ग्राउंड रिपोर्ट : यूपी के पहाड़ी क्षेत्र नौगढ़ में सिंचाई साधन की कमी, मुश्किल में आदिवासी किसान

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नौगढ़। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित नौगढ़ विकासखंड में 300 बीघा से अधिक रकबे में रोपी गई धान की फसल पर सिंचाई की कमी से कम उत्पादन का खतरा मंडराने लगा है।

खरवार आदिवासी बाहुल्य गांव नोनवट के ग्रामीणों का कहना है कि, विगत दशकों से सिंचाई के साधन के अभाव में खेती-किसानी से बहुत उम्मीद नहीं रह गई है। चूंकि, खेत विरासत में मिले हैं, इसीलिए फसलों की बुआई कर लेते हैं।

सिंचाई के साधन, बारिश का अभाव और जंगली (सुअरा, शाही, नीलगाय और बेसहारा मवेशियों) द्वारा खाने और रौंदने के बाद नाम मात्र का ही उत्पादन मिल पाता है।

नोनवट, जमसोती, औरवाटांड़, पंडी, केल्हड़ियां, लौबारी, समेत कई पहाड़ी गांवों में खेती घाटे का सौदा है, लेकिन यहां आजीविका का कोई ठोस साधन नहीं होने से विवशता है खेती पर जुआ खेलना।

चंदौली जिले के जमसोती के किसान प्रेम प्रकाश कोल चिंतित हैं। उन्होंने खरीफ सीजन में चार बिस्वा जमीन में बोदी सब्जी की खेती की, लेकिन खेत में बीज डालने के तुरंत बाद बारिश और पौधों के बढ़वार और उत्पादन देने तक होती रही बारिश ने समूची फसल को कमजोर कर दिया।

कीटनाशक और उर्वरक डालने के बाद भी पौधे टिके नहीं, आधी फसल में उकठ्ठा रोग लग गया। उत्पादन की छोड़िये फसल मारी गई।

नष्ट हो रही सब्जी की फसल के साथ जमसोती के किसान प्रेम प्रकाश कोल

“मैं चार बिस्वा में बोदी (सब्जी) की फसल बोने के लिए इस जमीन पर 3000 रुपये की लागत लगाई थी। यह मेहनत-मजदूरी से बचाकर रखा था। मैंने अपनी बचत इस उम्मीद में खर्च कर दी कि मुझे इस साल यानी खरीफ सीजन में बोदी की फसल बेचकर अच्छा मुनाफा हो जाएगा”।

“इससे रबी की फसल के लिए बीज और उर्वरक खरीद सकूंगा। मैं जलभराव से अपनी फसल को बचाने में कामयाब रहा, लेकिन बारिश और तेज गर्मी की वजह से कीटों के हमलों से अपनी फसल नहीं बचा पाया। अगली फसल आलू लगानी है, इसकी जुताई, खाद और बीज के लिए रुपए की व्यवस्था कैसे होगी। यह सोचकर मैं परेशान हूं।”

किसान प्रेम प्रकाश कोल ने जनचौक को बताया “यदि मैं रबी की फसल की बुआई किसी से रुपए उधार लेकर कर भी लेता हूं, तो फरवरी-मार्च के दरमियान फसल की सिंचाई के लिए पानी ही बंधी और तालाब नहीं रहता। बोरवेल/सिंचाई पंप घंटे-दो घंटे चलकर ही पानी देना बंद कर देते हैं।

ऐसे में पिछले वर्ष की तरह सरसों और गेहूं की फसल का उत्पादन चौपट होने की आशंका है। मुझे ही नहीं यहां सैकड़ों किसानों की फसलों को सिंचाई के साधन की कमी से नुकसान होता है।”

फसल में लगे उकठा रोग से मरते पौधे को दिखाता किसान

नौगढ़ विकासखंड क्षेत्र के 10 से अधिक गांवों में प्रेम प्रकाश जैसे लगभग 250 किसान घाटे में चल रहे हैं। इनमें से कई किसानों ने खरीफ सीजन में सिर्फ हरे चारे (ज्वार-बाजरा) और झुग्गी-झोपड़ी के सहारे घर के पास में नेनुआ, करैला, खीरा, भिंडी, कोहड़ा, लौकी आदि सब्जियां लगाते हैं।

अधिकतर किसान सब्जियों की बड़े पैमाने पर खेती करने से बचते हैं। क्योंकि, ज्यादातर किसानों के खेत जंगल से लगे हैं। यदि वे अपनी खरीफ में सब्जी की फसल को कीटों से बचाने में सफल हो भी गए तो खेतों में सब्जी की उपज को जंगली जानवर से बचना मुश्किल है।

जंगली जानवरों से धान की फसल को बचाने के लिए लगाई गई बाड़

चंदौली जिले का ड्रैनेज सिस्टम यूपी का चंदौली जनपद का कृषि प्रधान है। यहां धान, गेहूं और हरी सब्जियों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। जिला नहरों के जाल से आच्छादित है। जिले में मूसाखाड़, चंद्रप्रभा, नौगढ़, भैसौड़ा, मुजफ्फरपुर और लतीफशाह बीयर जैसे प्रमुख बांध है।

लगभग 1135 किमी क्षेत्रफल में फैली मुख्य तीन नहरों के अलावा 357 रजवाहों का जाल फैला हुआ है। इसमें चंद्रप्रभा, मूसाखांड और लघुडाल नहर सिंचाई प्रखंड से संबंधित नहरें शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त 300 नलकूप भी हैं। नहर और रजवाहे पहाड़ी इलाके से ही होकर मैदानी इलाकों में आते हैं और जरूरत पर हजारों हेक्टेयर कृषि रकबे को सिंचित भी करते हैं।

रोके गए बंधियों से पानी के रिसाव की समस्या यह है कि बंधियों की अच्छी मरम्मत नहीं होने से काफी मात्रा में पानी रिसाव से बिना इस्तेमाल के बह जाता है। यदि इस रिसाव को रोक लिया जाए तो रबी सीजन में फसलों की सिंचाई में पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

अखिल भारतीय किसान महासभा के जिलाध्यक्ष श्रवण कुशवाहा (लाल कुर्ते में)

पहाड़ी गांवों में पानी को तरस रहे खेत

अखिल भारतीय किसान महासभा चंदौली जनपद इकाई के जिलाध्यक्ष श्रवण कुशवाहा “जनचौक” से बताते हैं “नौगढ़ क्षेत्र के धनकुआरी कला, बैरगढ, गंगापुर, धोबही गांव, बोझ, जमसोती, लौवारी, नोनवट, पंडी, और वाटाड़, केल्हड़िया, सपहर, नोनवट, करमठचुआं, गांव देवरी समेत कई पहाड़ी गांवों के खेतों की प्यास नहीं बुझ पाती है।

मानसूनी बारिश से हुई खेतों की नमी और आसपास जमा थोड़ा-बहुत पानी ही आदिवासी समेत सभी ग्रामीणों के खेती की सिंचाई का साधन है।

सिंचाई विभाग, जनप्रतिनधि और प्रशासन से लम्बे समय से किसान सिंचाई के साधनों की मांग कर रहे हैं, जिसका नतीजा हकीकत में बेअसर है। लिहाजा, इन किसानों की खेती जुआ है। हो गई तो ठीक, नहीं तो घाटे की बोझ से कमर टूटनी तय है।”

खेती घाटा के अलावे फायदा नहीं देती

देवरी ग्रामसभा के रहवासी 76 वर्षीय गट्टू खरवार कहते हैं “अब खेती बहुत खर्चीली हो गई है। रोजमर्रा के खर्च को काटकर बचत के नाम कुछ हाथ में नहीं रहता है। खेती में इतनी लागत आती है कि, उपज में से जुताई, खाद, बीज, कीटनाशक और मजदूरी को घटा दें, तो खेती घटा अलावे फायदा नहीं देती है।

ये हाल किसानों का कई दशकों से है। खरीफ का सीजन लौट रहा है। अभी से धान की फसल को रेड़ने (बालियां पड़ने) और फूटने के लिए कम से कम दो पानी (दो बार सिंचाई) की जरूरत है। हमलोग बारिश की राह तक रहे हैं।

दूसरी बात, सिंचाई के साधन नहीं होने से मेरे गांव में ज्यादातर किसान एक वर्ष सिर्फ एक ही फसल बोते हैं। इसमें चना, सरसों और गेहूं शामिल है, जो बारिश पर ही निर्भर है। बारिश हुई तो ठीक नहीं तो फसल चौपट।”

खेती में पानी की कमी से परेशान आदिवासी किसान (लाल गमछे में गट्टू खरवार)

गट्टू आगे कहते हैं “ नोनवट गांव के दक्षिण में एक छोटी बंधी है। इसमें से एक नहर निकलकर गांव में लाने के लिए सिंचाई विभाग और विधायक से मांग की गई, लेकिन ग्रामीणों की मांग को गंभीरता से नहीं लिया गया। गट्टू की बात से उनके साथ खड़े ग्रामीणों ने भी सहमति जताई।”

खेती-किसानी से नहीं भर पाता है पेट देवरी कला ग्रामसभा के आदिवासी राजेश खरवार के परिवार में कुल ग्यारह सदस्य हैं। उनके पास तीन बीघे खेती की जमीन है। एक बीघे में धान रोपे हैं।

राजेश “जनचौक” से कहते हैं “खेती-किसानी के भरोसे हमलोग रहेंगे तो पेट ही परिवार का नहीं भर पाएगा। जो रोपाई, बुआई होती है, फसल के पीक पर सिंचाई के अभाव में फसल मारी जाती है। खरीफ की पूरी खेती मानसून के भरोसे करते हैं। रबी सीजन में रहवासी, मवेशी, जंगली जानवर के पीने के पानी की किल्लत होने लगती है। फसल की सिंचाई की बात क्या करें?”

खेती से भरण-पोषण नहीं होने से कोयला मंडी में मजदूरी करने वाले राजेश खरवार

कोयला मंडी में मजदूरी से मिलती है नगदी

वह आगे कहते हैं “परिवार के पेट भरण-पोषण के लिए मुगलसराय के पास चांदसी कोयला मंडी में मजदूरी करता हूं। 10-12 घंटे की दिहाड़ी में रोजाना नगद रुपए मिल जाते हैं, जबकि नौगढ़ क्षेत्र में दिहाड़ी पहले तो मिलती नहीं है”।

“मिलती भी है तो 200 से 250 रुपए की दिहाड़ी। चंधासी कोयला मंडी में जोखिम है तो नगद रुपए भी मिलते है। इतनी महंगाई में इतने कम रुपए से कैसे गुजारा होगा? “

प्रशासन करे सिंचाई साधन की व्यवस्था

स्थानीय दीपक कुमार के अनुसार पहाड़ी गांवों को गई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। गर्मी के दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं “काफी मांग और अर्जी देने के बाद गांव में एक नलकूप भी लगने के लिए आया। गांव में ख़ुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन पड़ोसी गांव वालों ने उसे अपने गांव में लगवा लिया”।

दीपक का कहना है कि “यहां खेती करना आसान नहीं है। फसल के तैयार होते ही सुअर, शाही, नीलगाय, गोह व अन्य जानवर नुकसान पहुंचाने लगते हैं। फसल के पकने के समय थोड़ी भी लापरवाही हुई तो कुछ भी हाथ लगना मुश्किल है। यहां से शिक्षा-चिकित्सा के लिए काफी परेशान होना पड़ता है”।

“आवागमन की सुविधा भी नहीं है। मेरी जिलाधिकारी से मांग है कि पहाड़ी गांवों का सर्वेक्षण कर सिंचाई साधनों की व्यवस्था की जाए, ताकि खेती-किसानी में कम समस्याएं हों। साथ ही गांव में रोजगार और ग्रामीणों के आजीविका का ठोस साधन का विकल्प भी मिले।

प्रशासन से सिंचाई साधन की मांग करने वाले दीपक

चंदौली जनपद के सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता से मोबाइल फोन से ग्रामीणों की सिंचाई समस्या को अवगत कराने के लिए संपर्क किया गया तो फोन स्वीच ऑफ बता रहा था।

आदिवासी होकर भी आदिवासी नहीं

चंदौली जनपद और सोनभद्र के जंगलों में कोल, खरवार, भुइया, गोंड, ओरांव या धांगर, पनिका, धरकार, घसिया और बैगा ट्राइब्स का निवास है। साल 1996 में वाराणसी से टूटकर चंदौली जनपद बना। इस दौरान कोल, खरवार, पनिका, गोंड, भुइया, धांगर, धरकार, घसिया, बैगा आदि अनुसूचित जनजातियों को अनुसूचित जाति में सूचीबद्ध कर दिया गया।

नौगढ़ इलाके को अनुसूचित जाति में सूचीबद्ध किया गया है, इस वजह से इलाके का विकास, जीवन और भी पिछड़ गया, जबकि समीप के सोनभद्र व बिहार राज्य में खरवार आदि जनजातियां जन-जाति के रूप में सूचीबद्ध हैं।

चंदौली के आदिवासी, आदिवासी होकर भी आदिवासी नहीं हैं। अनुसूचित जाति में गिने जाने की वजह से इनको वन अधिकार कानून का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

(पवन कुमार मौर्य चंदौली\वाराणसी के पत्रकार हैं )

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