एचआईवी सेल्फ-टेस्ट लागू करने की मांग

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एचआईवी सेवाएं मिलने के लिए जो ‘प्रवेश द्वार’ है वह एचआईवी टेस्ट है। भारत में हर 4 में से 1 एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति को यह पता ही नहीं है कि उसको एचआईवी संक्रमण है। एचआईवी सेल्फ-टेस्ट (आत्म-परीक्षण)- जिसे 98 देशों में एड्स कार्यक्रम में शामिल किया गया है और 52 देशों में उसको नियमित उपयोग किया जाता है- यदि इसको भारत में भी उपलब्ध करवाया जाये तो एचआईवी परीक्षण दर बढ़ सकती है, यह कहना है डॉ ईश्वर गिलाडा का, जो दिल्ली में आयोजित एचआईवी/एड्स विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के 14वें राष्ट्रीय अधिवेशन (एसीकॉन) अध्यक्ष हैं, और वर्तमान में एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के भी अध्यक्ष हैं।

भारत समेत सभी सरकारों ने 2030 तक एड्स उन्मूलन का वादा किया है। इसके लिए यह ज़रूरी है कि हर एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति को यह पता हो कि उसे एचआईवी है, उसको जीवनरक्षक एंटीरिट्रोविरल दवाओं के साथ-साथ सभी एचआईवी सेवाएं मिल रही हों और उसका वायरल लोड नगण्य रहे। वायरल लोड नगण्य रहेगा तो एचआईवी किसी और को संक्रमित होने का ख़तरा भी नहीं रहेगा और एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति स्वस्थ और भरपूर जीवन जी सकेगा।

एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया का 14वां राष्ट्रीय अधिवेशन (एसीकॉन) दिल्ली में 17-19 मार्च 2023 के दौरान हो रहा है। एसीकॉन हर साल अनेक एचआईवी-सम्बंधित संस्थाओं की साझेदारी में एड्स सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित किया जाता रहा है, जिनमें प्रमुख हैं- भारत सरकार की राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्था, भारत सरकार का राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र का एड्स नियंत्रण संयुक्त कार्यक्रम, आदि।

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि इस अधिवेशन में भारत के सरकारी और निजी एचआईवी सम्बन्धी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से जुड़े चिकित्सकीय और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। इनके साथ, श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, दक्षिण अफ़्रीका, इंग्लैंड, अमरीका आदि के एड्स विशेषज्ञ भी भाग ले रहे हैं।

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि वर्तमान में भारत में 23 लाख लोग एचआईवी के साथ जीवित हैं जिनमें से 77% को परीक्षण से यह मालूम है कि वह एचआईवी संक्रमित हैं, इनमें से 84% लोगों को जीवनरक्षक एंटी-रेट्रो-वाइरल दवाएं मिल रही हैं और जिन लोगों को वाइरल-लोड जांच नसीब हुई उनमें से 85% में वाइरल-लोड नगण्य है।

एचआईवी सेल्फ-टेस्ट (आत्म-परीक्षण) को लागू करने की मांग

2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एचआईवी सेल्फ-टेस्ट को एड्स संबंधित मार्गनिर्देशिका (गाइडलाइंस) में शामिल किया है। तब से दुनिया के सभी देशों में से आधे देशों ने भी इसको शामिल किया है और एक-चौथाई ऐसे देश हैं जहां इसको नियमित उपयोग में लाया जा रहा है। परंतु भारत में इसको अभी जारी नहीं किया गया है जब कि एक-चौथाई एचआईवी के साथ जीवित लोगों को एचआईवी टेस्ट अभी मुहैया तक नहीं।

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि एचआईवी सेल्फ-टेस्ट जारी करने से, शोध के मुताबिक़, एचआईवी परीक्षण दर बढ़ती है, विशेषकर उन समुदाय में जिन्हें एचआईवी से संक्रमित होने का ख़तरा अधिक है, और सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं संभवत: उन तक न पहुंच रही हों। भारत की आबादी में एचआईवी संक्रमण दर 0.21% है परंतु घुमंतू श्रमिकों में 4 गुना अधिक है, ट्रक चालकों और कर्मियों में 5 गुना अधिक है, जेल और महिला-यौनकर्मियों में 9 गुना अधिक है, समलैंगिक पुरुषों में 16 गुना अधिक है, हिजड़ा/ ट्रांसजेंडर समुदाय में 18 गुना अधिक है, और जो लोग मादक पदार्थों/नशों का इंजेक्शन द्वारा सेवन करते हैं उनमें 43 गुना अधिक है।

रेट्रोवायरस और अवसरवादी संक्रमणों के अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन (सीआरओआई 2022) में प्रकाशित शोध के अनुसार, एचआईवी सेल्फ-टेस्ट को ऑनलाइन माध्यमों से उपलब्ध करवाने से भी एचआईवी परीक्षण दर बढ़ी और जिन समुदाय को एचआईवी का ख़तरा अधिक है, उनमें बढ़ी। ‘पाथ’ रिपोर्ट 2022 के अनुसार, भारत में एचआईवी सेल्फ-टेस्ट के समर्थन में ही प्रमाण आये।

इसीलिए डॉ ईश्वर गिलाडा के नेतृत्व में 14वें एसीकॉन और एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया ने भारत सरकार से अपील की कि बिना विलंब एचआईवी सेल्फ-टेस्ट को राष्ट्रीय एचआईवी/एड्स कार्यक्रम में शामिल किया जाये, और एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के एचआईवी चिकित्सक और विशेषज्ञ, जो भारत के विभिन्न प्रदेशों में कार्यरत हैं, वह अपना तकनीकी सहयोग देने के लिए उपलब्ध हैं।

एचआईवी टेस्ट न होगा तो कैसे एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति स्वस्थ रहेगा?

शोध द्वारा यह प्रमाणित है कि एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति स्वस्थ और भरपूर जीवन जी सकता है, और सामान्य जीवन यापन कर सकता है। परंतु यह तब ही मुमकिन है जब हर एचआईवी पॉजिटिव इंसान को एचआईवी जांच मिल सके। यदि किसी भी कारणवश एचआईवी जांच उसको नहीं मिल पा रही है तो संभवत: एचआईवी सेल्फ-टेस्ट के उपयोग से वह परीक्षण करवाये और फिर एचआईवी की व्यापक स्वास्थ्य सेवा और परामर्श से जुड़े। उसको जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवाएं मिलनी ज़रूरी हैं और उसका वायरल लोड नगण्य रहना ज़रूरी है जिससे कि वह स्वस्थ रहे, और उससे किसी को भी एचआईवी संक्रमण फैलने का ख़तरा भी न रहे।

जांच नहीं होगी तो कोई भी ज़रूरतमंद इंसान, एचआईवी व्यापक स्वास्थ्य और परामर्श सेवाओं से भी वंचित रह जाएगा। न यह जन स्वास्थ्य की दृष्टि से सही है और न ही मानवाधिकार की दृष्टि से। यदि सरकार को 2030 तक एड्स उन्मूलन का सपना साकार करना है तो इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि एचआईवी जांच सभी ज़रूरतमंद तक पहुंचे।

जैसे सेल्फ-टेस्ट (आत्म-परीक्षण) ने गर्भावस्था में जन स्वास्थ्य को लाभान्वित किया है, डायबिटीज सेल्फ-टेस्ट (मधुमेह आत्म-परीक्षण) ने भी जन स्वास्थ्य को लाभान्वित किया है, कोविड-19 सेल्फ टेस्ट ने भी सकारात्मक मदद की है कि लोग सहजता से जांच कर सकें और संक्रमण नियंत्रण और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक कदम उठा सकें। तब एचआईवी सेल्फ-टेस्ट क्यों नहीं?

(शोभा शुक्ला, बॉबी रमाकांत- सीएनएस की प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

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