Saturday, March 2, 2024

गाजियाबाद: झुग्गी-बस्ती गिराने पर हाईकोर्ट की रोक, अदालत ने मांगी पुनर्वास कार्ययोजना

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद, कौशांबी में रैडिसन ब्लू होटल के पीछे भोवापुर श्रमिक बस्ती के लोगों को राहत देते हुए गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा किए जा रहे बस्ती के ध्वस्तीकरण पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। कोर्ट का कहना था कि दुनिया भर में कोरोना महामारी फैली है, ऐसे में सभी वर्गों, खास कर कमजोर वर्ग की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। कोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से इनके पूर्ण पुनर्वास योजना के साथ जवाब मांगा है। साथ ही कोर्ट ने बस्ती के लोगों को बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने के लिए भी कहा है। याचिका पर अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी।

यह आदेश चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने देव पाल की जनहित याचिका पर दिया है। खंडपीठ ने कहा है कि विश्व में कोरोना महामारी फैली है। ऐसे में सभी खासकर कमजोर वर्ग के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। जिन लोगों के आवास ध्वस्त किए गए हैं, जिला प्रशासन उनके लिए अस्थायी आवास का इंतजाम करे।

खंडपीठ ने राज्य को यह भी निर्देश दिया है कि वह सुनवाई की अगली तारीख पर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के पुनर्वास के लिए कार्ययोजना लेकर आए। खंडपीठ ने कहा है कि जब पूरी दुनिया महामारी का सामना कर रही है, तो यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सभी की रक्षा करे, विशेष रूप से कमजोर वर्गों की आबादी को किसी भी कठिनाई से बचाए जो उनकी दुर्दशा को प्रतिकूल रूप से बढ़ा सकती है।

खंडपीठ ने कहा है कि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण भोवापुर बस्ती के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पुनर्वास योजना पर विचार करे, तब तक बस्ती के लोगों को मूलभूत सुविधाएं बिजली, पानी, चिकित्सा आदि मुहैया कराई जाए। विकास प्राधिकरण के गठन के समय 1990 से रोजगार के लिए आए देश के विभिन्न हिस्सों के श्रमिकों ने बस्ती बना ली। उनके पुनर्वास की व्यवस्था के बिना ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। 150 आवास ध्वस्त किए जा चुके हैं। जीडीए का कहना है कि बस्ती अवैध है। हाई कोर्ट ने ही सॉलिड वेस्ट डिस्पोजल यूनिट स्थापित के लिए कार्रवाई का निर्देश दिया है। इसके तहत ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। खंडपीठ ने कहा कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेदखल करना सही नहीं है। खंडपीठ ने प्राधिकरण से पूरी योजना तैयार कर दाखिल करने का निर्देश दिया है।

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण भोवापुर बस्ती के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पुनर्वास योजना पर विचार करे। तब तक बस्ती के लोगों को मूलभूत सुविधाएं बिजली, पानी, चिकित्सा आदि मुहैया कराई जाए। भोवापुर बस्ती में देश के विभिन्न हस्सों से रोजगार के लिए आने वाले श्रमिकों की बस्ती है। यह बस्ती विकास प्राधिकरण के गठन के समय 1990 से ही अस्तित्व में आ गई थी। उनके पुनर्वास की व्यवस्था किए बगैर ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। याची का कहना है कि अभी तक 150 आवास ध्वस्त किए जा चुके हैं। लोग आसमान के नीचे रह रहे हैं।

उक्त बस्ती में 1990 से देश भर के मजदूर रहते हैं। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि जिला प्रशासन, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश योजना एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 26-ए के परंतुक के तहत निर्धारित उनके पुनर्वास के लिए कोई मुआवजा/वैकल्पिक भूमि प्रदान किए बिना इन निवासियों को हटाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। आरोप है कि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के कहने पर स्थानीय प्रशासन ने नौ अक्तूबर को बस्ती के कुछ मकानों को क्षतिग्रस्त कर दिया और रहवासियों को बेदखल करने का प्रयास किया। इस प्रकार बस्ती में मकानों को पूरी तरह गिराने की आशंका जताते हुए रिट याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ताओं ने उक्त बस्ती के सभी निवासियों के पूर्ण पुनर्वास की मांग की है और अदालत से आग्रह किया है कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों पर लागू सभी प्रासंगिक पुनर्वास नीतियों का आह्वान किया जाए। उन्होंने गैरकानूनी विध्वंस के लिए प्रत्येक निवासियों को मुआवजे के रूप में दिए जाने वाले 20,000 रुपये के मुआवजे की भी मांग की।

खंडपीठ ने निर्देश दिए हैं कि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण अगले आदेश तक भोवापुर बस्ती में स्थित मकानों को गिराने की कार्रवाई नहीं करेगा। जिला प्रशासन, गाजियाबाद भोवापुर बस्ती के उन निवासियों को अस्थायी आश्रय प्रदान करेगा, जिनके घर पहले ही ध्वस्त किए जा चुके हैं। विकास प्राधिकरण और राज्य, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास उपलब्ध कराने की व्यवहार्यता को देखेंगे। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा अगले आदेश तक भोवापुर बस्ती के निवासियों को लाइट और पानी सहित आवश्यक सुविधाएं प्रदान करने के लिए अस्थायी उपाय के रूप में सभी आवश्यक व्यवस्थाएं करें तथा भोवापुर बस्ती के निवासियों को सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं भी प्रदान की जाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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