स्कूलबंदी और विलय प्रक्रिया देश को अनपढ़-अशिक्षित बनाने का बना हथियार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के स्कूल शिक्षा वाले खंड के सातवें उपखंड में स्कूल एकीकरण/समेकन की बात की गई है। बड़ी ही चालाकी के साथ इस नीति ने कोठारी आयोग (1964-66) में वर्णित पड़ोसी स्कूल वाली अवधारणा की मनमानी व्याख्या करते हुए स्कूल मर्जर को कोठारी आयोग की अनुशंसा के रूप में पेश कर दिया है जबकि सब जानते हैं कि तकरीबन 60 साल पहले हर बच्चे को औपचारिक शिक्षा से जोड़ने के संदर्भ में कोठारी आयोग द्वारा पेश कॉमन स्कूल सिस्टम (समान स्कूल प्रणाली) की अवधारणा की शब्दावली तक मौजूदा शिक्षा नीति, 2020 में नदारद है। और यहां तक कि शिक्षा अधिकार कानून, 2009 का भी जिक्र सिर्फ ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में ही एकाध जगह है।

दरअसल, 2020 से भी पहले जब यह नीति बन रही थी और तब भी बहसों के घेरे में थी, नीति आयोग ने बोस्टन कंसल्टेंसी ग्रुप और पिरामल फाउंडेशन के साथ करार कर के प्रोजेक्ट SATH – E (Project SATH-E, ‘Sustainable Action for Transforming Human Capital- Education) नामक परियोजना को 2017 में लॉन्च किया। इसके लिए झारखंड, ओडिसा और मध्य प्रदेश को मॉडल राज्यों के रूप में चुना गया, जहां इसे पायलट परियोजना का स्वरूप दिया गया। 

2023 की आखिरी चौमाही में नीति आयोग ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा देने के लिए निजी, कॉरपोरेट घरानों एवं शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी संरक्षण में घुसपैठ कर रहे तमाम व्यावसायिक खिलाड़ियों द्वारा सुझाए गए स्कूल विलय/समेकन के इस रास्ते की खूब तारीफ की गई और उसे यथाशीघ्र अन्य राज्यों में और राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने की बात की गई। 

कहा गया कि सुचिंतित, सुनियोजित तरीके से इस प्रक्रिया को लागू करने के दूरगामी परिणाम होंगे जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन ला देगा। दरअसल, शिक्षा प्रणाली के पूर्व ढांचे यानी 10+2+3 को अकारण ही पूर्णतया अतार्किक नजरिए से बदल कर 5+3+3+4 कर देने और स्कूलों के विलय यानी तथाकथित समेकन को योजनाबद्ध ढंग से अंजाम देने के पीछे की मंशा सीधे तौर पर शिक्षा जगत में एक किस्म की अराजकता फैला देना और पहले से ही ढेर सारी मुश्किलों व चुनौतियों से जूझती शिक्षा व्यवस्था की चूलें हिला देना है। 

यह कॉरपोरेट, इलीट, निजी घरानों एवं बाजार के हित में देश की बहुसंख्यक जनता की बेहतरी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से रची गई नीति का परिणाम है। ज्ञान और शिक्षा के ऊपर अवाम के हक पर डाका है और आम जनता के मस्तिष्क-मिजाज को कब्जा कर लेने की फासीवादी कवायद है। यह आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यकों, विकलांग बच्चों और लड़कियों समेत हाशिये पर मौजूद तमाम कमजोर, वंचित और गरीब वर्गों के बच्चों को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर कर देने का तयशुदा षड्यंत्र है। यह सबको शिक्षा, समान शिक्षा के विचार पर राजनीतिक – सांस्कृतिक हमला है।

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक (सरकारी आंकड़ों के ही हिसाब से) विगत कुछ सालों में तकरीबन एक लाख स्कूल बंद हो चुके हैं (लेकिन, असल आंकड़े संभवतः इससे बहुत ज्यादा हैं)। स्कूल विलय नीति के जरिए शिक्षा में गुणवत्ता लाने की होड़ देश भर में मची है और मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत तमाम राज्यों में स्कूल मर्जर के हजारों मामले सामने आ रहे हैं, जिसका अंतिम परिणाम स्कूलबंदी और भारी संख्या में बच्चों के अचिन्हांकित ड्रॉप आउट (पुश आउट) के रूप में देखने को मिल रहा है।

भारत के करोड़ों-करोड़ बच्चों के हक में जनपक्षीय गोलबंदी और व्यापक जनदबाव के साथ इस नीति को पूरी तरह से खारिज करना ही एक रास्ता हो सकता है।

(लेखक मित्ररंजन आरटीई फोरम से जुड़े हैं।)

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