जनहित याचिकाएं, न्यायिक सक्रियता और न्याय का वर्गीय चरित्र

जब कोई समाज करवट लेता है, तो सबसे पहले उसकी नींव में पड़ी दरारें दिखाई देने लगती हैं। वह नींव, जिसका आलीशान भवन सदियों से चंद लोगों का ही आरामगाह था। सत्ता शोषितों की चुप्पी की बजाय चुनौती पाने लगती है, तब व्यवस्था की रूह काँपने लगती है। न्याय के तथाकथि पवित्र मंदिर, जो अब तक मौन और निष्पक्ष प्रतीत होते थे, अचानक बोल उठते हैं, कभी जनहित के नाम पर, कभी संविधान की मर्यादा के बहाने। लेकिन प्रश्न यह है कि जब पीड़ा की चीखें गूंज रही हों और चुप्पी में भी विद्रोह का स्वर हो, तब न्याय की यह सक्रियता क्या सचमुच न्याय की अभिव्यक्ति है, या किसी असहज बदलाव की घबराहट?

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल संसदीय चुनावों और राजनीतिक पार्टियों की उठापटक का इतिहास नहीं है। यह उस संघर्ष का इतिहास है जिसमें लंबे समय तक हाशिए पर रखे गए समाज के तबकों ने सत्ता, सम्मान और प्रतिनिधित्व की मांग की है। 1990 के दशक का पूर्वार्ध इसी संघर्ष का निर्णायक मोड़ था। यह समय भारतीय राजनीति में ऐसे सामाजिक वर्ग के उदय का था, जिसे दशकों से सत्ता में प्रवेश नहीं करने दिया गया था। इसी काल में भारत की न्यायपालिका ने भी नया रूप अख्तियार किया-न्यायिक सक्रियता का। इस सक्रियता ने कई बार वंचित समाज के पक्ष में हस्तक्षेप किए, परंतु अधिकतर अवसरों पर यह नवउदित सामाजिक शक्तियों की राजनीति को सीमित करने का माध्यम बन गई।

1990 में जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, तब पहली बार भारत की सत्ता संरचना में ऐसी दरार पड़ी, जो सिर्फ राजनीतिक न होकर सामाजिक और वैचारिक भी थी। उस समय वी.पी. सिंह के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इस निर्णय के खिलाफ देशभर के उच्च जातीय छात्रों और समूहों ने उग्र आंदोलन शुरू कर दिए। तब सवर्ण समुदाय की इस प्रतिक्रिया के साथ-साथ न्यायपालिका ने भी सक्रिय हस्तक्षेप किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के केस में पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिए जाने को बरकरार तो रखा, लेकिन साथ ही ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा लागू कर दी, जिससे बड़ी संख्या में ओबीसी लाभार्थियों को बाहर किया गया। यह उदाहरण है कि कैसे सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को न्यायिक फैसलों के माध्यम से नियंत्रित किया गया। इसी समय जनहित याचिकाएं (PIL) औजार के रूप में तेजी से प्रयोग होने लगीं। हालांकि जनहित याचिका की शुरुआत 1980 के दशक में ही हो गई थी, जब न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्णा अय्यर ने पारंपरिक Locus Standi – यानि सीधे प्रभावित व्यक्ति ही याचिका दाखिल कर सकता है, के सिद्धांत को लचीला बनाया।

हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979–1980) के केस में यह सवाल उठा कि बिहार की जेलों में हजारों कैदी वर्षों से बिना मुकदमे के बंद हैं। इसे एक पत्रकार की रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए कोर्ट ने जनहित याचिका माना और हस्तक्षेप किया। वरिष्ठ वकील कपिला हिंगोरानी ने यह याचिका दायर की थी। उन्हें इस कारण ‘जनहित याचिका की जननी’ (Mother of PIL in India) भी कहा जाता है।

जनहित याचिका का उद्देश्य उन लोगों को न्याय दिलाना था जो स्वयं अदालत नहीं पहुँच सकते-जैसे गरीब, मजदूर, आदिवासी, दलित, महिलाएँ, और बच्चे आदि। लेकिन बाद में जनहित याचिकाओं के ज़रिए कई ऐसे मुद्दों पर अदालतों ने स्वतः संज्ञान लेकर आदेश दिए जो निर्वाचित सरकारों की योजनाओं के विरुद्ध जाते थे।

बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने 1995 में बेरोजगार युवाओं को मासिक भत्ता देने की योजना शुरू की। इस योजना को एक जनहित याचिका के माध्यम से अदालत में चुनौती दी गई और कुछ समय में इसपर रोक लग गई। तर्क दिया गया कि यह ‘राजकोषीय अनुशासन’ के विरुद्ध है। लेकिन यही न्यायपालिका उस समय कोई आपत्ति नहीं उठाती जब कॉर्पोरेट करों में भारी छूट दी जाती है या बैंकों का एनपीए माफ किया जाता है।

1990 से 1997 के बीच केंद्र और विभिन्न राज्यों में पिछड़े वर्गों की सरकारें सक्रिय थीं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और फिर मायावती की सरकार, बिहार में लालू यादव की सरकार, तमिलनाडु में करुणानिधि-ये सभी सरकारें सामाजिक न्याय के एजेंडे को लेकर काम कर रही थीं। इन्होंने ऐसे कार्यक्रम शुरू किए जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित थे। उदाहरणस्वरूप बिहार में ‘मुख्यमंत्री ग्रामीण रोज़गार योजना’, उत्तर प्रदेश में ‘शिक्षा गारंटी योजना’ आदि। पर इन कार्यक्रमों को कई बार अदालतों द्वारा ‘संवैधानिक सीमाओं’ का उल्लंघन बताकर रद्द या सीमित कर दिया गया।

जनहित याचिकाओं के माध्यम से दिल्ली, मुंबई जैसे शहरी इलाकों में झुग्गी बस्तियों को उजाड़ने के लिए अदालतों ने आदेश दिए। दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर के पास यमुना किनारे की हजारों झुग्गियों को हटाने का आदेश अदालत ने 2000 के दशक के आरंभ में दिया। आदेश में लिखा गया कि ‘ये लोग मुफ्त की सुविधाएं पाने के आदी हो गए हैं।’ इस तरह के फैसले बतलाते हैं कि जनहित की परिभाषा किसके हित में तय की जा रही थी।

उसी समय, मीडिया और अदालतों के बीच एक अपारदर्शी गठजोड़ भी दिखने लगा। अदालतों के फैसले व्यापक रूप से ‘लोकतंत्र के रक्षक’ के रूप में पेश किए गए, और यह विमर्श स्थापित किया गया कि निर्वाचित सरकारें तो ‘लोकलुभावन’ होती हैं, लेकिन न्यायपालिका ‘अराजनीतिक’ और ‘सिद्धांतवादी’ होती है। इस तर्क का इस्तेमाल दरअसल उस सामाजिक वर्ग की राजनीति को निष्क्रिय करने में हुआ, जो पहली बार सत्ता में भागीदारी की कोशिश कर रहा था। लेकिन विडंबना यह है कि जिस न्यायपालिका ने 1990 के दशक में ‘जनहित’ के नाम पर इतनी सक्रियता दिखाई, वही न्यायपालिका 2010 के बाद के वर्षों में कहीं अधिक महत्वपूर्ण जनसरोकारों पर चुप्पी साध गई।

उदाहरणस्वरूप, नोटबंदी (2016) जैसे व्यापक प्रभाव वाले निर्णय को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों तक कोई ठोस निर्णय नहीं दिया। आखिरकार जब फैसला आया तो उसमें सरकार के कदम को पूरी तरह उचित बताया गया, जबकि इस नीति के कारण करोड़ों लोगों की आजीविका चली गई थी और असंगठित क्षेत्र पूरी तरह चरमरा गया था। अन्य उदाहरणों में कृषि कानूनों (2020) को भी लिया जा सकता है, जिनके खिलाफ लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक आंदोलन करते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने केवल एक समिति बना दी और उसे ‘स्थगित’ कर दिया, परंतु कानून की संवैधानिक वैधता पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जब सत्ता पर पुनः वही वर्ग काबिज हो गया जिसकी सामाजिक हैसियत पारंपरिक रूप से मजबूत रही है, तब न्यायपालिका की सक्रियता अचानक शांत हो गई। अब न्यायपालिका न तो रोज़गार छिनने पर कुछ कहती है, न ही शिक्षा के निजीकरण पर, न ही असमानता के बढ़ते आंकड़ों पर। 2023 में भारत में केवल 10 प्रतिशत लोगों के पास 80 प्रतिशत संपत्ति है। यह आर्थिक असमानता की भयावह तस्वीर पेश करता है। लेकिन अदालतों ने कभी इन आंकड़ों को आधार बनाकर सरकार से जवाब नहीं माँगा। यह वही न्यायपालिका है जिसने 1990 के दशक में ‘लोकलुभावन’ योजनाओं को राजकोषीय अनुशासन के नाम पर रोका था।

जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अब भी प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, परंतु इन विषयों पर अब कोई जनहित याचिका नहीं आती, और न ही अदालतें स्वतः संज्ञान लेती हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अदालतें केवल उन्हीं मुद्दों पर हस्तक्षेप करेंगी जो उन वर्गों को प्रभावित करते हैं जिनका सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व पहले से ही स्थापित है? और क्या जब हाशिये पर खड़े समुदाय अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं तो अदालतें उनके ‘लोकलुभावन’ होने का ठप्पा लगाकर उन्हें रोकने का माध्यम बन जाती हैं?

इन सवालों का उत्तर भारत के लोकतंत्र की दिशा तय करेगा। यह तय करेगा कि क्या हमारा लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित रहेगा या सामाजिक न्याय की भावना को भी आत्मसात करेगा। क्योंकि यदि लोकतंत्र केवल नाम मात्र का रह गया, और अदालतें सामाजिक न्याय के प्रति उदासीन रहीं, तो यह व्यवस्था धीरे-धीरे अपने नैतिक औचित्य को खो देगी।

वर्तमान दौर में जहाँ संसद में विपक्ष की आवाज़ को कुचला जा रहा है, मीडिया सरकार की भाषा बोल रहा है, और नौकरशाही पूरी तरह नियंत्रित हो चुकी है, वहां न्यायपालिका ही एकमात्र संस्था बचती है जहाँ जनता को उम्मीद होती है। लेकिन जब यही संस्था चुनिंदा मुद्दों पर ही सक्रियता दिखाए, और बाकी मामलों में ‘संविधान की मर्यादा’ का बहाना बनाकर चुप रहे, तो लोकतंत्र की चेतना घायल हो जाती है। भारत का इतिहास गवाह है कि जब भी जनता ने अपने अधिकारों की मांग की है, परंपरागत सत्ता वर्गों ने उन्हें कुचलने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग किया है। 1990 के दशक में भी यही हुआ और आज भी हो रहा है। फर्क बस इतना है कि अब यह प्रक्रिया कहीं अधिक सुनियोजित, नियंत्रित और ‘कानूनी’ दिखती है।

सवाल यह नहीं है कि अदालतें न्याय दे रही हैं या नहीं। सवाल यह है कि वे किसके लिए न्याय कर रही हैं, किसकी आवाज़ सुन रही हैं, और किन आवाज़ों को ‘लोकलुभावन’ बताकर दरकिनार कर रही हैं। जब तक इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे जाते, तब तक भारत में न्यायिक सक्रियता एक वर्ग विशेष के हितों की रक्षा का औजार ही बनी रहेगी, न कि वंचितों की मुक्ति का माध्यम। अब जब समय की घड़ी एक बार फिर घूम चुकी है, और वे हाथ जो एक दौर में सत्ता में हिस्सेदार बनने चले थे, फिर से हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, न्याय की वह सक्रियता भी शांत पड़ गई है-मानो उसे अब कुछ सुनाई नहीं देता। वे प्रश्न जो कभी अदालतों की चौखट पर सिर पटकते थे, अब खामोशी में दम तोड़ रहे हैं। यह खामोशी केवल न्यायपालिका की नहीं है, यह उस लोक की भी है जिसने कभी न्याय को अपनी उम्मीद माना था।

(मनोज अभिज्ञान स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Leave a Reply