Monday, December 5, 2022

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 60% बच्चे हैं कुपोषित

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आज देश की भुखमरी की स्थिति पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल ही में जारी हुई ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत में भूख की स्थिति गंभीर है और अधिकांश देशों से ख़राब।

ऐसे में हम अगर झारखंड की बात करें तो राज्य के पश्चिमी सिंहभूम में स्थिति और भी गंभीर है। 2019-21 में हुए राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार ज़िला में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 60% बच्चे कुपोषित हैं (उम्र अनुसार वज़न और लम्बाई कम है)। 2015-16 के सर्वेक्षण की तुलना में ज़िले में न के बराबर सुधार हुआ है। ज़िले की एक-तिहाई महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम है।

वहीं दशकों के संघर्ष के बाद बने खाद्य व सामाजिक सुरक्षा अधिकारों का केंद्र सरकार विस्तार करने की बजाय उसको सीमित करने में लगी हुई है। राज्य सरकार ने इस ओर जन दबाव में कई सकारात्मक निर्णय लिये हैं, लेकिन जन अपेक्षा अनुरूप कार्यवाही नहीं की है। साथ ही, स्थानीय प्रशासन का खाद्य व सामाजिक सुरक्षा अधिकारों के प्रति उदासीन रवैया किसी से छुपा नहीं है। शिकायतों पर समय सीमा में कार्यवाही नहीं की जाती है।

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कुपोषण की ऐसी स्थिति में भी धात्री व गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों के आंगनवाड़ी सेवाओं के प्रति सरकारी प्रतिबद्धता नहीं दिख रही है। हेमंत सोरेन सरकार द्वारा पिछले एक साल में आंगनवाड़ी में 3-6 वर्ष उम्र के बच्चों के लिए अण्डों की घोषणा कई बार की गयी है, लेकिन अंडा बच्चों के थाली तक नहीं पहुंच पाया है। सही से पका हुआ भोजन भी नहीं मिलता है। केंद्र सरकार ने 2015-16 से लगातार आंगनवाड़ी परियोजना का बजट कम किया है। मनरेगा में न्यूनतम मज़दूरी दर से भी कम मज़दूरी देकर बंधुआ मज़दूरी करवाई जा रही है।

अनेक विधवा महिलाएं पेंशन से वंचित हैं, क्योंकि पति के मृत्यु का प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है। केंद्र सरकार की पेंशनधारियों के प्रति उदासीन रवैया तो सर्वविदित है। सरकार तो बुज़ुर्ग पेंशनधारियों (वो भी BPL वाले) के प्रति अपनी जिम्मेवारी महज़ 200 रुपये (कुछ ख़ास मामलों में 500 रु) प्रति माह तक सीमित रखी है।

इन तमाम मुद्दों पर खाद्य सुरक्षा जन अधिकार मंच, पश्चिमी सिंहभूम द्वारा 19-20 नवम्बर को TRTC, गुईरा, चाईबासा में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया।सम्मेलन में ज़िला के सभी प्रखंडों से मंच के अनेक सदस्यों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य था, मंच के अनुभवों व संघर्षों व वर्तमान चुनौतियों के आधार पर आगे की रणनीति को तय करना।

सम्मेलन में भुखमरी, कुपोषण व खाद्य व सामाजिक सुरक्षा अधिकारों की वर्तमान स्थिति पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि डीलर द्वारा कम राशन देना और अनाज की चोरी आम बात बन गयी है। राज्य सरकार ने छूटे परिवारों के लिए हरा राशन कार्ड योजना शुरू तो की, लेकिन कार्डधारियों को नियमित रूप से राशन नहीं मिल रहा है। वहीं, केंद्र सरकार द्वारा प्रचार-प्रसार के साथ शुरू किए गए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना अंतर्गत दो महीने से अनाज का आवंटन ही नहीं किया गया है। सदस्यों ने इन्हीं चुनौतियों के बीच संघर्ष के जीत की भी चर्चा की। सम्मेलन में बताया गया कि लगातार शिकायत व जन दबाव के बाद कई गावों में मुआवज़ा सहित बकाया राशन दिया है।

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सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि राज्य सरकार ने सर्वजन पेंशन योजना लागू कर पेंशन का दायरा तो बढ़ाया है, लेकिन अनेक विधवा महिलाएं पति के मृत्यु का प्रमाण पत्र नहीं बन पाने के कारण अभी भी पेंशन से वंचित हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार का पेंशनधारियों के प्रति उदासीन रवैया भी एक बड़ा कारक है। सम्मेलन में बताया गया कि सरकार तो बुज़ुर्ग पेंशनधारियों (वो भी BPL वाले) के प्रति अपनी जिम्मेवारी महज़ 200 रुपये (कुछ ख़ास मामलों में 500 रु) प्रति माह तक सीमित रखी है।

सम्मेलन के पहले दिन राज्य व ज़िला में व्यापक कुपोषण पर विस्तृत चर्चा हुई। वहीं सम्मेलन के दूसरे दिन भूमि व वन अधिकरों एवं मानवाधिकारों पर हो रहे हमलों पर चर्चा हुई। इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला ने कहा कि लैंड बैंक के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों की सामुदायिक ज़मीन को लूटा जा रहा है और अभी तक राज्य सरकार ने इसे ख़ारिज नहीं किया है। वहीं केंद्र सरकार भू स्वामित्व योजना व भूमि दस्तावेजों के डिजिटलीकरण के माध्यम से आदिवासी-मूलवासियों की ज़मीन लूटने का कार्यक्रम बनाई है।

वक्ताओं ने कहा कि ज़िले में वन अधिकार कानून का उल्लंघन हो रहा है। लोगों के सामुदायिक दावों को ख़ारिज किया जा रहा है। साथ ही, ज़िले में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी-मूलवासियों-वंचितों पर लगातार हिंसा किया जा रहा है और फ़र्ज़ी आरोप लगाकर उन्हें परेशान किया जा रहा है।

सम्मेलन में इन मुद्दों पर चर्चा करते हुए आगे की रणनीति बनाई गयी कि आने वाले समय में मंच द्वारा खाद्य व सामाजिक सुरक्षा अधिकारों व जन अधिकारों पर व्यापक आन्दोलन किया जाएगा। हर प्रखंड में युवाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा एवं क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासी-वंचितों को संगठित कर के संघर्ष किया जाएगा।

सम्मेलन में अम्बिका यादव, बनमाली बारी, दुलू राम कुंकल, दयामनी बरला, डोबरो बिरुली, एलिना होरो, हेलेन सुंडी, जयसिंह बोदरा, जयंती मेलगंडी, कमला देवी, मधुसुदन बनरा, मानकी तुबिड, नारायण कांडेयांग, राजेश प्रधान, रमेश जेराई, रामचन्द्र माझी, रंजीत किंडो, संदीप प्रधान, शान्ति तिरिया, सिराज दत्ता, टॉम कावला समेत अनेक वक्ताओं ने अपनी बात रखी।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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