ईश्वर- यह शब्द जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गूढ़ और बहुआयामी भी है। यदि हम मान लें कि ईश्वर हमारी कल्पना है, तो हमारी पूजा वस्तुतः केवल हमारी आत्म-संतुष्टि है। और यदि ईश्वर केवल हमारा विश्वास है, तो हम उसके तत्व को समझने का कोई प्रयास ही नहीं करते। दोनों ही स्थिति में हम एक ऐसी मानसिक अवस्था में जी रहे होते हैं, जहाँ न ईश्वर बाहर होता है, न भीतर — वह केवल एक धारणात्मक आवरण बनकर रह जाता है।
यहां ईश्वर का एक समीकरण कुछ इस तरह बनता है :
ईश्वर = कल्पना + विश्वास + आत्म-संतोष
यदि ये तत्व परिवर्तनशील (variables) हैं, तो ईश्वर से जुड़े अनुभव भी परिवर्तित होते रहेंगे। और यदि यह समीकरण केवल मानसिक तुष्टि का गणित बन जाए, तो इसका फल केवल एक भावनात्मक सांत्वना होगा, कोई आध्यात्मिक बोध नहीं।
मनुष्य ने ईश्वर की परिकल्पना मूलतः अपने अज्ञान, डर और नियंत्रण की प्रवृत्ति से उपजाई थी। जैसे-जैसे यह कल्पना सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक ढांचों और कर्मकांडों से जुड़ती गई, यह स्वयं एक असंदिग्ध “सत्य” के रूप में प्रचारित होती रही, मगर बिना यह पूछे कि क्या हमने ईश्वर को समझा या केवल उसे गढ़ा है ?
यदि ईश्वर एक वैज्ञानिक समीकरण होता, तो हमें परिणाम मिलते — करुणा, सत्यबोध, न्याय, निर्भयता। लेकिन, दुर्भाग्यवश यह समीकरण अक्सर अंधश्रद्धा, हिंसा, भेदभाव और संकीर्णता में बदल जाता है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम ईश्वर को किसी विशेष धर्म, मूर्ति, ग्रंथ या परंपरा तक सीमित न करें। अगर ईश्वर सचमुच कोई सार्वभौमिक सत्य है, तो उसे जानने के लिए हमें अपनी कल्पनाओं से बाहर, अपने विश्वासों के पार और आत्म-संतोष की सीमाओं को तोड़ते हुए एक तत्व-चिंतन करना होगा। जब तक हम यह नहीं करेंगे, तब तक ईश्वर केवल एक मनोवैज्ञानिक समीकरण बना रहेगा, जिसका हल हम खुद से छुपाते रहेंगे।
कुल मिलाकर ईश्वर अगर हमारी कल्पना है, तो हमारी पूजा वस्तुतः केवल हमारी आत्म-संतुष्टि बन जाती है। और यदि ईश्वर केवल हमारा विश्वास है, तो हम उसे जानने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं करते, बल्कि उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं, जैसा कि हमें बताया गया है। ऐसे में ईश्वर एक ऐसा समीकरण बन जाता है जिसमें कल्पना, विश्वास और आत्म-संतोष तीनों परिवर्तनशील अवयव (variables) होते हैं और जहां परिणाम, यानी ईश्वर की उपलब्धि, एक भ्रामक संतोष या सामाजिक अनुष्ठान भर बनकर रह जाती है।
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो उठता है, क्योंकि आज धार्मिकता केवल प्रदर्शन और संरचना में सीमित हो गई है, और ईश्वर एक संकीर्ण सांस्कृतिक पहचान का रूप ले चुका है। क्या ईश्वर कोई व्यक्ति है? कोई चेतना है? कोई सिद्धांत है? कोई ऊर्जा है? या केवल एक मानवीय आवश्यकता?
आइए, कुछ महत्वपूर्ण धर्मों के हवाले से इसकी पड़ताल करते हैं
हिंदू धर्म में ईश्वर का बहुरूपी समीकरण:
हिंदू परंपरा में ईश्वर की व्याख्या अत्यंत विस्तृत है — वह निर्गुण ब्रह्म भी है और सगुण देवता भी। लेकिन,यही बहुरूपता जब लोकाचार में बदलती है, तो व्यक्ति एक विशेष मूर्ति या देवी-देवता में सीमित हो जाता है। वह शिव को जल चढ़ाकर अपने अपराधों से मुक्त हो जाना चाहता है, या हनुमान की पूजा कर खुद को निर्भय मानने लगता है — यह एक भावनात्मक समीकरण है, जिसमें कर्म की जगह अनुष्ठानिक तुष्टि है।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अगर प्रतिदिन गीता पढ़ता है, लेकिन जीवन में न कर्मयोग करता है, न समत्वभाव रखता है, तो वह ईश्वर के दर्शन नहीं कर रहा — वह केवल एक कल्पना के समीकरण में आत्म-संतोष पा रहा है।
इस्लाम में ईश्वर की तौहीद और उसके प्रति समर्पण
इस्लाम में अल्लाह अद्वितीय, निराकार, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है। ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ (अल्लाह के सिवा कोई उपास्य नहीं) तौहीद का मूल है। स्पष्ट है कि अल्लाह को जाना नहीं जा सकता, केवल समर्पण किया जा सकता है। लेकिन, जब यह समर्पण आत्मनिरीक्षण की बजाय सांस्कृतिक पहचान या राजनीतिक आक्रामकता में बदलता है, तब अल्लाह एक सत्य न रहकर एक दलील बन जाता है, जहां नवाज़ एक धार्मिक अनुशासन के बजाय पहचान का प्रदर्शन बन जाती है।
यदि कोई व्यक्ति पांच वक्त की नमाज़ पढ़ता है, लेकिन न इंसाफ करता है, न रहम, तो उसका ईश्वर केवल विश्वास का एक ऐसा समीकरण बनकर रह जाता है, जहां ईश्वर को जानने का कोई प्रयास नहीं है, केवल समर्पण का दिखावा है।
ईसाई धर्म में ईश्वर और मसीह की व्याख्या:
ईसाई मत में ईश्वर प्रेम का प्रतीक है — “God is Love”। यीशु ने बार-बार कहा कि “जो अपने पड़ोसी से प्रेम नहीं करता, वह ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता।” लेकिन चर्चों में उपदेशों और प्रार्थनाओं के मध्य यदि व्यक्ति गरीबों, शरणार्थियों या पीड़ितों के प्रति संवेदनाशून्य बना रहे, तो ईश्वर केवल एक विश्वासात्मक संस्था रह जाता है, जिसे हम केवल मानते हैं, जीते नहीं हैं।
आज जब कुछ देशों में ईसाई धर्म के नाम पर धर्मांतरण अभियान चलाए जाते हैं, जहां सेवा के नाम पर नवधर्म की व्यवस्था थोप दी जाती है , वहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है: क्या यह मसीह का ईश्वर है, या एक प्रचार-प्रधान ईश्वर ?
बौद्ध धर्म: जहां ईश्वर अनुपस्थित है, लेकिन चेतना उपस्थित है:
बुद्ध ने ईश्वर की धारणा को नकारा नहीं, बल्कि अनावश्यक बताया — उनका आग्रह चेतना के विज्ञान पर, दुख के कारण और उसकी निवृत्ति पर था। उनके अनुसार, यदि कुछ जानना है, तो स्वयं को जानो। यही कारण है कि बौद्ध धर्म में पूजा एक आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है, न कि बाहरी ईश्वर की उपासना।
लेकिन, बौद्ध परंपरा में भी जब मूर्ति पूजा, मंदिर और कर्मकांड प्रवेश कर जाते हैं, तो वह मूल शिक्षा पीछे छूट जाती है। तब निर्वाण की तलाश नहीं होती, केवल प्रतीकात्मक तुष्टि रह जाती है।
सिख धर्म: ‘एक ओंकार’ की सीधी चेतना
गुरुनानक देव की वाणी में स्पष्ट है — “मन जीते जग जीत”। सिख धर्म में ईश्वर को ‘सतनाम’, ‘निर्मोही’, ‘अकाल’ कहा गया। यहां ईश्वर किसी मंदिर या मूर्ति में नहीं, कर्म में, सत्य में और सेवा में है।
फिर भी जब धार्मिक पहचान एक राजनीतिक मोर्चा बन जाए, और सेवा की जगह समूह आधारित श्रेष्ठता आ जाए, तब ‘एक ओंकार’ भी केवल एक ऐसी ध्वनि मात्र बन कर रह जाती है, जिसमें ईश्वर की अनुभूति नहीं, केवल ध्वनि की प्रतिध्वनि होती है।
ईश्वर का समीकरण: क्या जोड़ा जाए, क्या घटाया जाए?
यह प्रश्न अब मौलिक हो उठता है — यदि ईश्वर केवल हमारी कल्पना है, तो हमने उसे कितना रूप दिया, और उस रूप से हमने क्या पाया ? यदि वह विश्वास है, तो हमने उसमें कितना ज्ञान और विवेक जोड़ा ?
यदि यह समीकरण केवल इतना हो —
ईश्वर = कल्पना + विश्वास + आत्म-संतोष
तो इसे नैतिकता, करुणा, विवेक, और जिज्ञासा जैसे अंशों से गुणा करना होगा, तभी इसका परिणाम ईश्वर के सच्चे अनुभव की ओर ले जाएगा।
जब तक हम ईश्वर को जानने की जिज्ञासा के बजाय मानने की परंपरा से देखते रहेंगे, तब तक वह केवल सांस्कृतिक लाठी, राजनीतिक ध्वज, और भावनात्मक आसरा बना रहेगा। वह न जीवन में आएगा, न मृत्यु के पार जाएगा।
हमें ईश्वर की परिभाषा को न केवल धर्मग्रंथों में, बल्कि अपने अंतर में, अपने व्यवहार में और अपने विवेक में दोबारा खोजना होगा। तभी हम इस समीकरण का उत्तर पा सकेंगे। अन्यथा, यह समीकरण केवल मनुष्य की उस असहायता और भ्रम की पुष्टि करता रहेगा, जिसमें ईश्वर एक विचार नहीं, एक भ्रम बनकर रह जाएगा।
(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)