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पाटलिपुत्र की जंगः महागठबंधन के बेरोजगारी एजेंडे के सामने फीकी पड़ी एनडीए की धार

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा बनता नजर आ रहा है। सरकार बनने पर 10 लाख युवाओं को रोजगार देने के तेजस्वी यादव के वादे के साथ शुरू हुई बहस के आगे अब एनडीए मजबूर नजर आने लगा है। सीमा पर आतंकवाद और सुरक्षा से लेकर हिंदुत्व के एजेंडे पर अपनी चुनावी राजनीति को सजाने वाली बीजेपी बिहार में विपक्ष के एजेंडे के इर्द-गिर्द ही अब नजर आ रही है। कल तक महागठबंधन के बेरोजगारी के मुद्दे पर तंज कसने वाली बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में 19 लाख लोगों को रोजगार देने की घोषणा कर अपनी परेशानी को खुद-बखुद बयां कर दिया है।

चुनावों में मुद्दा आधारित राजनीति के बजाये सत्ता और प्रतिपक्ष के एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले करने की कोशिश होती रही है। खासकर वर्ष 2014 से देश में हिंदुत्व के एजेंडे पर सवार होकर आई भाजपा ने केंद्र में अपनी राजनीतिक सफलता के बाद राज्यों में भी इस प्रयोग को आगे बढ़ाया। मौजूदा समय में भी योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में उत्तर प्रदेश प्रयोग स्थली के रूप में बना हुआ है। इसी कोशिश को बिहार विधानसभा चुनाव में भी प्रभावी बनाने की भाजपा ने तैयारी कर रखी है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद बिहार चुनाव के लिए दूसरे नंबर के स्टार प्रचारक के रूप में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम है।

एनडीए ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत से ही लालू राज के 15 वर्ष बनाम नीतीश राज के 15 वर्ष को लोगों के सामने रखने की कोशिश की है। नीतीश जहां सभाओं में लालू राज को याद दिलाते हुए उनसे सचेत रहने की लोगों से अपील करते दिख रहे हैं, वहीं तेजस्वी यादव ने चाचा के नाम से मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए उनके 15 साल के कार्यकाल को लूट और भ्रष्टाचार का बताते हुए घेरने की कोशिश की है। इन सबसे इतर भाजपा अपने चुनावी अभियान की शुरुआत एक बार फिर हिंदुत्व और सांप्रदायिक उन्माद के एजेंडे के साथ करते दिखी। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने चुनावी सभा में यहां तक कह डाला कि अगर बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी तो कश्मीर से आतंकवादी आ जाएंगे, जबकि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा वामपंथी दलों के साथ राजद के गठबंधन को रक्त रंजित तस्वीर बनाने की बात कर रहे हैं।

उधर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी सरकार की पून: वापसी पर सात निश्चय के सेकेंड फेज शुरू करने की दुहाई दे रहे हैं। साथ ही तेजस्वी के 10 लाख युवाओं को रोजगार देने के मुद्दे को खारिज करते हुए कई बार यह दोहरा चुके हैं कि बिहार में कोई समुद्र नहीं है। समुद्र के किनारे ही बड़े उद्योग लगाए जा सकते हैं। धन के संकट की दलील देते हुए नीतीश कुमार तेजस्वी पर तंज कसते हैं कि आखिर इतने लोगों को रोजगार देने के लिए पैसे कहां से आएंगे? ऊपर से आएगा कि नकली नोट मिलेगा या जेल से आएगा?

भाजपा और जदयू के इन बयानों के साथ ही उनके अंदर की एक बेचैनी भी साफ दिख रही है। राजनीतिक समीकरण पर मंथन करने वालों का कहना है कि तेजस्वी यादव के बेरोजगारी के सवाल पर एनडीए के ऊपर लगातार हमलावर रुख और सभाओं में युवाओं की बड़ी भीड़ को सकारात्मक नजरिए से देखा जा रहा है।

बेरोजगार दिवस के साथ ही हमलावर दिखा विपक्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17 सितंबर को जन्मदिवस पर विपक्ष ने बेरोजगार दिवस मनाने का एलान कर देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी। कांग्रेस समेत तकरीबन सभी विपक्षी दलों ने बेरोजगार दिवस मना कर केंद्र सरकार पर हमले की कोशिश की। यह माना जा रहा है कि इसके बाद से ही बेरोजगारी के सवाल पर तेज हुई बहस ने बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद इसे मजबूत मुद्दा बना दिया।

सोशल मीडिया पर भी बेरोजगारी बना मुद्दा
गोदी मीडिया के खिलाफ सोशल मीडिया को जनपक्षधर राजनीति के बहस का प्लेटफार्म बनाने की एक कोशिश हाल के वर्षों में दिखी है। इसको लेकर एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर अपनी बहस को केंद्रित करने की कोशिश करता है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री के जन्मदिन को बेरोजगार दिवस के रूप में मनाने के विभिन्न संगठनों के अभियान को सोशल मीडिया पर वायरल होते देखा गया।  बेरोजगारी के सवाल पर अपने गीतों के माध्यम से लोक गायिका नेहा सिंह राठौर  सोशल मीडिया पर सबसे अधिक चर्चा में आई हैं। यह चर्चा अब देश के बड़े न्यूज़ चैनलों तक पहुंच गई है। नेहा के गीत सोशल मीडिया पर ‘बिहार में का बा’ ने खूब सुर्खियां बटोरी। इसका इस कदर असर रहा कि भाजपा को ‘इ बा’ के नाम से एक नया वीडियो जारी करना पड़ा। हालांकि नेहा के वीडियो को अब तक सबसे अधिक लाइक और कमेंट मिले हैं।

बेरोजगारी महागठबंधन का प्रमुख एजेंडा
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन के सभी प्रमुख घटक राजद, कांग्रेस और भाकपा माले ने अपने अलग-अलग घोषणा पत्र जारी किए हैं, जिसमें बेरोजगारी एक अहम सवाल है। सभी ने तेजस्वी यादव के सरकार बनने पर 10 लाख युवाओं को रोजगार देने की घोषणा पर मोहर लगाई है। भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने अपनी पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते हुए 10 लाख युवाओं को रोजगार देने के साथ ही शिक्षकों को समान काम समान वेतन तथा आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, रसोईया आदि को भी वेतनमान दिए जाने की बात कही है। कांग्रेस पार्टी ने भी बदलाव पत्र के नाम से जारी अपने घोषणा पत्र में 10 लाख रोजगार देने की बात दोहराते हुए 4:30 लाख युवाओं को तत्काल नौकरी देने और रोजगार न मिलने तक 1500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया है।

पूर्व से ही राजद बेरोजगारी के सवाल को लेकर काफी पहले से नीतीश सरकार पर हमलावर रहा है। चुनाव में बेरोजगारी को मुद्दा बनाने के इरादे से ही राजद ने पांच सितंबर को ‘बेरोजगारी हटाओ’ पोर्टल लांच किया था। पार्टी की ओर से बाकायदा टोल फ्री नंबर भी जारी किया गया है, जिस पर मिस्ड कॉल देना था। राजद का दावा है कि नौ लाख 47 हजार लोगों ने वेबसाइट पर स्वयं को रजिस्टर्ड कराया है, तो वहीं तेरह लाख 11 हजार लोगों ने मिस्ड कॉल दी। इस तरह 22 लाख 58 हजार से अधिक लोगों ने निबंधन कराया है।

बेरोजगारी के मुद्दे पर दबाव में दिख रही भाजपा
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ अब तक राजद के तेजस्वी यादव पर रोजगार देने के सवाल पर तंज कसने वाली भाजपा का रुख अचानक बदला हुआ नजर आ रहा है। 22 अक्तूबर को भाजपा की निर्मला सीतारमण ने चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए 19 लाख युवाओं को रोजगार देने की घोषणा की। इसमें चार लाख लोगों को तत्काल नौकरियां देने की बात शामिल है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार में बड़ा उद्योग लगा पाना संभव नहीं की दलील के बीच भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र के रूप में एक नया पैंतरा एक बार फिर एनडीए में एक बहस शुरू कर सकता है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि भाजपा और जदयू में सब कुछ ठीक नहीं है।

आंकड़ों में रोजगार की बेहाल तस्वीर
कोरोना काल में सबसे अधिक नौकरी गंवाने वालों में शामिल राज्यों में पहला नाम बिहार का है। ऐसे में कोरोना काल में देश में बिहार विधानसभा का हो रहा चुनाव सबसे पहला चुनाव है, तो बेरोजगारी मुद्दा बनना स्वाभाविक माना जा रहा था। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार वर्ष 2018-19 में देश में बेरोजगारी दर 5.8 फीसदी थी, जबकि बिहार का आंकड़ा 10.2% रहा। मौजूदा समय में बिहार का बेरोजगारी दर तकरीबन 12% है। यह सारे आंकड़े सरकारी एजेंसियों के हैं।

ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 में देश में एक लाख पर 199 पुलिसकर्मियों की तैनाती थी। बिहार में यह अनुपात एक लाख पर 131.6 है, जबकि बगल के राज्य झारखंड में एक लाख पर 221 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। बिहार में 50 हजार पुलिस के पद खाली हैं। इसी तरह जेई के 66 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं।

यूं ही मजबूर नहीं दिख रही भाजपा
बिहार विधानसभा चुनाव में वोटों के गणित को देख अचानक विपक्ष के बेरोजगारी के एजेंडे के साथ तकरीबन 15 साल तक सत्ता में रही भाजपा भी खड़ी दिख रही है। निर्वाचन आयोग के मुताबिक राज्य में कुल 7.29 करोड़ वोटरों में से 30 साल से कम उम्र के 1.67 करोड़ मतदाता हैं। वर्ष 18 से 19 वर्ष के उम्र के सात लाख 14 हजार ऐसे वोटर हैं, जो इस बार पहली बार मतदान करेंगे। जबकि 30 से 39 वर्ष औसत उम्र के मतदाताओं की संख्या 1.98 करोड़ है, जिन पर सभी दलों की निगाहें टिकी होना स्वाभाविक है।

(पटना से स्वतंत्र पत्रकार जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 23, 2020 12:22 pm

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