Monday, October 25, 2021

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जेएनयू में छात्र आंदोलन: शिक्षा व्यवस्था को बौद्धिक अपंग बना देने की मुहिम

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जेएनयू में मनमानी फीस के बढ़ते विरोध के कारण सरकार ने छात्रों के दमन के लिए कैंपस को सीआरपीएफ जवानों से भर दिया है। शिक्षा का संघी मॉडल यही है कि फ़र्ज़ी डिजिटल डिग्री वाले व्यक्ति सम्राट और मंत्री बनेंगे और असली डिग्री के लिए मेहनत करने वाले लोग बढ़ती फ़ीस, जातिगत भेदभाव आदि के कारण कैंपसों से बाहर कर दिए जाएंगे। शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बर्बाद करके देश को बौद्धिक अपंग बना देने की मुहिम चल रही है। आखिर कैसा न्यू इंडिया चाहते हैं आप? क्या ये कृत्य देश को विश्व गुरु बनाने की राष्ट्रवादी स्कीम है?

आएबीआई के पूर्व गवर्नर राजन ने कहा था कि विश्वविद्यालय ऐसे सुरक्षित संस्थान होने चाहिए जहां बहस और चर्चाएं चलती रहें और किसी को भी राष्ट्र विरोधी बताकर चुप नहीं कराया जाए। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात भी कही थी, ‘हमें विश्वविद्यालयों का ऐसे स्थान के रूप में सम्मान करना चाहिए जहां विचारों पर चर्चा होती हों।’

उच्च शिक्षा का अर्थ है, सामान्य रूप से सबको दी जाने वाली शिक्षा से ऊपर किसी विशेष विषय या विषयों में विशेष, विशद तथा सूक्ष्म शिक्षा। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के बाद शिक्षा का यह तृतीय स्तर है जो प्राय: ऐच्छिक होता है। इसके अन्तर्गत स्नातक, परास्नातक और व्यावसायिक शिक्षा, शोध एवं प्रशिक्षण आदि आते हैं। जिस देश के शिक्षण संस्थान फर्जी राष्ट्रवाद का राजनीतिक अड्डा हो, जहां विचारों, बहस और वैज्ञानिक शोध की जगह पर अंधविश्वास और पाखण्ड का प्रपंच हो, क्या वहां उच्च शिक्षा के वास्तविक रूप के दर्शन हो सकते हैं?

यही कारण है कि विश्वगुरु का नारा बुलंद करने वाले इस देश के शिक्षण संस्थान आज भी ही दुनिया की टॉप थ्री हंड्रेड शिक्षण संस्थान में भी जगह नहीं बना पाता है। दुनिया भर में विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में हुए शोध में से एक तिहाई अमरीका में होते हैं। इसके ठीक विपरीत भारत से सिर्फ़ तीन फ़ीसदी शोध पत्र ही प्रकाशित हो पाते हैं।

हमारे कवि-दार्शनिक अज्ञेय ने भी लिखा था, ‘हमारे हाथ मुक्त हों, हमारा हृदय मुक्त हो, हमारी बुद्धि मुक्त हो: इससे बड़ी सफलता न हमारी शिक्षा हमें दे सकती है, न हम अपनी शिक्षा को दे सकते हैं।’ …लेकिन धर्म, आस्था, पाखण्ड, अंधविश्वास, वर्गभेद, फर्जी राष्ट्रवाद के प्रति जकड़न फैलाने वाले देश के शिक्षण संस्थाओं में मुक्ति शब्द का मतलब भला कैसे परिभाषित होगा?

कुछ वर्ष पहले मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर ने एलान किया था, ‘आने वाले दिनों में ज्ञान का समाज दुनिया के किसी भी समाज से ज़्यादा प्रतिस्पर्धात्मक समाज बन जाएगा। दुनिया में गरीब देश शायद समाप्त हो जाएं लेकिन किसी देश की समृद्धि का स्तर इस बात से आंका जाएगा कि वहां की शिक्षा का स्तर किस तरह का है।’

इस समय देश की लगभग आधी आबादी 30 वर्ष से कम उम्र की है। अगर उन्हें ज्ञान और हुनर से लैस कर दिया जाए तो ये अपने बूते पर भारत को एक वैश्विक शक्ति बना सकते हैं, लेकिन हर साल भारतीय स्कूल से पास होने वाले छात्रों में महज 15 फ़ीसदी छात्र से भी कम विश्वविद्यालयों में पढ़ने जा पाते हैं। इकीसवीं सदी की उच्च शिक्षा को तब तक स्तरीय नहीं बनाया जा सकता जब तक भारत की स्कूली शिक्षा उन्नीसवीं सदी में विचरण कर रही हो।

भारत सरकार ने भी शिक्षा मंत्रालय कहना बंद कर मानव संसाधन मंत्रालय कहना शुरू कर दिया है। ब्रिटेन में अब इसे शिक्षा और कौशल मंत्रालय कहा जाने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में इसे शिक्षा, रोज़गार और कार्यस्थल संबंध मंत्रालय कहा जाता है।

एनआईआईटी के संस्थापक राजेंद्र सिंह पवार कहते हैं, ‘अब उस जाति व्यवस्था से छुटकारा पाने की ज़रूरत है जिसने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था को जन्म दिया है जहां अगर एक इंसान व्यवसायिक शिक्षा लेने के लिए ट्रेन से उतरता है तो उसे बाद में उच्च शिक्षा के डिब्बे में सवार होने की अनुमति नहीं होती है।’

जेएनयू की स्थापना के वक्त इससे जुड़ने वाले शिक्षाविदों में शामिल थापर ने कहा है कि बहस की स्वतंत्रता न देना और केवल आधिकारिक विचारों को महत्व देना, इस बात की ओर इशारा है कि जो सत्ता में हैं कहीं न कहीं खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

उच्च शिक्षा के तीन निर्धारित उद्देश्य हैं, शिक्षण, शोध एवं विस्तार कार्य और इन तीनों उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम होता है, पाठयक्रम। दुखद यह है कि सरकार शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में झूठे इतिहास, झूठे मनगढ़ंत धार्मिक किस्से को डालकर युवाओं के बौद्धिक प्रवाह को गोबर और मूत्र के नाले में गिरा देना चाहती है ताकि आसानी से धर्म और फर्जी राष्ट्रवाद रूपी कीड़े उसके संपूर्ण मानवीय स्तर और बौद्धिक स्तर के अस्तिव को संक्रमित कर सके।

(दयानंद शिक्षाविद होने के साथ ही स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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