नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के नीदरलैंड्स में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान नाटो महासचिव मार्क रूटे ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को एक संदर्भ विशेष में “डैडी” कह कर संबोधित किया। कहा- “कभी-कभी डैडी को कठोर भाषा का इस्तेमाल करना पड़ता है।”
“डैडी” इससे प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि रूटे ने यह संबोधन स्नेह भाव से किया है। फिर मजाक के लहजे में यह भी कह डाला कि आगे कभी जरूरत पड़ी, तो ‘I will hit him hard.’ ट्रंप जब अमेरिका लौटे, तो ह्वाइट हाउस ने “डैडी” संबोधन को संदर्भ बनाते हुए एक विशेष वीडियो जारी किया।
भले यह संवाद हलके अंदाज में हुआ मालूम पड़ता हो, लेकिन नाटो शिखर सम्मेलन की यही असल कथा रही। ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही अन्य नाटो देशों को झिड़क दिया था। कुछ उसी डैडी वाले अंदाज में कि जाओ, अब मैं तुम्हारा खर्च नहीं उठाऊंगा- अपना इंतजाम खुद करो।
अक्सर पितृसत्तात्मक घरों में ऐसी स्थितियों में आश्रित बच्चे भड़कते हैं, चिल्लाते हैं, रोते-गाते हैं, लेकिन आखिर में पिता को मनाने में जुट जाते हैं। होता आखिर वही है, जो पिता की इच्छा हो। ठीक यही कथा पिछले पांच महीनों में यूरोप- खासकर नाटो में चरितार्थ हुई है।
ट्रंप ने कहा कि नाटो के सभी सदस्यों को अपनी जीडीपी का पांच फीसदी रक्षा पर खर्च करना होगा। इस पर कुछ समय तक यूरोपीय देशों ने हाय-तौबा मचाई। अपनी अलग बैठकें कीं। अपनी रक्षा खुद करने का इरादा जताया। बिना अमेरिकी मदद के भी यूक्रेन की सहायता जारी रखने के संकल्प जताए। मगर थक-हार कर उन्हें अहसास हुआ कि असल में वे स्वतंत्र इकाई नहीं हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद मार्शल प्लान के तहत जिस रूप में यूरोपीय व्यवस्था निर्मित की गई, उसमें बाकी सदस्य देशों के लिए अमेरिका से अलग स्वतंत्र विदेश नीति या स्वायत्त कूटनीति की कोई गुंजाइश नहीं है।
तो नीदरलैंड्स के हेग में हुए नाटो शिखर सम्मेलन में इस सैन्य संधि में शामिल 31 देश (32वां सदस्य अमेरिका है) अमेरिकी नुस्खे पर राजी हो गए। वहां फैसला हुआ,
- नाटो के सदस्य देश साल 2035 तक अपने रक्षा एवं सुरक्षा संबंधी खर्च को बढ़ाते हुए उसे अपने जीडीपी के पांच फीसदी हिस्से तक ले जाएंगे।
- सदस्य देश नाटो के सामने हर साल अपनी ‘वार्षिक योजना’ पेश करेंगे, जिनमें इस बात के आंकड़े दिए जाएंगे कि ये देश पांच प्रतिशत रक्षा बजट की तरफ विश्वसनीय ढंग से बढ़ रहे हैं। 2029 में ऐसी सभी योजनाओं की व्यापक समीक्षा होगी।
- सभी सदस्य देशों ने नाटो संधि के अनुच्छेद 5 में वर्णित सामूहिक रक्षा के प्रावधान के प्रति ‘फौलादी प्रतिबद्धता’ जताई। इस प्रावधान का अर्थ है कि एक पर हमला सब पर हमला है।
- हेग घोषणापत्र यूक्रेन को समर्थन जारी रखने का वादा भी शामिल किया गया। कहा गया कि यूक्रेन को समर्थन से “हमारी अपनी सुरक्षा बढ़ती है।”
- दस्तावेज में कहा गया है कि रूस यूरो- अटलांटिक सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक खतरा है।
हेग घोषणापत्र प्रमाण है कि नाटो असल में अमेरिका का संगठन है, जिसमें वही होता है, जो अमेरिका चाहता है। गौरतलब है कि घोषणापत्र में सामूहिक सुरक्षा के प्रावधान के प्रति ‘फौलादी प्रतिबद्धता’ प्रतिबद्धता जताई गई, मगर हेग से लौटते वक्त ट्रंप ने इसके प्रति खुद को प्रतिबद्ध करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति पर निर्भर करता है कि (किसी सदस्य देश पर हमले की स्थिति में) जवाबी कार्रवाई करनी है या नहीं, और अगर करनी है तो किस रूप में। (अनेक विशेषज्ञ सहमत हैं कि यह इस पर तय करता है कि अनुच्छेद 5 की व्याख्या कैसे की जाती है। यह व्याख्या करने का अधिकार हर सदस्य देश के पास है। मगर व्यावहारिक रूप में तो यह अधिकार सिर्फ अमेरिका के पास ही है!)
इसका अर्थ है कि भले सभी सदस्य देश अपने जीडीपी का पांच प्रतिशत रक्षा पर खर्च करें, फिर भी यह गारंटी नहीं है कि उन पर हमला होते ही स्वतः नाटो संगठित रूप से उनकी सुरक्षा में खड़ा हो जाएगा।
वैसे जीडीपी के पांच प्रतिशत पर रक्षा बजट को ले जाना आज के दौर में यूरोपीय देशों के लिए आसान नहीं है। और अगर ये सचमुच इस सीमा तक रक्षा बजट को ले भी गए, तब भी उससे यूरोप अपनी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम कर लेगा, ये संभावना कमजोर ही नजर आती है।
- यूरोप की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जर्मनी और फ्रांस फिलहाल मंदी में हैं। ब्रिटेन का हाल तो और भी बुरा है। ये सभी देश पहले से ही कमखर्ची (austerity) की नीतियों के कारण अपने सामाजिक खर्च में खासा कटौती कर चुके हैं। इस कारण वहां सामाजिक उथल-पुथल और राजनीतिक तनाव का वातावरण है। सामाजिक खर्चों में और कटौती इन समस्याओं को और बढ़ाएगी- ये सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
- दूसरी बड़ी समस्या यूरोप के औद्योगिक आधार की कमजोर अवस्था है। ब्रिटेन की बीएई सिस्टम्स और (मुख्य रूप से) फ्रांस की एयरबस इंडस्ट्रीज जैसी गिनी-चुनी कंपनियां हैं, जो तुरंत रक्षा उत्पादन बढ़ाने की स्थिति में हैं। वरना, रक्षा पर अधिक खर्च का व्यावहारिक मतलब अमेरिकी कंपनियों से अतिरिक्त खरीदारी होगी। इस तरह बजट की व्यवस्था यूरोप करेगा, फायदा अमेरिकी कंपनियां उठाएंगी, जिन्हें अपने महंगे उत्पादों के लिए नया बाजार मिलेगा।
- तीसरी बड़ी समस्या सेना में काम करने के इच्छुक नौजवानों की कमी है। आज यूरोपीय देशों की सेनाओं में कर्मचारियों की भारी कमी है। हाल यह है कि जर्मनी अपने यहां अनिवार्य सैन्य सेवा का प्रावधान लागू करने पर विचार कर रहा है। मगर यह प्रस्ताव बेहद अलोकप्रिय है, इसलिए इसे लागू करना कठिन बना हुआ है।
- ब्रिटेन की सेना के बारे में तो कहा जाता है कि आज इसका आकार अमेरिकी क्रांति (1776) के समय से भी छोटा है। और जो सैनिक हैं, उनकी तंदुरुस्ती अक्सर मजाक का विषय बनती रही है।
(https://asiatimes.com/2025/06/nato-5-defense-pledge-wont-make-the-kremlin-shake-in-its-boots/#)
तात्पर्य यह कि हेग शिखर सम्मेलन से नाटो ने ट्रंप काल में पैदा हुई अंदरूनी खींचतान का समाधान जरूर ढूंढ लिया, मगर उससे यूरोपीय सुरक्षा को और दुरुस्त करने में कोई मदद मिलेगी, इसका भरोसा किसी को नहीं है। उलटे इस शिखर सम्मेलन ने यूक्रेन के मुद्दे पर अमेरिका और रूस के बीच समझौता होने की संभावना को और दूर कर दिया है। अगर ये लड़ाई समझौते से थम जाती, तो संभवतः उससे यूरोप अधिक सुरक्षित हो सकता था।
बहरहाल, घोषणापत्र में यूक्रेन की मदद जारी रखने का इरादा जता कर और रूस को अपने लिए दीर्घकालिक खतरे के रूप में चित्रित कर नाटो ने शांति की संभावना को और दूर कर दिया है। इसके साथ ही ट्रंप काल में तनाव घटने की रही-सही उम्मीदों पर भी विराम लग गया है।
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)