Sunday, October 17, 2021

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सावरकर के राष्ट्रवाद को अम्बेडकर ने भारत के लिए ख़तरनाक क्यों कहा था?

देश के मौजूदा सत्ताधारी जब कभी मौका पाते हैं, स्वतंत्रता आंदोलन के खास कालखंड के एक विवादास्पद चरित्र-विनायक दामोदर सावरकर के महिमा-मंडन के लिए कोई न कोई नयी कथा रचते नजर आते हैं। देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के...

धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस:आंबेडकर का बुद्ध से नाता जोड़ने का निहितार्थ

आज धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस है। आज ही के दिन (14 अक्टूबर 1956) डॉ. आंबेडकर ने महामानव गौतम बुद्ध से अपना घोषित नाता जोड़ा था, हालांकि अघोषित तौर पर बुद्ध से उनका नाता बहुत पुराना था। गौतम बुद्ध इस तथ्य...

समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय की भावना के सच्चे प्रतिनिधि थे रैदास

संत रैदास वाणीऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न।छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।जात-जात में जात हैं, जो केलन के पात।रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जात न जात।।रैदास कनक और कंगन माहि जिमि...

निर्णय और नेतृत्व से अनुपस्थित स्त्री ही है असुरक्षित!

स्त्री सुरक्षा के मुद्दे को एक सामान्य समीकरण के रूप में देखा जा सकता है- जहाँ स्त्री नेतृत्व और निर्णय की भूमिका में नहीं होगी, वहाँ असुरक्षित रहेगी | सामाजिक ही नहीं, राजनीतिक ही नहीं, धार्मिक स्पेस में भी...

धार्मिक कट्टरताओं का अंत चाहते थे विवेकानंद

वाराणसी। देश के अन्दर सबसे सक्रिय गैंग अगर कोई है तो वो है टीवी चैनल गैंग जो समाज में  मानसिक विभाजन पैदा कर नफरतों को परवान चढ़ा रहा है। आधा सच नहीं बल्कि पूरा झूठ का कारोबार ही इनका...

हिन्दुत्व अपने जन्म से ही जातिवादी और दलित विरोधी है: ‘डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ सम्मेलन में भंवर मेघवंशी

तमाम चुनौतियों व खतरों के बावजूद यह कॉन्फ्रेंस हो रही है, यह ख़ुशी की बात है। इस कॉन्फ्रेंस में आपने मुझे वक्ता के रूप में बुलाया और अपनी बात रखने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार प्रकट...

तालिबान आरएसएस के कितना करीब और कितना अलग?

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी ने उनके पिछले शासनकाल की यादें ताजा कर दी हैं। उस दौरान तालिबान ने शरिया का अपना संस्करण लागू किया था और महिलाओं का भयावह दमन किया था। उन्होंने पुरुषों को भी...

पहचान की राजनीति को तोड़ते हुए नये फलक पर जनता के बीच एकता बना रहा है किसान आंदोलन

विगत 30 और 35 वर्षों का भारतीय लोकतंत्रिक इतिहास मूलत, पहचान की राजनीति और प्रतीकात्मकता के दायरे में ही घूमता रहा है। ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ के कर्कश शोर के बीच, इसके समानांतर पिछड़े दलित होने की...

युद्ध से ज्यादा धर्म ने ली है लोगों की जान

मनुष्य को इस धरती पर सुखपूर्वक रहने के लिए उसकी न्यूनतम् आवश्यकता सर्वप्रथम भोजन और पानी है, इसीलिए लगभग सभी प्राचीनतम् मानव सभ्यताओं का विकास प्रायः किसी न किसी नदी के किनारे ही हुआ है। उसके बाद की आवश्यकताओं...

धर्म और राजनीति का गठजोड़ मानव को गुलाम बनाता है!

जो आस्था सत्य से आहत हो जाती हो उस आस्था को मर जाना चाहिए पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को कुछ धारणाएं कुछ मान्यताएं कुछ विश्वास और कुछ परंपराएं देती है ज्यादातर लोग पुरानी धारणाओं मान्यताओं विश्वास और परंपराओं को आंख मूंद...
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700 शहादतें एक हत्या की आड़ में धूमिल नहीं हो सकतीं

11 महीने पुराने किसान आंदोलन जिसको 700 शहादतों द्वारा सींचा गया व लाखों किसानों के खून-पसीने के निवेश को...
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