो, फिर भी गाँव की बेशुमार मुसीबतों से वह कैसे बच सकते हैं?

किताब में गाँव को पढ़ने और जानने वालों के लिए गाँव एक ‘स्वर्ग’ है। यह ‘इंद्रलोक’ के सामान है। यह “सद्भाव” और “सहयोग” का संगम है। यह भारत की “आत्मा” है। यह “पश्चिमी सभ्यता” और “मैटेरियलिज़म” का सही विकल्प है। फिर गाँव को “शांति” और “सुख” का पर्यायवाची कहा गया।   

यह ग़लतफ़ह़मी दरअसल उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने फ़ैलाया। लंदन में पढ़े और फिर धोती-धारण करने वाले एक ‘फक़ीर’ ने इसे क़ौमी तह़रीक में सच बताकर प्रचारित किया। इसका इस्तेमाल देशी बनाम विदेशी और राष्ट्रीयता बनाम साम्राज्यवाद की राजनीति के तहत किया गया। 

मगर मीठी के पापा को और अन्य मजदूरों के लिए गांव शहर की ही तरह शोषण और अत्याचार का अड्डा है। जहाँ गाँव और शहर की समस्याओं के ‘फॉर्म’ में कुछ अंतर है, वहीं गहराई में जाने पर उनके बीच बहुत सारी समानतायें भी दिखती हैं। 

प्रवासी मजदूर घरों को लौटते हुए।

यह बात सुकूनदायक है कि गाँव की हवा शहर की तरह ज़हरीली नहीं है। पानी भी गाँव में चांपाकल और कुएं से मिल जाता है। मगर यह भी सत्य है कि ज़्यादातर कुएं ठाकुर के हैं। चांपाकल और नलके भी सवर्णों की बस्तियों में अधिक संख्या में हैं। अब गाँव में भी पानी पैसे से बिकना शुरू हो गया है। 

एक और राहत है कि गाँव में लोग फुटपाथ, फ्लाईओवर, नाला और गटर पर सोने के लिए मजबूर नहीं हैं। मगर गाँव में भी ‘डिसेंट’ मकान ज़्यादातर द्विज को ही मयस्सर है। कुछ के पास सोने के लिए “दीवान” पलंग है, जिस पर मखमली बिस्तर सजा हुआ रहता है। दूसरी तरह बहुत तो बांस के मचान पर फटी चादर डाल कर लेट जाते हैं। मीठी के पापा भी इन मुसीबतों से अनजान नहीं हैं। 

 रुपये के बगैर चावल और आटा न शहर में मिल सकता है, और न ही गाँव में। अब भी गाँव की ज़्यादातर ज़मीनों पर क़ब्ज़ा उन ‘खुशनसीबों’ का है जो कुछ खास जातियों में पैदा होते हैं। 

एक तरफ “मालिकों” के पास कई-कई एकड़ में फुलवारी और बाग-बगीचा लगाया गया है। वहीं बाकी जनता के पास ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन के पास मिट्टी, तालाब, अनाज, खेत, खलिहान, कुआं, घर कुछ भी नहीं है। वे मज़दूरी करते हैं तो पेट भर पाते हैं।   

जो लोग ‘गाँव’ का बखान करते नहीं थकते, वे इन हकीकतों को दबा जाते हैं। वे यह भी नहीं बताते कि दलित बस्ती में रहने वाला मज़दूर प्यास बुझाने के लिए कैसे पानी के लिए तरसता है। वहीं जब हलकी बारिश हो जाये, तो उसका घर तालाब सा बन जाता है। बिस्तर के नीचे थाली और बर्तन कागज की कश्ती की तरह तैरने लगते हैं। 

साइकिल पर घर जाते मजदूर।
तेलंगाना से झारखंड के लिए जाते मजदूर।

गाँव को सुकून और सहयोग की जगह कहने वाले यह भी नहीं कहते कि खेत में पसीना किसी और का बहता है और अनाज पर नाग की तरह कुंडली मार कोई और बैठ जाता है। यही नहीं मज़दूरों को बेगारी भी तो करनी होती है। दिन भर खून-पसीना बहाने पर हाथ में सिर्फ 200 से 300 रूपये आते हैं। खेत में काम करने वाले मज़दूरों को और भी कम पैसा मिलता है। 100 रुपये मज़दूरी पाने के लिए 20 मुट्ठा धान के पौधे पहले उखाड़ने होते हैं और फिर उसे कीचड़ में रोपना होता है। धान रोपते-रोपते पैर की अंगुलियाँ सड़ जाती हैं। फिर इलाज के नाम पर जलती तेल की बूंदें घाव पर टपकाई जाती हैं जो बड़ा कष्टदायक होता है। 

गाँव में मज़दूरी भले ही कम मिले, मगर चीज़ों के दाम थोड़े कम हैं। चावल, आटा, दाल की क़ीमतें शहरों के बराबर ही हैं। दूध भी 40 रुपये लीटर मिलता है. पॉकेट की चायपत्ती भी शहरों के रेट में ही बिकती है। साग-सब्ज़ी की क़ीमत में भी कोई ज़्यादा अंतर नहीं है। मेरे गाँव में तो अब छोटे शहरों से सब्जी उल्टा ख़रीद कर रेहड़ी वाले बेचते हैं। इससे क़ीमतें और भी बढ़ जाती हैं। मोबाइल रीचार्ज भी गाँव में उतना ही महंगा है जितना शहर में है।

यह सब देख कर मुझे डर है कि मीठी के पापा क्या उसे ‘कुरकुरे’, ‘मोटू-पतलू’ और ‘फ्रूटी’ नहीं दे पायेंगे। 

जेब में पैसे न भी हों तब भी खर्च नहीं रुकता है। इस तरह गाँव के ज़रूरतमंदों को क़र्ज़ लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। गाँव में क़र्ज़ में डूबना वैसा ही है जैसा चूहा रोटी की तलाश में चूहेदानी में फंस जाता है। 

मूलधन के अलावा हर माह 5 से 10 रुपए सैकड़ा सूद देना सब के लिए थोड़े आसान है। हर महीने सूद मूलधन में जुड़ता चला जाता है, जिसे हिसाब में ‘चक्रवृद्धि ब्याज’ कहते हैं। एक पल के लिए कोई भूख घास खाकर भी मिटा  सकता है, मगर जब कोई अपना बीमार पड़ जाये तो मोह़ताजों को धनाड्य सेठ के पैरों में मजबूरन नाक रगड़ना पड़ता है। 

ऊपर से गाँव में छुआछूत और भेदभाव का चलन आज भी बरकरार है। मजाल है कि कोई अवर्ण सवर्णों के घर जा कर उनके ग्लास में पानी पी ले! जाति और वर्ग पर आधारित असमानता सूरज चाँद की तरह ही आज भी प्रत्यक्ष है। इस गुलामी से मुक्ति पाने के लिए ही तो मीठी के पापा वर्षों पहले शहर भागे थे। 

मगर देश के पत्थर-दिल शहर ने भी मजदूरों को सिर्फ लूटा। कोरोना के दौर में  जान बचाकर मीठी के पापा और उनके जैसे करोड़ों मज़दूर आज गाँव पहुंचे हैं। एक बार फिर गाँव की अमीरी-ग़रीबी और ऊंच-नीच की चक्की उन्हें पिसने के लिए तैयार रहना है। 

(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं। इनकी दिलचस्पी माइनॉरिटी और सोशल जस्टिस से जुड़े सवालों में है। आप अपनी राय इन्हें [email protected] पर भेज सकते हैं।)  

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