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न्यायिक मनमानियां नहीं छिपतीं मी लार्ड!

क्या अवमानना की न्यायिक धौंस की आड़ में न्यायिक मनमानियां छिपी रह सकती हैं? कम से कम सूचना विस्फोट के वर्तमान दौर में तो नहीं। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अवकाश ग्रहण कर लिया है। जाते-जाते जस्टिस गोगोई भी अपने पूर्ववर्ती चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के पद चिन्हों पर चलते नजर आए। एक ओर जस्टिस दीपक मिश्रा ने मेडिकल प्रवेश घोटाले में जिस तरह सारे विरोधों को नकारते हुए स्वयं सुनवाई की और पूरे प्रकरण को ख़ारिज करके दाखिल दफ्तर कर दिया और एक ईसाई तलाक मामले में मुस्लिमों के तीन तलाक मामले का स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई का मार्ग प्रशस्त किया उसी तरह से जस्टिस गोगोई ने अपने ऊपर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों पर अपने को क्लीन चिट दिलाया और जाते-जाते सबरीमाला की पुनर्विचार याचिका को सात जजों की पीठ में भेजने के साथ इसमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, अग्यारी में पारसी महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा भी जोड़ दिया। यही नहीं सरकार और न्यायपालिका में टकराव की नूराकुश्ती के बीच ऐसा कोई फैसला नहीं दिया जो सरकार के लिए किसी विशेष परेशानी का सबब बना हो, बल्कि सीबीआई विवाद से लेकर अयोध्या भूमि विवाद और राफेल सौदे तक के मामले में सरकार के अनुकूल फैसले देकर आर्थिक दुरावस्था से जूझ रही मोदी सरकार को संजीवनी ही प्रदान की।

जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता में राफेल सौदे में दोनों बार कहा कि कोर्ट ने आर्टिकिल 32 के तहत फैसला दिया है, जबकि फैसले में मेरिट पर भी राय व्यक्त की गई, जिसे चुनाव में भाजपा ने जमकर भुनाया। और तो और अयोध्या भूमि विवाद में मुसलमानों और बाबरी मस्जिद के पक्ष में कलमतोड़ राय देने के बावजूद विवादित भूमि मंदिर को देने का फैसला सुनकर प्रकारांतर से विवादित ढांचा ढहने और मस्जिद में मूर्तियां रखने को न्यायोचित ठहरा दिया। यही नहीं मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन मुसलमानों को देने की बात कहकर एक नया दांव खेल दिया। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दी जाने वाली पांच एकड़ भूमि यदि मुसलमानों ने स्वीकार कर लिया तो अन्य विवादित स्थानों के बदले जमीन देकर भाजपा अपना एजेंडा आगे बढ़ा सकती है और तब मुसलमान इनकार भी नहीं कर पाएंगे।

कश्मीर में अस्थायी राष्ट्रपति शासन के दौरान जिस तरह प्रशासनिक आदेश से धारा 370 ए हटाया गया और विभाजन करके पाबंदियां लगाई गईं, उसकी सुनवाई जस्टिस गोगोई के नेतृत्व में उच्चतम न्यायालय ने ढीले-ढाले ढंग से अब तक किया है। उससे सरकार राहत में ही है। फिर अधिकांश महत्वपूर्ण मामलों में या तो जस्टिस गोगोई ने स्वयं सुना या अपने चहेते जजों से सुनवाया, उसमें संविधान और कानून के शासन के बजाये राष्ट्रहित के दृष्टिकोण से आदेश पारित किए गए। प्रकारांतर से सरकार के फैसलों की पुष्टि की गई। वैसे तो मोदी सरकार के आगमन से लेकर अब तक उच्चतम न्यायालय का प्रदर्शन काफी बुझा-बुझा रहा है, लेकिन पहले जस्टिस दीपक मिश्रा के और फिर जस्टिस गोगोई के चीफ जस्टिस के कार्यकाल में उच्चतम न्यायालय संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने में काफी कमजोर सिद्ध हुआ है और सरकार के प्रति, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो की ही नीति पर चला है। दूसरे शब्दों में कहा जाइ कि यदि संविधान और कानून के शासन की अंधी देवी के बजाये चीन्ह-चीन्ह कर सरकार के पक्ष में न्यायपालिका फैसले करे तो इसे सरकार के सामने दंडवत होना ही माना जाएगा।

चार जजों के साथ ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जस्टिस गोगोई चीफ जस्टिस बनने के बाद अपने पूर्ववर्ती जस्टिस दीपक मिश्रा के कदमों पर ही चलते नजर आने लगे और वही सब होता रहा जो मुद्दे चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस में उठाए थे। जस्टिस अरुण मिश्रा को महत्वपूर्ण मामले जस्टिस दीपक मिश्रा सुनवाई के लिए देते थे, जस्टिस गोगोई ने भी जस्टिस अरुण मिश्रा को महत्वपूर्ण मामले सुनवाई के लिए दिए। हर महत्वपूर्ण मुद्दों को गैर महत्वपूर्ण बताकर सुनवाई में अतिशय विलंब जानबूझकर किया गया और न्याय में विलंब अन्याय है कि अवधारणा की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं। इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण कश्मीर मुद्दा है।

प्रशासनिक या न्यायिक पदों पर हितों के टकराव का मुद्दा अहम होता है और नैतिक शुचिता को देखते हुए लोग अपने को उस मामले से अलग रखते हैं, लेकिन उदहारण के लिए देखें तो क्या अत्यंत धर्मनिष्ट और धर्मभीरु होने के नाते क्या यह नहीं कहा जा सकता कि जस्टिस गोगोई को अयोध्या भूमि विवाद और सबरीमाला मामले की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए था। क्या यह हितों के टकराव का मामला नहीं है?

चीफ जस्जिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को  रिटायर हो गए। रविवार सुबह उन्होंने अपनी पत्नी रुपांजलि गोगोई के साथ भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन किए। जस्जिस रंजन गोगोई यहां शनिवार को पहुंच गए थे। शनिवार को उन्होंने तिरुचनूर में श्री पद्मावती देवी मंदिर के दर्शन किए, इसके बाद उन्होंने भगवान वर्षा स्वामी के दर्शन किए और फिर भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन किए। क्या धर्मनिष्ट और धर्मभीरु होने के किसी और प्रमाण की जरूरत है।

न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद को रोकने के बजाये क्या जस्टिस गोगोई ने उसे बढ़ावा नहीं दिया। जस्टिस गोगोई कि अध्यक्षता में कालेजियम की सिफारिश पर जस्टिस अरुण मिश्रा के रिश्तेदार को एमपी में जज नियुक्त किया गया। इसी तरह उच्चतम न्यायालय के पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काट्जू ने आरोप लगाया था कि राजस्थान उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग को पदोन्नति दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वाल्मीकि मेहता से उनके तल्ख रिश्ते के कारण नहीं हुई थी। जस्टिस काट्जू का दावा था कि जस्टिस मेहता से खराब संबंधों का खामियाजा जस्टिस नंदराजोग को भुगतना पड़ा और उच्चतम न्यायालय में उनकी पदोन्नति नहीं हो सकी।

जस्टिस काटजू ने लेख लिखकर सवाल उठाया था कि जस्टिस गोगोई की बेटी की दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस वाल्मीकि मेहता के बेटे से शादी हुई है। जस्टिस वाल्मीकि मेहता के खिलाफ गंभीर आरोप थे, जिनको उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने अपनी जांच में सही पाया था। जस्टिस ठाकुर की अध्यक्षता वाली कोलेजियम ने मार्च 2016 में जस्टिस वाल्मीकि का दूसरे हाईकोर्ट में तबादला किए जाने की संस्तुति की थी। आमतौर पर इस तरह की संस्तुतियों पर भारत सरकार एक-दो सप्ताह के भीतर मुहर लगा देती है, लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर भारत सरकार ने तकरीबन एक साल तक संस्तुति वाली फाइल को कोल्ड स्टोरेज में रखा। तब के चीफ जस्टिस ठाकुर ने संस्तुति को लागू न किए जाने पर बार-बार खुली अदालत में नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने यहां तक धमकी दी थी कि गंभीर आरोप होने के चलते वो दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को जस्टिस वाल्मीकि से न्यायिक काम छीनने का निर्देश दे देंगे। (इसमें भाजपा के एक वरिष्ठ मंत्री और उच्चतम न्यायालय के वरिष्ट वकील का योगदान बताया जाता है जिनके चैम्बर से जस्टिस मेहता के वकील पुत्र जुड़े हुए बताए जाते हैं।)

जस्टिस काटजू के अनुसार जस्टिस ठाकुर जब जनवरी 2017 में रिटायर हो गए और जस्टिस केहर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने तब भारत सरकार द्वारा फाइल (राष्ट्रपति को हस्ताक्षर के लिए भेजने के बजाये) उच्चतम न्यायालय  को वापस लौटा दी गई। चीफ जस्टिस केहर की अध्यक्षता वाली नयी कोलेजियम ने पहले की संस्तुति को रद्द कर दिया। नतीजतन जस्टिस वाल्मीकि मेहता दिल्ली हाईकोर्ट में बने रहे और दिवंगत भी हो गए।

जस्टिस काटजू ने लिखा है कि इसका जवाब केवल जस्टिस गोगोई दे सकते थे कि अपने समधी के तबादले की संस्तुति की जानकारी पाने पर जस्टिस गोगोई पीएम मोदी के पास गए और फिर एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री के पास गए और उनसे जस्टिस वाल्मीकि मेहता का तबादला नहीं होने देने की गुजारिश की। वरिष्ठता के हिसाब से गोगोई अगला मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में थे, इसलिए सरकार ने उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया और बजाये हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजने के फाइल को कोल्ड स्टोरेज में रख दिया। अगर ये प्रकरण सही है तो निश्चित तौर पर गोगोई ने भाजपा  सरकार से एक सहयोग लिया जिसे उन्हें बदले में लौटाना था और उच्चतम न्यायालय की बहुत सारी घटनाओं में इसकी व्याख्या देखी जा सकती है।

जस्टिस काटजू ने लिखा था कि वाल्मीकि मेहता का बेटा (गोगोई का दामाद) एक वकील है। ऐसा माना जाता है कि शादी के बाद उसकी प्रैक्टिस और आय में एकाएक उछाल आ गया। इसलिए गोगोई को इस बात को बताना चाहिए कि शादी से पहले और बाद में उनके दामाद की क्या आय थी। जस्टिस काटजू ने लिखा था कि दिल्ली हाईकोर्ट के तीन जज, जस्टिस प्रदीप नंदराजोग (मौजूदा समय में राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस), जस्टिस गीता मित्तल (जम्मू-कश्मीर कोर्ट के मौजूदा सीजे) और जस्टिस रविंदर भट्ट सभी दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस संजीव खन्ना से वरिष्ठ थे, लेकिन इन सबको पीछे छोड़कर जस्टिस खन्ना को प्रोन्नति दे दी गई, लेकिन उसके बाद चीफ जस्टिस गोगोई ने आराम से उसे अपनी पाकेट में डाल लिया और उसे भारत सरकार के पास नहीं भेजा जैसा कि आमतौर पर किया जाता है। क्यों?

जस्टिस काटजू इन तीन जजों का पीछे किया जाना आपातकाल में सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के तीन वरिष्ठ जजों को पीछे छोड़े जाने की याद दिला देता है। इसने इन तीन जजों को हतोत्साहित करने के अलावा पूरी न्यायपालिका में एक गलत संदेश दिया है। यही नहीं प्रोन्नत किए गए जस्टिस माहेश्वरी को उस कोलेजियम ने विशेष तौर पर खारिज कर दिया था जिसकी 12 दिसम्बर 2018 को बैठक हुई थी। (जैसा कि उस कोलेजियम के सदस्य जस्टिस लोकुर ने बताया था)। क्या वो तीन हफ्ते के भीतर एकाएक सक्षम हो गए?

मुद्दे यहीं खत्म नहीं होते। जिस तरह यौन उत्पीड़न के मामले को उच्च स्तर पर दफन किया गया और आरोप है कि जस्टिस गोगोई के दोस्त उत्सव बैंस से साजिश का आरोप उछलवाया गया उससे एक और बात प्रमाणित होती है कि जब अपने पर आती है तो अत्यंत प्रभावशाली लोग अपने बचाव में सारे घोड़े खोल देते हैं और अपनी ही बनाई विशाखा गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ा देते हैं।

अपने ऊपर लगे आरोपों को सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई में लाने की पहल खुद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने की। उन्होंने खुद की सदस्यता वाली तीन सदस्यी बेंच गठित की, जिसमें जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना को भी शामिल किया गया। वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने चीफ जस्टिस पर सवाल उठाते  हुए कहा कि कोई जज अपने खिलाफ लगे आरोप की सुनवाई कैसे कर सकता है? दिलचस्प तथ्य यह है कि इस मामले के ऑर्डर की कॉपी पर जस्टिस मिश्रा और जस्टिस खन्ना के नाम तो थे, जस्टिस गोगोई का नाम नहीं था। इस मामले में उत्सव बैंस के आरोपों कि जांच के लिए उच्चतम न्यायलय की ओर से नियुक्त जस्टिस एके पटनायक जांच समिति ने देश के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिला कोर्टकर्मी को शीर्ष अदालत और मुख्य न्यायाधीश को बदनाम करने की साजिश में शामिल होने के मामले में क्लीन चिट दे दी है। समिति ने कहा है कि बेंच फिक्सिंग में भी उसका हाथ नहीं है। रिपोर्ट में जस्टिस एके पटनायक समिति ने कहा कि कोर्ट को बदनाम करने की साजिश में महिला शामिल नहीं है। उत्सव बैंस से शिकायत का प्रमाण और हलफनामा भी उच्चतम न्यायालय ने लिया था, लेकिन जब बेंच फिक्सिंग की शिकायत झूठी पाई गई तो फिर बैंस के खिलाफ आज तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इससे इन आशंकाओं को बल मिलता है कि बैंस का इस्तेमाल एक मोहरे के रूप में मामले को रफा दफा करने में किया गया।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ ही कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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This post was last modified on November 18, 2019 12:22 pm

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